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Balvatika: नन्हा-मुन्ना राही... से कक्षा में ज्ञान से लेकर देशभक्ति सीख रहे बच्चे, धमाचौकड़ी के साथ पढ़ाई

सीमा शर्मा, नई दिल्ली। Published by: देव कश्यप Updated Thu, 10 Nov 2022 05:20 AM IST
सार

शिक्षा मंत्रालय ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 के तहत 20 अक्तूबर को 49 केंद्रीय विद्यालयों (केवी) में बालवाटिका शुरू किया है। यहां टाइम-टेबल व पढ़ाने का तरीका सरकार की उच्चस्तरीय समिति द्वारा तैयार बुनियादी शिक्षा पाठ्यक्रम के मसौदे पर आधारित है, जिसमें स्कूल बैग और किताब शामिल नहीं हैं।

केंद्रीय विद्यालय, एयरफोर्स स्टेशन, अर्जनगढ़, दिल्ली- बालवाटिका
केंद्रीय विद्यालय, एयरफोर्स स्टेशन, अर्जनगढ़, दिल्ली- बालवाटिका - फोटो : arjangarhafs.kvs
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विस्तार

नानी तेरी मोरनी को मोर ले गए...., लकड़ी की काठी, काठी पर घोड़ा..., नन्हा-मुन्ना राही हूं.... जैसे गानों की धुन पर उछल-कूद करते छोटे-छोटे बच्चे। रंग-बिरंगे हॉल के अंदर की बड़ी स्क्रीन में चलता कार्टून। यह कोई पिकनिक स्पॉट नहीं, केंद्र सरकार का एक सरकारी स्कूल है। यहां तीन से पांच साल के बच्चों की कक्षाएं लगी हैं। इसमें न कापी-किताब-है, न बस्ते का बोझ। पारंपरिक डेस्क-बेंच की यहां नहीं हैं। इसकी जगह लकड़ी के घोड़े, गोल आकार की बड़ी मेज और छोटी-छोटी कुर्सियां हैं। क्लास रूम में इनको इस तरह लगाया गया है कि बच्चों की उछल-कूछ में कोई परेशानी न हो।



दरअसल, शिक्षा मंत्रालय ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 के तहत 20 अक्तूबर को 49 केंद्रीय विद्यालयों (केवी) में बालवाटिका शुरू किया है। यहां टाइम-टेबल व पढ़ाने का तरीका सरकार की उच्चस्तरीय समिति द्वारा तैयार बुनियादी शिक्षा पाठ्यक्रम के मसौदे पर आधारित है, जिसमें स्कूल बैग और किताब शामिल नहीं हैं।


देश में पहली बार सरकारी स्कूलों में प्रीस्कूल, नर्सरी, लॉअर केजी, अपर प्रेप, प्री-प्राइमरी, केजी या अपर केजी की जगह तीन से पांच साल के ऊपर तक के बच्चों के लिए बालवाटिका एक, बालवाटिका दो और बालवाटिका  तीन शुरू हुई हैं। फिलहाल 49 सरकारी स्कूलों से शुरू सफर अगले शैक्षणिक सत्र 2023-24 में देशभर के सीबीएसई बोर्ड से मान्यता प्राप्त स्कूलों, राज्यों के सरकारी स्कूलों में शुरू होना है। एनसीईआरटी पहली बार इन कक्षाओं के छात्रों के लिए राष्ट्रीय पाठ्यक्रम तैयार करेगा। अभी तक देश में पहली से 12वीं कक्षा के लिए राष्ट्रीय पाठ्यक्रम तैयार होता है। लेकिन अब नन्हे-मुन्ने भी राष्ट्रीय पाठ़्यक्रम से पढ़ाई करेंगे।  

केंद्रीय विद्यालय, एयरफोर्स स्टेशन, अर्जनगढ़, दिल्ली
बालवाटिका एक, दो और तीन..... में खेल-खेल में जमा, घटाव, रंग, चीजों की पहचान

बड़ा सा कमरा और पार्क से खिड़कियों से आती ठंडी हवा के झौंके, उसमें फूल, फल, जानवर, खिलौने को उकेरती रंग-बिरंगी दीवारें। खेल-खेल में मस्ती के साथ जमा, घटाव, जानवरों के नाम, रंगों की पहचान, सामान्य ज्ञान, बात करने, चलने का तरीका और भाषा सीखते नन्हे-मुन्ने। वर्दी और बैग की कोई बाध्यता नहीं, टीचर से दोस्तों के साथ जिंदगी के कदम भरने की सीख और नींब लगाने का एक अनोखा अंदाज। यह नजारा केंद्र सरकार के सरकारी स्कूल यानी केंद्रीय विद्यालय एयरफोस स्टेशन अर्जनगढ़, दिल्ली का था।

यहां राष्ट्रीय शिक्षा नीति के तहत बालवाटिका स्कूल में तीन से पांच साल से ऊपर तक के नन्हे-मुन्ने अपनी तोतली आवाज में जिंदगी की पहली सीढ़ी  अपनी उम्र के आधार पर अलग-अलग टाइम टेबल से खेल-खेल मेें जमा, घटाव, रंग और चीजों की पहचान करना सीख रहे थे। प्रति बालवाटिका 40 बच्चे, दो टीचर, एक हेल्पर एक मां की तरह पहली बार घर से बाहर जीवन की पहली सीढ़ी चढ़ने का प्रयास करते नन्हे-मुन्नों को समय का महत्व और सुबह उठकर सबसे पहले के क्या करना चाहिए की प्रक्रिया समझाती हैं।  इसके बाद क्ले मॉडलिंग से जानवरों, ग्लास, बोत्तल, स्पून, ट्रे की पहचान तो टेडी वियर से तोता, मोर, शेर ... की कहानी से सीख मिलती है।

क्लासरूम में स्क्रीन पर बजते नन्हा-मुन्ना राही से देशभक्ति का जज्बा
क्लासरूम में पारंपरिक लाइन में रखे कुर्सी टेबल की जगह रंग-बिरंगी गोल टेबल और कुर्सी की लुक से छात्रों को घर का वातावरण में मिल रहा था। सामने दीवार पर बड़ा सा  हाइटेक एलईडी स्क्रीन। वाई-फाई से जुड़ी इस स्क्रीन पर कभी नन्हे-मुन्ने अपनी पसंद के कार्टून की डिमांड करते तो भी नानी तेरी मोरनी को मोर ले गए....., लकड़ी की काठी..काठी पे घोड़ा और नन्हा-मुन्ना राही से तिरंगे से लेकर  भारतीय सेना के जवानों की तरह कदमताल करते हुए देशभक्ति को समझने की कोशिश करते। 

लंच से पहले फ्रूट डाइम
बालवाटिका के बच्चों के लिए अभिभावकों को टाइम-टेबल के आधार पर टिफिन तैयार करने का निर्देश है।  इसका मकसद पौष्टिक आहार से जोड़ने और जंक फूड से दूर रखते हुए उनका शारीरिक और मानसिक विकास करना है। स्कूल पहुंचने के कुछ देर बाद सबसे पहले इन तीनों बालवाटिका के छात्रों के लिए फ्रूट डाइम होता है, इसमें मौसमी फल होता है।  बच्चे घर में फ्रूट खाने में आनाकानी करते हैं पर यहां दोस्तों के साथ बड़े चाव से खाने के साथ, दोस्तों के साथ बांटने (शेयरिंग) की भावना भी सीखते हैं। इसके बाद लंच टाइम होता है, इसमें भी पौष्टिक आहार शामिल होता है। जैसे पालक के परांठे या टिक्की, चने की टिक्की, इडली, डोसा, मक्की की रोटी या फिर विभिन्न प्रदेशों का घर में बनने वाला पारंपरिक खाना।  

चलो...अब स्पोर्ट्स टाइम में दोस्तों संग खेलें
क्लासरूम में खेल-खेल से पढ़ाई के बाद बच्चों को स्पोर्ट्स एक्टिविटी से प्रतिदिन जोड़ा जाता है। एक बड़े कमरे में नन्हे-मुन्नों के लिए स्पोर्ट्स एक्टिवटी चलती है। यहां लकड़ी का घोड़ा, तोता, तितली की सवारी से लेकर कई प्रकार के खिलौनों में खेलकूद करवाया जाता है। इसका मकसद मानसिक के साथ शारीरिक विकास करना है। यहां खेलकूद के साथ बच्चे एक-साथ मिलकर खेलते हैं और खिलौने भी बांटते हैं। यहीं इस स्पोर्ट्स क्लासरूम की सबसे बड़ी खासियत थी। जानवरों के नाम, रंग और खिलौनों की समझ के साथ दोस्ती भी गहरी होती है। 

ज्ञान के साथ परंपरा, संस्कृति, मातृभाषा को तबज्जो
नन्हे-मुन्नों को यहां किताबी ज्ञान से जोड़ना ही मकसद नहीं है, बल्कि भारतीय संस्कृति, परंपराओं, मातृभाषा के बारे में समझाया जा रहा है। भारत की समृद्ध ऐतिहासिक विरासत से जोड़ने, बच्चों में जिज्ञासा व तार्किक सोच के विकास के साथ समस्या समाधान, टीमवर्क की भावना जागृत करना है। खेल आधारित पठन- पाठन, कला, शिल्प, संगीत आधारित गतिविधि से परंपरा, संस्कृति और मातृभाषा को तबज्जो दी जा रही है। देश के 49 केंद्रीय विद्यालय में शुरू बालवाटिका में संबंधित राज्य की मातृभाषा, परंपरा, संस्कृति और संगीत, खान-पान के आधार पर बच्चों की पहली क्लास शुरू हुई हैं। उदाहरण के तौर पर टीचर बच्चे की मातृभाषा के आधार पर तमिलनाडमें तमिल, पश्चिम बंगाल में बांग्ला, महाराष्ट में मराठी, असम में असमी, पंजाब में पंजाबी, जम्मू-कश्मीर में कश्मीरी भाषा में  सीखा रहे हैं। 

एक्टिविटी शीट और टिफिन ही आता है घर से 
राष्ट्रीय शिक्षा नीति के तहत शुरू बालवाटिका एक, दो और तीन के छात्र एक्टिविटी शीट और टिफिन के साथ घर से आते हैं। बच्चों को खेल-खेल, मस्ती और तकनीक के माध्यम से ज्ञान, पंरपरा, संस्कृति से जोड़ते हुए पढ़ाई करवायी जा रही है। प्रति स्कूल शिक्षा मंत्रालय ने साढ़े सात लाख रुपये एक साल के लिए पैसा दिया है, उससे खिलौने, क्लासरूम के लिए डेस्क, चेयर आदि खरीदे गए हैं। तीनों बालवाटिका में 40-40 बच्चे, दो-दो टीचर और एक-एक हेल्पर है। 
-मधुबाला सिंह, प्रिंसिपल, केवी, एयरफोर्स स्टेशन अर्जनगढ़, दिल्ली। 
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