फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Delhi ›   delhi high court says Government erase distinction between right to protest and act of terror

दिल्ली हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी: सरकार ने विरोध के अधिकार और आतंकी हरकत में नहीं समझा फर्क

Tue, 15 Jun 2021 10:17 PM IST
शाहरुख खान अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली Published by: शाहरुख खान Updated Tue, 15 Jun 2021 10:17 PM IST
सार

दिल्ली पुलिस ने इन छात्रों को उत्तर पूर्वी दिल्ली दंगों के मामले में आतंकी साजिश के आरोप में मई 2020 में गिरफ्तार किया था। हाईकोर्ट ने यूएपीए के तहत आतंकी कृत्य की परिभाषा को अस्पष्ट बताने के साथ और उसके बेतकल्लुफ इस्तेमाल पर चेतावनी देते हुए निचली अदालत के उस आदेश को खारिज कर दिया

विज्ञापन
delhi high court says Government erase distinction between right to protest and act of terror
delhi high court - फोटो : PTI

विस्तार

सरकार ने विरोध की आवाज को दबाने की चिंता में विरोध के अधिकार और आतंकी कृत्य के बीच अंतर को मिटा दिया। अगर ऐसी मानसिकता को हवा मिलती है तो ये लोकतंत्र के लिए दुखद दिन होगा। ये कड़ी टिप्पणी हाईकोर्ट ने अवैध गतिविधि रोकथाम अधिनियम (यूएपीए) के तहत गिरफ्तार जेएनयू छात्राओं नताशा नरवाल, देवांगना कलिता और जामिया के छात्र आसिफ इकबाल तन्हा को जमानत देते हुए की। 
विज्ञापन


दिल्ली पुलिस ने इन छात्रों को उत्तर पूर्वी दिल्ली दंगों के मामले में आतंकी साजिश के आरोप में मई 2020 में गिरफ्तार किया था। हाईकोर्ट ने यूएपीए के तहत आतंकी कृत्य की परिभाषा को अस्पष्ट बताने के साथ और उसके बेतकल्लुफ इस्तेमाल पर चेतावनी देते हुए निचली अदालत के उस आदेश को खारिज कर दिया। 
विज्ञापन


जिसमें इन आरोपी छात्रों को जमानत देने से इनकार कर दिया गया था। हाईकोर्ट ने उक्त आदेशों के खिलाफ इन छात्रों की अपील को स्वीकार करते हुए उन्हें जमानत प्रदान की है। न्यायमूर्ति सिद्धार्थ मृदुल और न्यायमूर्ति अनूप जयराम भंभानी की खंडपीठ ने फैसला सुनाते हुए कहा कि हमारा मानना है कि हमारे राष्ट्र की नींव मजबूत आधार पर है और कॉलेज के छात्रों या शहर के बीच बनी यूनिवर्सिटी की समन्वय कमेटी के सदस्यों किसी द्वारा किए गए किसी भी प्रदर्शन, चाहे वह कितना भी दोषपूर्ण क्यों न हो, उससे हिलने वाली नहीं है।
विज्ञापन
विज्ञापन


खंडपीठ ने 113, 83 व 72 पन्नों के अपने तीन फैसलों में कहा हालांकि यूएपीए की धारा 15 में दी गई आतंकी कृत्य की परिभाषा काफी व्यापक है और कुछ हद तक अस्पष्ट भी है, लेकिन उसमें आतंक के जरूरी तत्व होने चाहिए और आतंकी कृत्य जैसे शब्द का प्रयोग बेतकल्लुफ अंदाज में करने की अनुमति ऐसे मामलों में नहीं दी जा सकती जो साफ तौर पर भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) के दायरे में आते हैं। 

खंडपीठ ने कहा हम ये कहने के मजबूर हैं कि ऐसा लगता है कि सरकार ने विरोध को दबाने की चिंता में संविधान में दिए गए विरोध के अधिकार और आतंकी कृत्य के बीच के अंतर को काफी हद तक अपने दिमाग में मिटा दिया। अगर इस मानसिकता को हवा मिलती है तो ये लोकतंत्र के लिए काला दिन होगा और ये खतरनाक होगा। इन मामलों में ऐसा कुछ नहीं है जिसके आधार पर इन कृत्यों को आतंकी कृत्य दिखाया जा सके। 

हाईकोर्ट ने जेएनयू छात्रा व पिंजरा तोड़ समूह की सदस्यों नताशा नरवाल, देवांगना कलिता और जामिया के छात्रा तन्हा को अपने पासपोर्ट जमा कराने और अभियोजन के किसी भी गवाह को प्रलोभन न देने और साक्ष्यों से छेड़छाड़ न करने की सख्त हिदायत दी है। 

तीनों को हिदायत दी है कि वे किसी भी गैर कानूनी में शामिल नहीं होंगे और दिए गए अपने पतों पर ही रहेंगे। दिल्ली दंगों के सिलसिले में कलिता पर चार, नरवाल पर तीन और तन्हा पर दो मामले हैं। अब इनके जेल से छूटने का रास्ता साफ हो गया है क्योंकि इन्हें अन्य मामलों में पहले ही जमानत मिल चुकी है। 

हाईकोर्ट ने कहा कि पुलिस के आरोपपत्र में ऐसा कतई कुछ भी नहीं है जिसे लगाए गए आरोपों के मद्देनजर यूएपीए की धारा 15 की रोशनी में संभावित आतंकी, धारा 17 के तहत आतंकी कृत्य के लिए फंड जुटाने एवं धारा 18 के तहत आतंकी कृत्य या आतंकी कृत्य करने की तैयारी के रूप में देखा जा सके। 
 

खंडपीठ ने इस बात पर भी गौर किया कि इस मामले में 16 सितंबर 2020 को आरोपपत्र दाखिल किया जा चुका है। इस मामले में 740 गवाह है और कोरोना के हालात के मद्देजर कोर्ट में मुकदमे की सुनवाई भी शुरू नहीं हो पाई है। 

नरवाल और कलिता के बारे में कहा 
हाईकोर्ट ने नरवाल व कलिता के विषय में कहा कि उनकी शैक्षिक पृष्ठभूमि, प्रोफाइल व पोजीशन के देखते हुए ऐसी आशंका का कोई कारण नहीं है कि वे देश छोड़कर चली जाएंगी, साक्ष्यों को नष्ट करेंगी या किसी गवाह को धमकाएंगी या किसी भी तरह मुकदमे की सुनवाई को प्रभावित करेंगी। 

खंडपीठ ने नरवाल के बारे में कहा कि जब उत्तर पूर्वी दिल्ली के कई इलाकों में हिंसा और दंगे हो रहे थे तब सीएए व एनआरसी के विरोध प्रदर्शन आयोजन करवाने में शामिल होने के अलावा उसके खिलाफ कोई आरोप नहीं है। हमारी राय में आरोपपत्र और उसमें दी गई सामग्री के अनुसार भी वह आरोप नहीं बनते जो लगाए गए हैं। सरकार मुद्दों को उलझाकर किसी को जमानत देने को विफल नहीं कर सकती। 

खंडपीठ ने कहा कि भड़काऊ भाषण देने, चक्का जाम करवाने, महिलाओं को धरने के लिए उकसाने तथा वहां सामान जमा करने तथा अन्य आरोप केवल इस बात का साक्ष्य हैं कि वह धरना आयोजन में शामिल थी लेकिन ऐसा कोई आरोप नहीं है कि उसने हिंसा भड़काई, या आतंकी कृत्य किया या इसकी साजिश की। 
 

कोर्ट ने कलिता के बारे में कहा

वहीं कलिता के बारे में खंडपीठ ने गौर किया कि उसने महिला अधिकार संगठन या अन्य समूह की सदस्य होने के नाते उसने सीएए और एनआरसी के विरोध में धरना प्रदर्शन करवाने में सहायता की और उसमें शामिल हुई। शांतिपूर्ण और बिना हथियार प्रदर्शन का मौलिक अधिकार की सीमा का उल्लंघन नहीं किया और उसे यूएपीए के तहत परिभाषित आतंकी कृत्य की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता जब तक उसके लिए जरूरी तत्व संबंधित आरोपों में हों। 

खंडपीठ ने कहा कि भड़काऊ भाषण देना या चक्का जाम करना उस समय असामान्य बात नहीं है जब सरकार व संसद के कार्यों का व्यापक स्तर पर विरोध हो रहा हो। अगर हम मान भी लें कि भड़काऊ भाषण, चक्का जाम, महिलाओं को प्रदर्शन के लिए उकसाना और अन्य कार्य जिनका कलिता पर आरोप हैं, अगर संविधान में दिए गए शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार की सीमा का उल्लंघन करते हैं, तब भी आतंकी कृत्य, उसकी साजिश या उसकी तैयारी के दायरे में नहीं कहे जाएंगे। 
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed