फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttarakhand ›   Champawat News ›   rakshabandhan 2021: this rakhi Sisters will tie rakhis of pine leaves

रक्षाबंधन 2021: भाई-बहन के स्नेह के साथ ही पर्यावरण के प्रति प्रेम का भी होगा प्रदर्शन, बहनें बांधेंगी पिरुल की राखियां

Wed, 11 Aug 2021 02:52 PM IST
Nirmala Suyal Nirmala Suyal चंद्रशेखर जोशी, अमर उजाला, चंपावत
चंद्रशेखर जोशी, अमर उजाला, चंपावत Published by: Nirmala Suyal Nirmala Suyal Updated Wed, 11 Aug 2021 02:52 PM IST
सार

चंपावत जिले में पहली बार पिरूल से राखियां बनाई जा रही हैं और ये पहल की है एसबीआई यूथ फॉर इंडिया फेलोशिप की डॉ. नूपुर ने।

विज्ञापन
rakshabandhan 2021: this rakhi Sisters will tie rakhis of pine leaves
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay

विस्तार

इस बार के रक्षाबंधन की डोर भाई-बहन के स्नेह के साथ ही पर्यावरण के प्रति प्रेम का भी प्रदर्शन करेगी। चीड़ के पेड़ की पत्तियों (पिरूल) से बनाई जा रही राखियां पर्यावरण के प्रति संजीदगी के साथ ही ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाओं में स्वरोजगार की प्रवृत्ति भी बढ़ाएंगी। इन दिनों खेतीखान में इस तरह की रोजाना 120 राखियां तैयार की जा रहीं हैं।

विज्ञापन


चंपावत जिले में पहली बार पिरूल से राखियां बनाई जा रही हैं। ये पहल की है एसबीआई यूथ फॉर इंडिया फेलोशिप की डॉ. नूपुर ने। खेतीखान और त्यारसो क्षेत्र में चीड़ के पेड़ों की बहुतायत को देखते हुए उन्होंने इसके उपयोग करने के लिए ये पहल की। इसके लिए उन्होंने गांव की छह महिलाओं को राजी किया। खेतीखान की निकिता कर्नाटक, दीपा फर्त्याल, सुनीता मौनी, शिवानी मौनी, दिया महरा और कविता महरा पिछले महीने से पिरूल की राखियां बना रही हैं। महिलाएं बताती हैं कि एक राखी को बनाने में 12 मिनट लगते हैं।
विज्ञापन


घरेलू काम करने के साथ दिनभर चार घंटे काम करने पर एक महिला 20 राखियां बना रहीं हैं। इसके निर्माण में 30 से 50 रुपये की लागत आ रही है। इनकी ऑनलाइन बिक्री 60 से 100 रुपये तक में हो रही है। इन राखियों को इंस्टाग्राम हैंडल के जरिये बेचा जा रहा है। इस बार 3600 राखियां बनाने का लक्ष्य रखा गया है। अगले साल से इन राखियों को दुकानों के जरिये भी बेचने की योजना है।
विज्ञापन
विज्ञापन


चीड़ बहुल है पहाड़
राखियों से पहले क्षेत्र में चीड़ का उपयोग कई घरेलू सामान बनाने के लिए किया जा चुका है। खेतीखान क्षेत्र की कुछ महिलाएं चीड़ के पेड़ में होने वाले पिरूल से टोकरी, कंडी, पूजा थाली आदि उत्पाद बना रहीं हैं। चंपावत चीड़ बहुल जिला है। 80549.10 हेक्टेयर जंगल में से 27292.75 (33.88 प्रतिशत) में चीड़ है। ये ज्वलनशील चीड़ जंगलों में आग लगने की सबसे बड़ी वजह माने जाते हैं। चंपावत, लोहाघाट, काली कुमाऊं, देवीधुरा, भिंगराड़ा वन क्षेत्र में मुख्य रूप से चीड़ के पेड़ हैं। चीड़ की सूखी पत्तियां (पिरूल) गर्मियों में जंगल पर सबसे बड़ा खतरा बनती हैं। इससे बचने के लिए अब इसके विभिन्न उपयोग के प्रयास किए जा रहे हैं। 


पिरूल की राखियां नया प्रयोग है। ये न केवल पर्यावरण के अनुकूल है, बल्कि स्थानीय जंगलों में निशुल्क उपलब्ध होने वाले कच्चे माल से बनने की वजह से ग्रामीण महिलाओं के लिए आजीविका बढ़ाने का आसान उपाय भी है। इन राखियों को लेकर लोगों में उत्सुकता भी है।

- डॉ. नूपुर, फेलो, एसबीआई यूथ फॉर इंडिया योजना

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed