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Ukraine Crisis : अपनी धरती पर लौटे तो फूट पड़ा आंसुओं का सैलाब, 100 घंटे बाद आई मुस्कान

Mon, 28 Feb 2022 05:26 AM IST
दुष्यंत शर्मा सर्वेश कुमार/आदित्य पाण्डेय, नई दिल्ली
सर्वेश कुमार/आदित्य पाण्डेय, नई दिल्ली Published by: दुष्यंत शर्मा Updated Mon, 28 Feb 2022 05:26 AM IST
सार

बस से हंगरी सीमा को पार कर बुडापेस्ट से विमान में हुए सवार। देश वापसी पर केंद्र-राज्य सरकार का किया शुक्रिया।

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When indian students returned to home land tears broke out
वतन वापसी... - फोटो : amar ujala

विस्तार

पश्चिमी यूक्रेन के उझोरोड और बुडापोस्ट से दिल्ली एयरपोर्ट पर जब विमान से छात्रों का दल पहुंचा तो करीब 100 घंटे बाद उनके चेहरे पर खुशियां लौटी। रूस की तरफ से लगातार यूक्रेन पर होने वाले हमले से छात्रों की नींद गायब हो गई थी। केंद्र सरकार के सहयोग से यूक्रेन संकट के बीच फंसे मेडिकल के छात्र-छात्राएं ने हंगरी की सीमा को बस से पार किया। इसके बाद बुडापेस्ट एयरपोर्ट से जब रविवार को विमान से दिल्ली पहुंचे तो स्वागत में केरल के अधिकारी और परिजन और दोस्त भी एयरपोर्ट पर मौजूद थे। उनके चेहरे पर इस बात की खुशी थी कि जंग के बीच से अपनी जिंदगी को बचाते हुए अपने देश पहुंचे। 

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नजदीकी शहर(उझोरोड)में उझोरोड नेशनल यूनिवर्सिटी के छात्र बस से पहले से हंगरी सीमा को पार करने के बाद दूसरी बस से बुडापेस्ट एयरपोर्ट पहुंचे। इस बीच हंगरी सीमा तक पहुंचने में करीब 45 मिनट लगे और वहां औपचारिकताएं पूरी करने के बाद दूसरी बस से करीब सवा चार घंटे बाद बुडापेस्ट एयरपोर्ट पहुंचे। मेडिकल कॉलेज में एमबीबीएस के पहले वर्ष के छात्र(केरल निवासी)डिट्टो राजू ने कहा यूनिवर्सिटी में सभी सुरक्षित जगह पर थे। हालात बिगड़ने के बाद भारत लौटने के लिए छात्र टिकट के लिए भटकने लगे। 
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राजू ने बताया कि यूक्रेनियाई रिव्निया की दिक्कत न हो इसलिए शुरुआत में बैंक से नकदी निकाल लिए। केरल के ही दूसरे छात्र अल आमीन ने बताया कि जैसे ही लड़ाई शुरू हुई परिवार के सदस्यों की धड़कनें तेज हो गईं। लगातार मोबाइल से संपर्क में था। केंद्र और केरल सरकार ने उन्हें इस संकट से उबारने में बेहद अहम भूमिका निभाई, इसे कभी भूल नहीं सकते हैं। हालांकि उझोरोड से कीव तक ट्रेन से जाने में करीब 12 घंटे का वक्त लगता है, इसलिए उझोरोड नेशनल यूनिवर्सिटी के छात्रों को समय रहते हुए सरकार ने देश तक लाने में मदद की। 
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छात्रों ने सरकारों का शुक्रिया अदा करते हुए दुआएं मांगी कि हालात जल्द सामान्य हो ताकि दोबारा पढ़ाई करने का मौका मिल सके। रविवार को पहुंचने वाले 16 छात्रों के दल में मौजूद छात्रा मारिया ने बताया कि डर तो काफी लग रहा था, लेकिन सुरक्षित बच गए। केंद्र और राज्य सरकार के साथ यूक्रेन यूनिवर्सिटी की तरफ से भी हरसंभव सहयोग की तारीफ करते हुए कहा कि दिल्ली लौटने पर भी केरल सरकार के अधिकारियों ने केरल भवन में सभी तरह की सहूलियतें छात्रों को मुहैया करवाई गई। दोपहर बाद खाना खाने के बाद छात्रों का समूह शाम पांच बजे की फ्लाइट से केरल के लिए रवाना हो गया। 

यूक्रेन की रिव्निया को नहीं बदल सके रुपये में, दोस्तों की मदद से पहुंचे घर
यूक्रेन के उझोरोड नेशनल यूनिवर्सिटी के छात्रों ने बताया कि इस युद्ध के दौरान उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती नकदी की हो गई। जैसे ही हालात बिगड़ने लगे, बैंकिंग सेवाएं पहले सुस्त हुई, फिर अंतरराष्ट्रीय बैंकों की सेवाएं तकरीबन बंद हो गईं। ऐसे में देश लौटने के लिए रास्ते के खर्च के लिए भी यूक्रेन की मुद्रा की किल्लत होने लगी। अपने दोस्तों के साथ मिलकर काम चलाया। छात्र राजू ने बताया कि उनके पास अभी भी करीब 1500 यूक्रेन की मुद्रा(रिव्निया) है।

दिल्ली एयरपोर्ट पर पहुंचने के बाद जब एक्सचेंज(यूक्रेन की मुद्रा को भारतीय मुद्रा में परिवर्तित) के लिए पहुंचे तो इस मुद्रा को लेने से इंकार कर दिया गया। ऐसे ही कई छात्रों की मुद्राएं फिलहाल केवल साथ रखने वाली हो गई हैं। छात्रों को इस बात का शुकून है कि सरकार की मदद से उन्हें देश में पहुंचने का मौका मिला। उन्हें देखकर परिजनों ने भी राहत की सांस ली। हालांकि कुछ छात्रों के पास युक्रेन की मु्द्रा थी, ऐसे में उन्हें अपने घर तक पहुंचने के लिए दोस्तों की सहायता ली। एक रिव्निया की कीमत करीब 2.52 रुपये है।

औरैया के दिव्यांशु वापस लौट आए, उनके 15 दोस्त यूक्रेन में फंसे रह गए

औरैया के दिव्यांशु रविवार को अपने वतन सुरक्षित वापस आ गए, लेकिन उनके 15 दोस्त अभी यूक्रेन में ही फंसे हैं। दिव्यांशु दिल्ली से अपने घर औरैया जा रहे थे, लेकिन उनका मन यूक्रेन में अपने दोस्तों के पास लगा था। उनके दोस्त भारत आने के लिए फ्लाइट पकड़ने 24 फरवरी को यूक्रेन की राजधानी कीव गए थे। लेकिन रूसी हमले के बाद शहर में मार्शल लॉ लग गया और वो फंस गए।

यूक्रेन में फंसे दिव्यांशु के दोस्तों में लखनऊ के मो. अनस, बिजनौर की गुरप्रीत कौर, छत्तीसगढ़ की यूविका मलागर जैसे बाकी दोस्त हैं। यूक्रेन में तनावपूर्ण महौल के बीच विश्वविद्यालय ने देशी-विदेशी छात्रों को ऑनलाइन पढ़ाई का विकल्प दिया था। ऐसे में दिव्यांशु और उनके तमाम साथियों को यू्क्रेन स्थित भारतीय दूतावास की ओर से लगातार एसएमएस भेजा जा रहा था, कि जबतक यूक्रेन के हालात सामान्य नहीं हो जाते वो स्वदेश लौटकर ऑनलाइन कक्षाओं के माध्यम से पढ़ाई करें। इस बात को ध्यान में रखते हुए छात्रों ने वतन वापसी के लिए फ्लाइटें बुक करा रखी थीं। दिव्यांशु ने 27 फरवरी को और उनके तमाम दोस्तों ने 24 फरवरी को कीव हवाई अड्डे से दिल्ली आने के लिए फ्लाइट बुक कराई थी। 

कीव पहुंचते ही छिड़ गई लड़ाई
दिव्यांशु के दोस्त उजहोरोद नेशनल मेडिकल यूनिवर्सिटी से 23 फरवरी को ट्रेन के जरिए कीव शहर पहुंचे। 24 फरवरी शाम को उनकी दिल्ली के लिए फ्लाइट थी। लेकिन सुबह जैसे ही वो कीव पहुंचे वहां मार्शल लॉ लग गया। 

भूखे-प्यासे रेलवे स्टेशन पर रहे
कीव रेलवे स्टेशन पर सभी छात्र फंस गए। यहां वह किसी तरह जान बचाकर तीन दिन-रात भूखे-प्यासे पड़े रहे। दिव्यांशु ने बताया कि रविवार को सुबह भारतीय दूतावास ने सभी छात्रों से संपर्क किया और इन्हें बस में बैठाकर उजहोरोद ले आए हैं। कल सुबह इन्हें हंगरी के बुड़ापेस्ट हवाई अड्डे ले जाया जाएगा, जहां से सोमवार शाम को संभव है इन्हें दिल्ली की फ्लाइट मिल जाए।

परिस्थियां तय करेंगी इन छात्रों का भविष्य
यूक्रेन में मेडिकल की पढ़ाई कर रहे छात्रों का भविष्य परिस्थितियां तय करेंगी। औरैया के दिव्यांशु शेखर हों, मथुरा के वंशी प्रताप सिंह या फिर मरादाबाद के इमरान अली जैसे करीब 16 हजार भारतीय छात्रों का भविष्य अधर में लटका है। दो देशों की लड़ाई में छात्रों की पढ़ाई का क्या होगा, अभी तय नहीं है। दिव्यांशु शेखर प्रथम वर्ष के छात्र हैं और पिछले साल दिसम्बर में यूक्रेन पढ़ाई करने गए थे। लड़ाई खत्म होने के बाद जैसा माहौल होगा, वो वैसा कदम उठाएंगे।

यूक्रेन से दिल्ली पहुंचे तो यूपी भवन में भावुक हो गए इमरान अली

यूक्रेन से दिल्ली पहुंचे तो यूपी भवन में बातचीत करते हुए छात्र इमरान अली भावुक हो गए। खुद को संभालते हुए इमरान बोले... अभी परिजनों से तो नहीं मिला, लेकिन लगता है कि घर आ गया हूं। सरकार ने यूक्रेन से हमें लाने में बड़ी मदद की। एयरपोर्ट से यूपी भवन मेहमान बनाकर लेकर आई। यहां के अधिकारियों ने बड़े प्यार से हाल-चाल पूछा, नहाने-खाने का बंदोबस्त किया और अब सरकारी कार में बैठाकर घर भेज रहे हैं।

इमरान ने बताया कि 24 फरवरी की तड़के 4 बजे अचानक उनकी आंख खुली, तो उन्हें जोर-जोर से आपातकालीन अलार्म बजता सुनाई पड़ा। उन्होंने फोन के जरिए अपने हॉस्टल में लगातार अलार्म बजने की वजह जानी, तो उन्हें बताया गया कि रूस ने यूक्रेन पर हमला कर दिया है। हकीकत जानने के बाद उनके अगले चार दिन उलझन में गुजरे। उन्हें और वहां सभी को यही डर सता रहा था कि कहीं उनके ऊपर भी बम न गिर जाए। इमरान बमबारी वाली जगह से करीब 700 किलोमीटर दूर वेस्ट यूक्रेन में थे। वह उझोरोड नेशनल मेडिकल यूनिवर्सिटी में पढ़ाई करते हैं। यह यूक्रेन का सबसे शांत इलाका है। क्योंकि, यह यूरोप से सटा हुआ है। यहां से स्लोवाकिया, पोलैंड और हंगरी आधे घंटे में पहुंचा जा सकता है।

जेब में नहीं थे पैसे, मेरा देश मुझे वापस ले आया
यूक्रेन से रविवार को वतन लौटने वाले 240 छात्रों में गाजियाबाद के देवेश कौशिक भी थे। यूपी भवन में वह उत्तर प्रदेश के 37 छात्रों के साथ मौजूद थे। उन्होंने बताया कि रूस से युद्ध शुरू होते ही यूक्रेन के बैंक बंद हो गए। उनके पास उस वक्त पैसे खत्म हो गए थे, जबकि यूक्रेन की प्रिवत बैंक के उनके खाते में 750 डॉलर जमा थे, लेकिन उसे वह निकाल नहीं पा रहे थे। वह जकरपातिया स्टेट में थे, जो यूक्रेन का शांत इलाका माना जाता है, लेकिन युद्ध शुरू होते ही वह अशांत हो गया था। 25 फरवरी को भारतीय दूतावास के कॉन्ट्रेक्टर से उनकी मुलाकात हुई, जिसने उन्हें बस के जरिए हंगरी की सीमा में पहुंचा दिया। इसके बाद भारतीय दूतावास की निगरानी में करीब 400 किलोमीटर की बस यात्रा कर वह बुडापेस्ट हवाई अड्डे पहुंचे, जहां वह बाकी भारतीय साथियों के साथ अपने वतन लौट पाए। मेरी जेब में पैसे नहीं थे, लेकिन मेरा देश मुझे वापस ले आया।

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