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Ukraine Crisis : आसमान में धुंआ, सेना सड़क पर और पब्लिक बंकर में, डराने वाली है आपबीती

Sat, 26 Feb 2022 05:31 AM IST
दुष्यंत शर्मा अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली Published by: दुष्यंत शर्मा Updated Sat, 26 Feb 2022 05:31 AM IST
सार

बताते हैं कि आखिरी वक्त तक हमें झूठा दिलासा देते रहे यूक्रेन के मेडिकल कॉलेज। छात्रों ने कहा- 15 फरवरी की एडवाइजरी पर कॉलेज प्रबंधन ने बोला झूठ। भारतीय दूतावास से भी स्पष्ट नहीं मिली जानकारी, 10 दिन पहले से टिकट भी नहीं मिला।

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Ukraine Crisis : Smoke in the sky, Army on the road and public in bunkers
यूक्रेन में फंसे भारतीय - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी

विस्तार

मेरा नाम डॉ. जितेंद्र बहल हैं। मेरा परिवार दिल्ली के नजफगढ़ इलाके में रहता है। दो दिन पहले तक मेरा कॉलेज प्रबंधन हमले से साफ इंकार कर रहा था। मैंने खुद अपने प्रोफेसर से इसे लेकर बात भी की लेकिन किसी भी तरह के गंभीर हालात होने से साफ इंकार कर दिया और उन्होंने मुझसे यहां तक कहा कि क्लास आगे भी जारी रहेगी। इसलिए क्लास छोड़ना नहीं है। मुझे फिर भी तसल्ली नहीं हुई तो मैं प्रबंधन के पास पहुंचा और वहां भी सवाल किया लेकिन तब भी मुझे यही जवाब मिला, ‘घबराओ मत, कुछ नहीं होगा’।

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मुझे फिर भी विश्वास नहीं हो रहा था क्योंकि 15 फरवरी को भारतीय दूतावास ने सभी लोगों से वतन वापसी की सलाह दी थी। लेकिन तब तक काफी देर हो गई। हाथ में एडवाइजरी की एक कॉपी लेकर मैं कॉलेज घूमते रहे लेकिन सभी जगह मुझे स्थिति सामान्य रहने का दिलासा ही दिया गया। बाहर भी शहर में इस तरह की कोई हलचल नहीं थी जिसकी वजह से अब मैं भी सोचने लगे कि रूस हमला नहीं करेगा।
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मैंने अपने परिवार तक को चिंता न करने की सलाह देते हुए सब कुछ ठीक होने की उम्मीद तक जता दी। लेकिन मन में कहीं न कहीं डर था जिसकी वजह से मैंने इंटरनेटर पर टिकट भी लेने का प्रयास किया जो नहीं मिल सका। अब मैं इस इंतजार में हूं कि कब मुझे भारत सरकार एयरलिफ्ट कर स्वदेश वापस ला सके।

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बंकर में सांस लेना भी मुश्किल

मेरा नाम आदित्य है। मैं 17 साल का हूं और मेरा परिवार दिल्ली के राजेंद्र नगर में रहता है। एक महीने पहले ही यहां आया हूं। खरकिव यूनिवर्सिटी में एडमिशन मिला। यहां की स्थिति बहुत भयानक है। कल और आज में एक दम तस्वीर ही बदल गई है। आसमान में धुआं फैला है और सड़क पर सेना ही सेना है। बाहर सब कुछ बंद है। अंदर हम अस्पताल के ठीक नीचे बने बंकर में पड़े हैं। यहां थोड़ा बहुत नेटवर्क आता है। जैसे ही सायरन बजता है हम लाइट बंद कर बंकर में अंदर की ओर घुस जाते हैं। सुबह मम्मी से बात हुई, बहुत घबरा रही थीं फिर मैंने उन्हें अपना फोटो भी भेजा। बाहर के हालात ऐसे हैं कि धमाके और गोलीबारी की आवाज से दिल बैठा जा रहा है। 

आप यकीन नहीं मानेंगे, रात को माइनस पांच डिग्री तापमान था। मेरे पास एक ही कंबल था और उससे भी ठंड नहीं जा रही थी। रात भर मैं बंकर में ही बैठा रहा। ऊपर चीख-पुकार की आवाजें आ रही थीं। मेरे साथ दिल्ली के 11 और छात्र हैं, जो इसी बंकर में है। रात भर हम में से किसी को वॉशरूम नहीं जाने दिया गया। हमारे पास खाना पहले से कम था और अब थोड़ा बहुत ही बचा है। सुबह मुझे एक ब्रेड दिया। ऊपर जब भी कोई बम गिरता है तो नीचे बंकर में धूल उड़ रही है। मुझे अस्थमा होने की वजह से और ज्यादा परेशानी हो रही है। कभी मास्क लगा लेता हूं तो कभी धूल से बचने के लिए किसी खिड़की की तरफ हवा लेने पहुंच जाता हूं। कल पूरी रात मैंने यही सब किया। 

मेरे पिता की एक साल पहले कोरोना से मौत हुई। वे दिल्ली में ही एक प्राइवेट अस्पताल में काम करते थे। ड्यूटी के दौरान कोविड होने से उनकी हालत खराब हुई और फिर चौथे दिन उनकी मौत हो गई थी। अभी एडमिशन मिलने पर नाना-नानी से काफी सपोर्ट किया और मुझे लोन लेकर यहां पढ़ने भेज दिया। मेरे पास अभी इतने रुपये भी नहीं कि मैं अपना टिकट करवा सकूं। लेकिन मेरे साथ वालों ने टिकट कराए थे और फ्लाइट लेने से पहले ही हमला हो गया। अब हम सब दो दिन से जमीन के नीचे ही मिट्टी और ईटों के बीच पड़े हुए हैं। 

(यूक्रेन की राजधानी कीव से आदित्य अग्रवाल ने जैसा अमर उजाला संवाददाता परीक्षित निर्भय को बताया)

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