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जेएनयू में हार के बाद एबीवीपी ने कहा- हमारी वैचारिक जीत हुई, वामदलों ने किया विचारधारा से समझौता

Sun, 16 Sep 2018 06:32 PM IST
अमित शर्मा, अमर उजाला, नई दिल्ली
अमित शर्मा, अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Sun, 16 Sep 2018 06:32 PM IST
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ABVP said left parties has compromised with their ideology after loss in JNU Election
वामपंथी पार्टियों को जेएनयू के अपने किले को बचाए रखने में कामयाबी हासिल हुई है। जेएनयू छात्रसंघ चुनाव में वामदलों को केंद्रीय पैनल की चारों सीटों पर भारी बहुमत से जीत हासिल हुई है। लेकिन, एबीवीपी का कहना है कि वामदलों की इस जीत में भी उनकी हार छिपी हुई है क्योंकि सिर्फ एक विश्वविद्यालय के छात्रसंघ के चुनाव में जीत हासिल करने के लिए उनके राष्ट्रीय नेताओं को मैदान में आना पड़ा और उन्हें अपनी विचारधारा के खिलाफ जाकर समझौता करना पड़ा। यह एबीवीपी की वैचारिक जीत है।  
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'वामपंथी विचारधारा के लिए यह एक शर्म की बात'

ABVP said left parties has compromised with their ideology after loss in JNU Election
एबीवीपी के राष्ट्रीय महामंत्री आशीष चौहान ने अमर उजाला से कहा कि वामपंथी विचारधारा के लिए यह एक शर्म की बात होनी चाहिए कि एक विश्वविद्यालय में अपनी उपस्थिति बचाए रखने के लिए उनके केंद्रीय नेताओं को सामने आना पड़ा। उन्होंने कहा कि वाम नेता वृंदा करात ने खुद पहल कर सभी वामदलों को एक साथ चुनाव लड़ने के लिए प्रेरित किया क्योंकि उन्हें पता था कि अगर वे अकेले चुनाव में उतरे तो क्या परिणाम होने वाला है। सिर्फ एबीवीपी को हराने के लिए उन वामपंथी दलों को भी एक साथ आना पड़ा जो कभी एक दूसरे को देखना तक पसंद नहीं करते थे। यह वैचारिक जीत नहीं, बल्कि एक अवसरवादी लोगों के झुंड की जीत है। जल्दी ही इनके वैचारिक मतभेद लोगों के सामने आएंगे और इनकी एकता की पोल खुल जाएगी। उन्होंने वामदलों के गठबंधन को 'अनहोली एलायंस' यानी अपवित्र गठबंधन कहा।   
 
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आशीष चौहान के मुताबिक आज देश के हर चुनाव में राष्ट्रवाद से प्रेरित एबीवीपी पहले या दूसरे नंबर पर है। विपक्षी दलों को अपने अस्तित्व को बचाए रखने के लिए एक होने की जरुरत महसूस होने लगी है। यह हम राष्ट्रीय स्तर पर भी देख रहे हैं और विश्वविद्यालय के स्तर पर भी। चौहान के मुताबिक यह भी किसी जीत से कम नहीं है कि विपक्ष में आपकी विचारधारा का इतना डर है कि उन्हें खुद को बचाने के लिए रणनीति बनाने की जरुरत पड़ रही है।
 
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वहीं दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्रसंघ चुनाव में एबीवीपी को कड़ी टक्कर देने वाली एनएसयूआई ने कहा कि उनकी विचारधारा को छात्रों के बीच पहले से ज्यादा स्वीकृति मिल रही है और यह उनके लिए बड़ी बात है। एनएसयूआई को पिछले चुनाव में नोटा से भी कम वोट मिले थे।एनएसयूआई के अध्यक्ष फैरोज खान के मुताबिक सभी वामपंथी दलों के एक साथ आने से उन्हें नुकसान हुआ है। 
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