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अर्धसैनिक बलों को नई पेंशन योजना से बाहर करने को चुनौती
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अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली। हाईकोर्ट ने अर्धसैनिक बलों को नई पेंशन योजना से बाहर करने को चुनौती याचिका पर केंद्र को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। याचिका में तर्क रखा गया है कि पुरानी पेंशन योजना से गृह मंत्रालय के तहत बलों का बहिष्कार भेदभावपूर्ण और समानता के सिद्धांतों का उल्लंघन है।
न्यायमूर्ति मनमोहन और न्यायमूर्ति नवीन चावला की पीठ ने केंद्र सरकार को चार सप्ताह में अपना पक्ष रखने का निर्देश दिया है। अदालत ने यह आदेश एक ट्रस्ट द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया है। यह ट्रस्ट सशस्त्र बलों और उनके परिवारों के लिए काम करता है।
याची ट्रस्ट ‘हमारा देश हमारे जवान’ ने केंद्र को निर्देश देने की मांग की है कि रक्षा मंत्रालय के तहत आने वाले सशस्त्र बलों के साथ समानता में गृह मंत्रालय (गृह मंत्रालय) के तहत आने वाले बलों को पुरानी पेंशन योजना में शामिल किया जाए। इससे पहले भी इस मुद्दे को लेकर कई याचिकाएं विचाराधीन हैं।
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मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ ने 20 अगस्त को ट्रस्ट की याचिका पर सुनवाई से इनकार करते हुए कहा था कि मुद्दे पर पहले से ही सुनवाई लंबित है और याची उन्हीं याचिकाओं में पक्ष बनने के लिए आवेदन दायर कर सकता है।
इससे पहले फरवरी 2020 में खंडपीठ ने सीआरपीएफ के एक जवान द्वारा पेंशन दिए जाने के संबंध में सेना, नौसेना और वायुसेना के समकक्ष व्यवहार करने की मांग वाली याचिका पर नोटिस जारी किया था। इसके बाद अन्य कर्मियों द्वारा कई अन्य याचिकाएं उच्च न्यायालय के समक्ष दायर की गईं।
अधिवक्ता अजय के. अग्रवाल के माध्यम से दायर आवेदन में ट्रस्ट ने कहा है कि अधिकारी गृह मंत्रालय यानी गृह मंत्रालय के तहत सेनाओं को पुरानी पेंशन योजना को अवैध रूप से नकार रहे हैं। बीएसएफ, सीआईएसएफ, सीआरपीएफ आदि ने उन्हें इस आधार पर 2004 में शुरू की गई नई अंशदायी पेंशन योजना के अधीन कर दिया कि वे संघ के सशस्त्र बल नहीं हैं।
याचिका में कहा गया है कि पुरानी पेंशन योजना से गृह मंत्रालय के तहत बलों का बहिष्कार भेदभावपूर्ण और समानता के सिद्धांतों का उल्लंघन है। गृह मंत्रालय के अधीन इन सशस्त्र बलों के कर्तव्य रक्षा मंत्रालय के अधीन सशस्त्र बलों से कम नहीं हैं। ये ताकतें देश को बाहरी आक्रामकता के साथ-साथ आंतरिक अशांति से बचा रही हैं।
याचिका में कहा गया है कि वर्तमान में गृह मंत्रालय के तहत सशस्त्र बलों की कुल संख्या 14,44,018 है। वहीं, रक्षा मंत्रालय के तहत सशस्त्र बलों की कुल संख्या लगभग 12 लाख है।
याचिका में कहा गया है कि अगस्त 2004 में केंद्र ने खुद स्पष्टीकरण जारी किया था कि गृह मंत्रालय के तहत केंद्रीय बलों के साथ-साथ संघ के सशस्त्र बल भी बीएसएफ, सीआईएसएफ, सीआरपीएफ, आईटीबीपी, एनएसजी, एसएसबी और असम राइफल्स को शामिल करेंगे।
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नई दिल्ली। हाईकोर्ट ने अर्धसैनिक बलों को नई पेंशन योजना से बाहर करने को चुनौती याचिका पर केंद्र को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। याचिका में तर्क रखा गया है कि पुरानी पेंशन योजना से गृह मंत्रालय के तहत बलों का बहिष्कार भेदभावपूर्ण और समानता के सिद्धांतों का उल्लंघन है।
न्यायमूर्ति मनमोहन और न्यायमूर्ति नवीन चावला की पीठ ने केंद्र सरकार को चार सप्ताह में अपना पक्ष रखने का निर्देश दिया है। अदालत ने यह आदेश एक ट्रस्ट द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया है। यह ट्रस्ट सशस्त्र बलों और उनके परिवारों के लिए काम करता है।
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याची ट्रस्ट ‘हमारा देश हमारे जवान’ ने केंद्र को निर्देश देने की मांग की है कि रक्षा मंत्रालय के तहत आने वाले सशस्त्र बलों के साथ समानता में गृह मंत्रालय (गृह मंत्रालय) के तहत आने वाले बलों को पुरानी पेंशन योजना में शामिल किया जाए। इससे पहले भी इस मुद्दे को लेकर कई याचिकाएं विचाराधीन हैं।
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मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ ने 20 अगस्त को ट्रस्ट की याचिका पर सुनवाई से इनकार करते हुए कहा था कि मुद्दे पर पहले से ही सुनवाई लंबित है और याची उन्हीं याचिकाओं में पक्ष बनने के लिए आवेदन दायर कर सकता है।
इससे पहले फरवरी 2020 में खंडपीठ ने सीआरपीएफ के एक जवान द्वारा पेंशन दिए जाने के संबंध में सेना, नौसेना और वायुसेना के समकक्ष व्यवहार करने की मांग वाली याचिका पर नोटिस जारी किया था। इसके बाद अन्य कर्मियों द्वारा कई अन्य याचिकाएं उच्च न्यायालय के समक्ष दायर की गईं।
अधिवक्ता अजय के. अग्रवाल के माध्यम से दायर आवेदन में ट्रस्ट ने कहा है कि अधिकारी गृह मंत्रालय यानी गृह मंत्रालय के तहत सेनाओं को पुरानी पेंशन योजना को अवैध रूप से नकार रहे हैं। बीएसएफ, सीआईएसएफ, सीआरपीएफ आदि ने उन्हें इस आधार पर 2004 में शुरू की गई नई अंशदायी पेंशन योजना के अधीन कर दिया कि वे संघ के सशस्त्र बल नहीं हैं।
याचिका में कहा गया है कि पुरानी पेंशन योजना से गृह मंत्रालय के तहत बलों का बहिष्कार भेदभावपूर्ण और समानता के सिद्धांतों का उल्लंघन है। गृह मंत्रालय के अधीन इन सशस्त्र बलों के कर्तव्य रक्षा मंत्रालय के अधीन सशस्त्र बलों से कम नहीं हैं। ये ताकतें देश को बाहरी आक्रामकता के साथ-साथ आंतरिक अशांति से बचा रही हैं।
याचिका में कहा गया है कि वर्तमान में गृह मंत्रालय के तहत सशस्त्र बलों की कुल संख्या 14,44,018 है। वहीं, रक्षा मंत्रालय के तहत सशस्त्र बलों की कुल संख्या लगभग 12 लाख है।
याचिका में कहा गया है कि अगस्त 2004 में केंद्र ने खुद स्पष्टीकरण जारी किया था कि गृह मंत्रालय के तहत केंद्रीय बलों के साथ-साथ संघ के सशस्त्र बल भी बीएसएफ, सीआईएसएफ, सीआरपीएफ, आईटीबीपी, एनएसजी, एसएसबी और असम राइफल्स को शामिल करेंगे।