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पटपड़गंज गांव : कभी हुआ करता था ठहरने का ठिकाना, फिर बना दिल्ली का पहला औद्योगिक 'अड्डा' और अब...
Sun, 25 Jul 2021 06:25 AM IST
दुष्यंत शर्मा
आदित्य पाण्डेय, नई दिल्ली
आदित्य पाण्डेय, नई दिल्ली
Published by: दुष्यंत शर्मा
Updated Sun, 25 Jul 2021 06:25 AM IST
सार
- पुराने समय में सराय के तौर पर होता था पटपड़गंज गांव का इस्तेमाल
- पश्चिमी यूपी को दिल्ली से जोड़ने का रहा अहम स्थल
- दूर-दूर के कारोबारियों का होता रहा ठहराव
- जरूरत बढ़ने पर बाद में औद्योगिक क्षेत्र के रूप में हुआ विकास
- 1992 में पटपड़गंज औद्योगिक क्षेत्र हुआ दिल्ली-मेरठ हाइवे के नजदीक शिफ्ट
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प्राचीन शिव मंजिर...
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
कभी पटपड़गंज गांव पूर्वी दिल्ली का पहला औद्योगिक क्षेत्र हुआ करता था। अब यहां मल्टी स्टोरी सोसायटियां बस चुकी हैं। मुगलों और अंग्रेजों के शासनकाल में आगरा और दिल्ली के बीच होने वाले व्यापार के लिए पटपड़गंज महत्वपूर्ण सराय थी। आगरा से आने वाला माल पहले पटपड़गंज लाया जाता था, फिर दिल्ली जाता था।
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देश की आजादी के बाद यमुनापार को दिल्ली का हिस्सा बनाया गया। पटपड़गंज पहले उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले का हिस्सा था। पटपड़गंज गांव के निवासी सुधीर शर्मा बताते हैं कि उनके पास उनकी पुस्तैनी जमीनों के कई पुराने कागजात पड़े हैं, जिसमें पटपड़गंज मेरठ जिले के हिस्से के रूप में दर्ज है। 1980-90 के बीच पूर्वी दिल्ली में तेजी से आबादी का विस्तार हुआ।
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इस वक्त तक पटपड़गंज गांव और उसके आसपास बड़ी संख्या में औद्योगिक इकाइयां थीं। साथ ही यहां पर तेजी के साथ हाउसिंग सोसायटियों का भी विकास शुरू हो गया था। रिहायसी क्षेत्र बढ़ने के कारण 1992 में दिल्ली-मेरठ हाइवे से जुड़े पटपड़गंज औद्योगिक क्षेत्र का विकास हुआ। बाद में पटपड़गंज गांव व उसके आस पास में स्थित सभी औद्योगिक इकाइयों को पटपड़गंज औद्योगिक क्षेत्र में स्थानांतरित कर दिया गया।
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व्यापारिक दृष्टिकोण से बनवाए गए थे आठ कुएं
पटपड़गंज में व्यापारिक दृष्टिकोण से आठ कुएं बनाए गए थे। इन कुओं पर व्यापारियों के लिए ठहरने, नहाने-धोने, खाने-पीने और आराम करने का पूरा बंदोबस्त रहता था। यह आठों कुए गांव के लाल डोरे को भी सुनिश्चित करते थे। पटपड़गंज गांव वासियों को इन कुओं की पूरी जानकारी है। कुओं के अवशेष आज भी यहां संरक्षित हैं।
मल्टी स्टोरी सोसायटी में तब्दील हो गया पटपड़गंज
पटपड़गंज गांव की करीब 106 बीघा जमीन पर अब मयूर विहार, आचार्य निकेतन, प्रताप नगर, शशि गार्डेन, पांडव नगर, तनता गार्डेन जैसी कॉलोनियां बस चुकी हैं। डीडीए की दो बड़ी सोसायटियों के अलावा 16 प्राइवेट ग्रुप हाउसिंग सोसायटियां विकसित हो चुकी हैं। एल्कॉन पब्लिक स्कूल समेत कई सरकारी और प्राइवेट स्कूल, निगम अस्पताल का निर्माण गांव की जमीन पर ही हुआ है।
यहां अत्याधिक मोर थे, इसलिए मयूर विहार पड़ा नाम
पटपड़गंज में एक समय ऐसा था जब यहां पर मोर की आबादी बहुत ज्यादा थी। इसीलिए कॉलोनी का नाम मयूर विहार पड़ा। पटपड़गंज निवासी सुंदरवीर ने बताया कि यमुना खादर में सब्जियों की खेती होती थी और आस-पास के इलाके में अत्याधिक पेड़ थे, जहां पर खूब मोर होते थे। लेकिन ऊंची बिल्डिंगों के कारण और पेड़ पौधे घट जाने के कारण यहां से मोर गायब होने लगे। अब यहां मुश्किल से मोर दिखते हैं।
सामाजिक सद्भाव को सहेजे हुए है पटपड़गंज गांव
पटपड़गंज गांव और इसके आस-पास में हाई-फाई सोसायटियां बस चुकी हैं। लेकिन पटपड़ज गांव की मिट्टी से आज भी पुरानी संस्कृति, सद्भावना और भाईचारे की महक उठती है। यहां के बुजुर्ग युवा पीढ़ी अपनी परंपराओं के साथ नए रंग-ढंग के साथ आगे बढ़ने का हौसला देते हैं। गांव की कुल आबादी आबादी 7500 है। इस गांव में सैकड़ो सालों से ब्राह्मण, क्षत्रिय, कई अनुसूचित जातियों और मुस्लिम समाज के लोग सौहार्द पूर्ण तरीके से रहते आ रहे हैं।
पुरानी यादों पर आज भी बैठक में होती है चर्चा...
पटपड़गंज गांव में सांई बाबा से लेकर भगवना राम सहित दर्जनों मंदिर हैं, चौक पर सैकड़ों साल से मंदिर के बगल मस्जिद स्थित है, लेकिन यहां हिंदू-मुस्लिम भाईचारे की मिसाल दी जाती है।
- सुधीर शर्मा, स्थानीय
पटपड़गंज का प्राचीन शिव मंदिर गांव का बैठका है, यहां पर सभी सामाजिक कार्य यहीं पर होते हैं, आठ कुओं में में से एक कुआं मंदिर के भीतर भी संरक्षित है।
- सुंदरवीर, स्थानीय
पटपड़गंज से पहले इस गांव का नाम घरौदा नीम का बांगड़ था, मुगलकाल में इस गांव का नाम साहिबागंज था, लेकिन गांव की मूल आबादी आज भी प्यार से रहती है।
- विनीत गौड़, स्थानीय
पहले पटपड़गंज से दिल्ली जाने के लिए आईएसबीटी के नजदीक लोहा पुल से जाना पड़ता था, सराय काले खांकी ओर जाने के लिए पैदल यमुना पार करना पड़ता था।
- हितेश त्यागी, स्थानीय