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उत्तराखंड: रानीखेत के द्वारसों में तैयार हुआ देश का पहला घास संरक्षण केंद्र, 90 प्रजातियों को किया संरक्षित

Sun, 14 Nov 2021 08:25 PM IST
Nirmala Suyal Nirmala Suyal संवाद न्यूज एजेंसी, अल्मोड़ा
संवाद न्यूज एजेंसी, अल्मोड़ा Published by: Nirmala Suyal Nirmala Suyal Updated Sun, 14 Nov 2021 08:25 PM IST
सार

वन अनुसंधान केंद्र ने कुछ समय पहले रानीखेत के सौनी में प्रदेश का पहला हिमालयन स्पाइस गार्डन विकसित किया था। वनस्पतियों के संरक्षण में एक और कदम बढ़ाते हुए अनुसंधान केंद्र ने रानीखेत के ही द्वारसों में एक घास संरक्षण केंद्र भी स्थापित कर दिया है।

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uttarakhand news: country first grass conservation center built in Ranikhet, 90 species preserved
मुख्य वन संरक्षक अनुसंधान संजीव चतुर्वेदी - फोटो : फाइल फोटो

विस्तार

वन अनुसंधान केंद्र ने रानीखेत के द्वारसों में देश का पहला घास संरक्षण केंद्र स्थापित किया है। तीन एकड़ क्षेत्र में फैले इस केंद्र में घास की 90 प्रजातियों को संरक्षित किया गया है। कैंपा योजना के तहत तैयार अनुसंधान केंद्र ने तीन साल में छह लाख रुपये की लागत से घास संरक्षण केंद्र तैयार किया। इसमें उत्तराखंड के साथ ही अन्य प्रदेशों की घास को भी संरक्षित किया गया है।

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वन अनुसंधान केंद्र ने कुछ समय पहले रानीखेत के सौनी में प्रदेश का पहला हिमालयन स्पाइस गार्डन विकसित किया था। वनस्पतियों के संरक्षण में एक और कदम बढ़ाते हुए अनुसंधान केंद्र ने रानीखेत के ही द्वारसों में एक घास संरक्षण केंद्र भी स्थापित कर दिया है। मुख्य वन संरक्षक (अनुसंधान) संजीव चतुर्वेदी के अनुसार यह देश का पहला घास संरक्षण केंद्र है। केंद्र के सात खंडों में खुशबूदार, औषधीय, सजावटी, धार्मिक मान्यताओं से जुड़े, पशुओं के चारे से संबंधित, अग्नि प्रतिरोधी और कृषि से संबंधित घास की 90 प्रजातियों को शामिल किया गया है। केंद्र में घास के वैज्ञानिक, पर्यावरणीय और सांस्कृतिक महत्व के बारे में भी जानकारी दी गई है। रविवार को केंद्र का शुभारंभ भी कर दिया गया है। 
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संरक्षित की गई घास में ये हैं प्रमुख
वन अनुसंधान केंद्र ने रानीखेत घास संरक्षण केंद्र में रोशा, खस, लेमन घास, जावा, राई, ब्रोम, गिन्नी, किकूई, दोलनी, बरसीम, स्मट, सिरू, कोगोना, दूब, कांसा, ऑस, फेयरी, आइसोलैप्स, जैबरा, कुश, दूब के साथ ही जौ, गेहूं, मंडुवा, मक्का, सरसों, धान, ऑस और बबीला को संरक्षित किया है। 
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राजस्थान की जेवड़, नेपाल की टाइगर घास भी केंद्र में 
घास संरक्षण केंद्र में घास की करीब 90 प्रतिशत प्रजातियां उत्तराखंड के हिमालयी क्षेत्रों की हैं। इसके साथ ही यहां राजस्थान की प्रसिद्ध जेवड़ घास भी है। यह घास जानवरों के लिए बेहद पौष्टिक होती है। इसके चलते राजस्थान में दूध बेहद पौष्टिक होता है। नेपाल की टाइगर घास भी यहां है जिससे फूल का झाडू तैयार होता है। नेपाल में महिलाओं की आजीविका का इसे बड़ा साधन माना गया है। 

ग्लोबल वार्मिंग को कम करती है घास
मुख्य वन संरक्षक (अनुसंधान) संजीव चतुर्वेदी ने बताया कि घास ग्लोबल वार्मिंग को रोकने में अधिक कारगर होती हैं। घास की जड़ें जमीन के अंदर होती हैं जिससे घास के मैदान कार्बन को शोषित करते हैं। घास के मैदानों में आग लगने के बाद भी यह कार्बन नहीं छोड़ती है। इस कारण यह पर्यावरण संरक्षण के लिए भी बेहद लाभदायक होती हैं। 


रानीखेत के द्वारसों में देश का पहला घास संरक्षण केंद्र स्थापित किया गया है। इसमें घास की 90 प्रजातियों को संरक्षित किया गया है। इसमें उत्तराखंड के साथ ही अन्य प्रदेशों की घास प्रजातियां भी शामिल हैं।
- संजीव चतुर्वेदी, मुख्य वन संरक्षक अनुसंधान

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