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उत्तराखंड : ढाई माह बाद फिर दहशत में आई नीती घाटी, सात फरवरी को यहीं हुई थी ऋषि गंगा त्रासदी

Sun, 25 Apr 2021 01:00 AM IST
Nirmala Suyal Nirmala Suyal प्रदीप भंडारी, अमर उजाला, जोशीमठ
प्रदीप भंडारी, अमर उजाला, जोशीमठ Published by: Nirmala Suyal Nirmala Suyal Updated Sun, 25 Apr 2021 01:00 AM IST
सार

सुमना में हिमस्खलन की जानकारी मिलते ही सड़कों पर जमा हो गए ग्रामीण, बार-बार देखते रहे धौली गंगा का जलस्तर।

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Uttarakhand news : avalanche in china border at chamoli, 10 died , people remember rishiganga disaster
ढाई माह बाद फिर से ग्रामीण दहशत में - फोटो : अमर उजाला फाइल फोटो

विस्तार

उत्तराखंड के चमोली जिले की नीती घाटी में ढाई माह बाद फिर से ग्रामीण दहशत में आ गए हैं। सुमना में हिमस्खलन से तपोवन, रैणी, सुरांईथोटा क्षेत्र के ग्रामीणों की रातों की नींद फिर उड़ गई है।

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शुक्रवार शाम को हुई सुमना आपदा के बाद ग्रामीण घरों से बाहर निकल कर सड़क पर आ गए। ग्रामीण रातभर एक दूसरे को फोन कर घटना की जानकारी लेते-देते रहे।

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विगत सात फरवरी को ऋषि गंगा की त्रासदी के बाद सुमना में हिमस्खलन की घटना ने ग्रामीणों को फिर से झकझोर दिया है। दो माह 16 दिन बाद नीती घाटी में फिर हिमस्खलन की घटना हुई है। इस बार यह घटना जोशीमठ से 94 किलोमीटर दूर सुमना क्षेत्र में हुई है। रैणी गांव के शीर्ष भाग से ऋषिगंगा निकलती है, जबकि सुमना चीन सीमा पर स्थित बाड़ाहोती क्षेत्र में है।

क्षेत्र में बीते 21 अप्रैल से लगातार बर्फबारी

यहां ग्लेशियरों से होतीगाड और धौली गंगा निकलती है जो रैणी में ऋषिगंगा से मिल जाती है। क्षेत्र में बीते 21 अप्रैल से लगातार बर्फबारी हो रही थी, जिससे नीती घाटी के ग्रामीण अपने घरों में ही थे। सुरांईथोटा में बीआरओ (सीमा सड़क संगठन) का बेस कैंप है।

सुमना में हुए हिमस्खलन की सूचना सबसे पहले यहां के अधिकारी-कर्मचारियों को मिली। यह सूचना धीरे-धीरे पूरे क्षेत्र में फैल गई, जिसके बाद ग्रामीण जानकारी जुटाने के लिए बाजार में इकट्ठा होने लगे और धौली गंगा के जलस्तर को बार-बार निहारते रहे।

रात होने पर वे एक दूसरे को फोन कर आपदा की जानकारी लेते रहे। कागा गांव के ग्राम प्रधान पुष्कर सिंह राणा और द्रोणागिरी के उदय सिंह रावत का कहना है कि सुमना और ऋषि गंगा क्षेत्र में पहले भी हिमस्खलन की घटनाएं हुई हैं, लेकिन तब विकास कम होने से निचले क्षेत्रों में नुकसान कम होता था।

आज सड़क मार्ग के साथ ही नदियों के किनारे ही आवासीय भवनों का निर्माण हो रहा है, जिससे छोटी-छोटी आपदाएं भी विकराल हो रही हैं। 

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