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जीत के जज्बे को सलाम, हुनर से जीत ही ली दुनिया

Thu, 28 Jul 2016 01:58 PM IST
टीम डिजिटल/ अमर उजाला
टीम डिजिटल/ अमर उजाला Updated Thu, 28 Jul 2016 01:58 PM IST
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GLA alumni amit working for energy conservation now
अमित खरे - फोटो : Amit Khare
जिंदगी जीने का नाम है। इस छोटी सी दुनिया में सपने बुनने का हक सभी को है और उसे पूरा करने का भी। शायद इसलिए यहां हर कोई किसी ना किसी जुगत में लगा रहता है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि वक्त का चक्र उसे ही सलाम करता है जिसने सफलता चखने के लिए तिल-तिल कर मेहनत की हो। जिसने खुद के दम पर अपना मुकाम हासिल किया है। 
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कुछ ऐसी ही कहानी है अमित खरे की। अमित, उत्तर प्रदेश के एक बहुत ही छोटे से जिले महोबा के रहने वाले हैं। बुंदेलखंड इलाके में आने वाली ये जगह झांसी के नजदीक है। अमित के महोबा में बिजली कटौती एक आम समस्या थी। उन्हें वहां चैन की नींद तो आती थी लेकिन सपने नहीं। 
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बिजली की कमी को झेलने वाले अमित हमेशा अपने पिता से यही पूछते थे कि उनके क्षेत्र में बिजली की इतनी कमी क्यों बनी रहती है? वो चाहते थे कि कुछ ऐसा कर पाएं जिसके बाद ये समस्या खत्म हो जाए। लेकिन क्या और कैसे, इसका कोई अता-पता नहीं था। 
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अमित की स्कूली शिक्षा महोबा से ही हुई। वो कभी भी पढ़ाई-लिखाई में तेज-तर्रार नहीं थे। ‌क्रिकेट खेलना और टीवी देखना उन्हें भी खूब रास आता था। अमित का लालन-पोषण एक मध्ययम वर्गीय परिवार में हुआ। उन्हें ये आभास था कि उन्हें लीग से हटकर कुछ करना था। 

स्कूल खत्म करने के बाद कॉलेज में दाखिले का वक्त आया। लेकिन उन्हें बुंदेलखंड क्षेत्र में साइंस का कोई अच्छा इंस्ट्टियूट नहीं मिला। तब भी, उन्होंने सकारात्मकता का हाथ थामे रखा और मथुरा स्थित जीएलए युनिवर्सिटी के लिए भी अपना एंट्रेंस दिया। इस बीच मेरिट लिस्‍ट में वो अपना नाम लाने में कामयाब हो गए। जीएलए में दाखिले ने जैसे उनके सामने नई उम्मीदों और राहों का खोल दिए।
 
वो बताते हैं कि उन दिनों जीएलए एक युनिवर्सिटी ना होकर इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी हुआ करता था। बुंदेलखंड का इलाका छोड़कर वो कॉलेज के हॉस्टल में आ गए। यहां उनका मन पढ़ाई में ऐसा रमा कि वो हर परीक्षा में काफी अच्छे अंक लाने लगे। कहते हैं सफलता से बड़ी प्रेरणा कुछ नहीं होती। इस कहावत ने अमित के भी जीवन में भूमिका निभाई। खुद को बेहतर करता देख वो तेजी से आगे बढ़ने लगे। प्रोफेसर्स और गेस्ट-लेक्चर्स से उन्हें काफी फायदा हुआ। उनके व्यक्तित्व में बदलाव आया। वो पहले से भी ज्यादा ऊर्जावान और प्रतिभावान हो गए।

अमित कहते हैं कि उन दिनों इंस्ट्यियूट में कोई प्लेसमेंट ड्राइव नहीं चला करती थी। ज्यादातर छात्रों को शिक्षा खत्म करने के बाद अपनी राह खुद ही तलाशनी पड़ती थी। उनके साथ भी वही हुआ। साल 2002 में सॉफ्टवेयर इंडस्ट्री में स्लोडाउन चल रहा था। नौकरी पाना काफी कठिन था। फिर भी अमित थे वो आशावान। बेरोजगारी का एक वक्त उन्होंने भी झेला। इस बीच नौकरियों की तलाश भी जारी रखी। मुश्किलों के कई थपेड़ों को खाने के बाद उन्हें जॉब मिल ही गई। कमाई का रास्ता साफ हुआ और उनके कदम बेहतरी के ओर और बढ़ते चले गए। 

उनका कुछ साल कई कंपनियों में भारत में ही काम किया। आज के दौर में जिन इलेक्ट्रिकल अपलाएंसेज को खरीदते हुए आप उन पर स्टार-रेंटिंग देखना नहीं भूलते, उसे भारत में शुरु करने वालों में उनकी भी अहम भूमिका थी। ऊर्जा-संरक्षण की तरफ उनका काम भारत से ही शुरू हो गया था। ये काम करते हुए उनके जुनून को जैसे जिंदगी मिल गई थी। उनका काम इतने तारीफ-ए-काबिल था कि भारत में ऊर्जा-संरक्षण पर कुछ साल काम करने के बाद उन्हें अमेरिका जाने का मौका लगा।

वहां जाने के बाद भी वो इस मुद्दे पर लगातार काम कर रहे हैं। फर्क बस इतना कि उनका काम अब अफ्रीका से लेकर साउथ-ईस्ट एशिया तक फैल गया है। वो कई देशों की सरकारों के साथ मिलकर इस चिंतनीय मुद्दे पर काम कर रहे हैं। वो कहते हैं कि सपने को जीना काफी सुखद अहसास होता है। अब जब वो अपने पैशन के लिए काम कर रहे हैं तब उनके मन में एक और ख्वाहिश बची है। वो है अपने देश की सेवा करना। वो भारत लौटकर इस समस्या का बड़ा समाधान निकालना चाहते हैं। 


उभरते छात्रों के लिए उनका बस एक ही संदेश है-'' अपने आप पर भरोसा कभी नहीं छोड़ो। अपने लिए वक्त जरूर निकालो और दुनिया की फिक्र किए बगैर बस आगे बढ़ो।''
 
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