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AFRI: एएफआरआई और JICA मिलकर राजस्थान में वानिकी और जैव विविधता को देंगे बढ़ावा, केंद्रीय मंजूरी का इंतजार

Sat, 08 Nov 2025 03:32 PM IST
शाहीन परवीन एजुकेशन डेस्क, अमर उजाला
एजुकेशन डेस्क, अमर उजाला Published by: शाहीन परवीन Updated Sat, 08 Nov 2025 03:32 PM IST
सार

Environmental Research: एएफआरआई और जापानी विश्वविद्यालय मिलकर राजस्थान में वानिकी और जैव विविधता को बढ़ावा देने के लिए साझेदारी कर रहे हैं। इस सहयोग के तहत रेत के टीलों के स्थिरीकरण और पर्यावरण संरक्षण पर भी ध्यान दिया जाएगा।

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AFRI, Japanese universities to boost biodiversity and forestry efforts
AFRI - फोटो : afri.icfre.org (Edited By Amar ujala)

विस्तार

AFRI: जोधपुर स्थित शुष्क वन अनुसंधान संस्थान (AFRI) और जापान अंतर्राष्ट्रीय सहयोग एजेंसी (JICA) मिलकर राजस्थान में वानिकी और जैव-विविधता के क्षेत्र में सहयोग कर रहे हैं। इस साझेदारी का मुख्य उद्देश्य जंगलों और वनस्पति संरक्षण से जुड़े अनुसंधान और तकनीकी मदद को बढ़ावा देना है। 

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इसके तहत जापानी विश्वविद्यालयों को भी शामिल किया जाएगा ताकि रेत के टीलों के स्थिरीकरण जैसी समस्याओं पर वैज्ञानिक और तकनीकी समाधान निकाले जा सकें।

जापानी विश्वविद्यालयों की भागीदारी के लिए केंद्रीय मंजूरी का इंतजार

एएफआरआई केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के अंतर्गत भारतीय वानिकी अनुसंधान और शिक्षा परिषद का हिस्सा है।

संस्थान ने पिछले वर्ष दिसंबर में केंद्र सरकार को राजस्थान वनरोपण एवं जैवविविधता परियोजना में जापानी विश्वविद्यालयों के छात्रों को शामिल करने का प्रस्ताव प्रस्तुत किया था।

एएफआरआई के लिंक अधिकारी डॉ. तरुण कांत ने पीटीआई को बताया कि जापानी विश्वविद्यालयों को शामिल करने का प्रस्ताव केंद्रीय मंजूरी का इंतजार कर रहा है।

कांत ने कहा कि एएफआरआई रेत के टीलों के स्थिरीकरण, वन क्षेत्र मानचित्रण और अन्य अनुसंधान-उन्मुख गतिविधियों सहित विशिष्ट घटकों में योगदान देगा।

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एएफआरआई रेत के टीलों के स्थिरीकरण और रेगिस्तान संरक्षण में सक्रिय

उन्होंने बताया कि संस्थान राजस्थान के रेगिस्तानी इलाकों में रेत के टीलों के स्थिरीकरण के लिए एक मॉडल भी विकसित कर रहा है। उन्होंने आगे बताया कि एएफआरआई राजस्थान वन विभाग के साथ मिलकर विभिन्न परियोजनाओं पर काम कर रहा है और तकनीकी सहायता व विशेषज्ञता प्रदान कर रहा है।

रेगिस्तानों को “उन्मूलन” करने के विचार पर, कांत ने कहा कि ऐसी धारणा पर्यावरण संरक्षण के सिद्धांतों के विपरीत है, और उन्होंने जोर देकर कहा कि रेगिस्तान पारिस्थितिकी तंत्र का एक अभिन्न अंग हैं और उन्हें संरक्षित किया जाना चाहिए।

उन्होंने कहा कि रेगिस्तानी वनस्पति में जलवायु-प्रतिरोधी वृक्ष प्रजातियां शामिल हैं, जो अत्यधिक वर्षा के कारण वास्तव में प्रभावित हो सकती हैं।

कांत ने कहा कि वास्तविक चुनौती बंजर रेगिस्तानी भूमि को पुनः प्राप्त करने में है। उन्होंने कहा कि प्रयासों को स्थानीय प्रजातियों के वृक्षारोपण को बढ़ावा देकर तथा इन शुष्क भू-दृश्यों में पारिस्थितिकी संतुलन बहाल करके रेगिस्तानी जैव विविधता को संरक्षित करने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।

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