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शोधः आईपीयू के प्रोफेसर का दावा, कोरोना को रोक सकते हैं पौधों के रासायनिक तत्व

Sun, 06 Sep 2020 05:21 AM IST
नोएडा ब्यूरो अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली Published by: नोएडा ब्यूरो Updated Sun, 06 Sep 2020 05:21 AM IST
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Chemical elements of plants can prevent corona
रासायनिक क्रिया का प्रतीकात्मक चित्र... - फोटो : अमर उजाला

गुरु गोबिंद सिंह इंद्रप्रस्थ विश्वविद्यालय (आईपीयू) के प्रोफेसर ने पौधों में पाए जाने वाले प्राकृतिक 50 ऐसे रसायनिक तत्वों की पहचान की है, जो कोरोना वायरस के प्रोटीन पर हमला कर उसे निष्क्रिय बनाने में मील का पत्थर साबित हो सकते हैं।

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बायोटेक्नोलॉजी विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. सुरेश ने बताया कि प्रकृति में ऐसे बहुत से पौधे हैं जिनसे निकलने वाले प्राकृतिक रसायनों का इस्तेमाल कर गंभीर बीमारियों के इलाज में उपयोग किया जाता है।
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कोरोना ने पूरी दुनिया को अपनी जद में ले रखा है। इसी को ध्यान में रखते हुए उन्होंने एक हजार से अधिक पौधों से निकलने वाले रसायनिक तत्वों का इस्तेमाल कर कोरोना के प्रोटीन को निष्क्रिय बनाने की दिशा में अध्ययन किया है। इनमें 50 ऐसे रसायनिक तत्व मिले हैं जो कोरोना के संक्रमण को कम कर सकते हैं।
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उन्होंने बताया कि सबसे पहले रसायनिक तत्व वाले पौधों की खोज की गई। इसमें यह देखा जाता है कि पौधे के किस भाग से रसायनिक तत्व प्राप्त हो सकता है। यह जड़, तना या फिर पत्तियां कुछ भी हो सकते हैं। इन रसायनिक तत्वों को रसायन क्रिया द्वारा निकाला गया और उन्हें शोधित कर अन्य रासायनिक प्रक्रिया के लिए उपयोगी बनाया गया।

ऐसे किया परीक्षण
डॉ. सुरेश ने बताया कि रसायनिक तत्व की कोरोना के नॉनस्ट्रक्चरल प्रोटीन (एनएसपी) 15 के साथ प्रक्रिया कराई गई। इसमें देखा गया कि रसायनिक तत्वों ने कोरोना के प्रोटीन पर हमला कर उसे बांध दिया। इससे प्रोटीन किसी अन्य तत्व के साथ प्रक्रिया करने में निष्क्रिय हो गया। जाहिर है यदि कोरोना का प्रोटीन किसी अन्य तत्व से क्रिया करने में निष्क्रिय है तो संक्रमण फैलने का खतरा अपने आप में कम है। हालांकि, यह परीक्षण अभी कंप्यूटर पर किया गया है। आगे इसका परीक्षण वन्यजीवों और इंसानों पर भी किया जाएगा।


अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी हो चुका है प्रकाशित
डॉक्टर ने बताया कि उनके शोध को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी ख्याति प्राप्त हो चुकी है। कोरोना पर किया गया यह शोध गत तीन सितंबर को अंतरराष्ट्रीय जनरल फाइटोमेडिसिन में भी प्रकाशित हो चुका है।

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