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भारत-नेपाल सीमा विवाद: नेपाली मेयर ने सीमा की विवादित भूमि पर जताया दावा

Sat, 01 Aug 2020 10:00 PM IST
Nirmala Suyal Nirmala Suyal न्यूज़ डेस्क, अमर उजाला, टनकपुर (चंपावत)
न्यूज़ डेस्क, अमर उजाला, टनकपुर (चंपावत) Published by: Nirmala Suyal Nirmala Suyal Updated Sat, 01 Aug 2020 10:00 PM IST
सार

  • बोले, नेपाल की वन समिति ने अपनी भूमि में तारबाड़ लगाकर किया है पौधरोपण 
  • बेवजह विवाद को तूल देना ठीक नहीं, सीमा विवाद सुलझाने को जल्द हो सर्वे 

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India nepal border Dispute:  Nepal mayor claims on disputed border land
भारत-नेपाल सीमा - फोटो : अमर उजाला (File Photo)

विस्तार

सीमा पर नो मेंसलैंड की विवादित भूमि में नेपाल की ओर से अतिक्रमण के विवाद पर नेपाल के कंचनपुर जिले की भीम दत्त (महेंद्रनगर) नगर पालिका के मेयर सुरेंद्र बिष्ट ने विवादित भूमि को नेपाल की होने का दावा किया है।

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साथ ही दावा किया कि एकीकृत महाकाली संधि के तहत टनकपुर बांध निर्माण में 577 मीटर भूमि नेपाल ने भारत को दी थी। उनका कहना है कि सीमा विवाद को तूल देना उचित नहीं है। दोनों देश जल्द सर्वे करा कर सीमा विवाद को सुलझाए ताकि वैमनस्यता पैदा न हो।
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प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली की पार्टी नेकपा (नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी) से जुड़े मेयर बिष्ट ने संवाद न्यूज एजेंसी से हुई वार्ता में कहा कि ब्रह्मदेव से लगी सीमा में भूमि को लेकर विवाद को बेवजह तूल दिया जा रहा है। उन्होंने कहा कि जिस भूमि को विवादित बताकर नेपाल की ओर से अतिक्रमण की बात कही जा रही है वह भूमि नेपाल की है और सालों से सामुदायिक वन समिति ब्रह्मदेव के अधीन है।
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इस भूमि पर वन समिति ने पहले से लकड़ी की बाड़ लगा रखी थी जो सड़ गल कर नष्ट हो गई तो समिति ने नया तारबाड़ कर पौधरोपण किया है। उन्होंने बताया कि सीमा पर भारत ने अपने अधिकार क्षेत्र की भूमि में सड़क का निर्माण कराया है वैसे ही नेपाल की ओर से भी अपने अधिकार क्षेत्र की भूमि में तारबाड़ कर पौधरोपण किया है।

रही बात सीमा विवाद कि तो दोनों देशों की ओर से ज्वाइंट सर्वे के बाद सीमांकन में साफ हो जाएगा कि भूमि नेपाल की है या भारत की। उन्होंने कहा कि एकिकृत महाकाली संधि के तहत टनकपुर बांध निर्माण में नेपाल द्वारा 577 मी. भूमि भारत को दी गई है। जिसका संधि में उल्लेख किया गया है। 

चार अगस्त को मिलेंगे भारत-नेपाल के अफसर

दोनों देशों के बीच बढ़ रहे तनाव के बीच चंपावत जिला प्रशासन की पहल पर दोनों देशों के अफसर चार अगस्त को बैठक करेंगे। चंपावत एसपी लोकेश्वर सिंह ने यह जानकारी दी। उन्होंने बताया कि नेपाल की ओर से कंचनपुर जिले के अफसर बैठक में शामिल होंगे। इधर डीएम सुरेंद्र नारायण पांडेय ने उम्मीद जताई है कि नो मैंसलैंड पर अतिक्रमण विवाद बातचीत के जरिए सुलझ जाएगा। 

भारत-नेपाल सीमा में टनकपुर से लगे नो मेंसलैंड क्षेत्र में नेपाल की ओर से हुए अतिक्रमण मसले पर बातचीत के लिए दोनों देशों के अफसरों के बीच होने वाली बैठक की तिथि आखिर तय हो गई है। एसपी लोकेश्वर सिंह ने बताया कि बैठक में एसएसबी के अधिकारी भी शिरकत करेंगे।

बैठक सीमांत क्षेत्र में होगी, मगर यह किस स्थान होगी, इसका औपचारिक एलान नहीं किया गया। माना जा रहा है कि टनकपुर में नेपाल सीमा से लगे नो मेंसलैंड का मौका मुआयना करने के बाद होने वाली बैठक का स्थल टनकपुर हो सकता है। आमतौर पर नेपाल के अधिकारियों के साथ होने वाली बैठकें बनबसा में होती रही हैं।

लिपुलेख में हर परिस्थितियों से निपटने को भारतीय सुरक्षा बल पूरी तरह तैयार 

चीन की ओर से सीमा पार चल रही गतिविधियों को देखते हुए अलर्ट भारतीय सुरक्षा बलों ने लिपुलेख सीमा पर सुरक्षा के कड़े प्रबंध किए हैं। चीन सीमा पर किसी भी हालात से निपटने के लिए भारतीय सेना और भारत तिब्बत सीमा पुलिस के जवानों की पर्याप्त संख्या में तैनाती की गई है। 

लद्दाख में तनातनी के समय तीन माह पूर्व चीनी सैनिकों ने लिपुलेख में भी भारत की ओर झंडे लहराकर चौकियां हटाने की चेतावनी दी थी। सीमा पार चीनी सैनिकों के जमावड़े की सूचना के बाद भारतीय सुरक्षा एजेंसियों ने वहां पर कड़ी सुरक्षा व्यवस्था कर दी थी।

सूत्रों के अनुसार चीन सीमा पर भारतीय सुरक्षा बलों के जवानों की पर्याप्त संख्या में वहां पर तैनाती है। सुरक्षा बलों के जवान दिन और रात लगातार सीमा पर गश्त कर रहे हैं। रात को नाइट विजन कैमरों से सीमा की निगरानी की जा रही है। 

सूत्रों का कहना है कि भारत की ओर से सीमा पर सैन्य बल की संख्या बढ़ाने के बाद से चीन की ओर से कोई हरकत दोबारा नहीं की गई है। इधर, नेपाल सीमा पर धारचूला से लेकर कालापानी तक सशस्त्र सीमा बल के जवान नजर रखे हुए हैं। बल के अधिकारियों के अनुसार इस समय सीमा पूरी तरह से शांत है।

पिथौरागढ़ जिले के लिपुपास में भारत-चीन की सीमाओं का विभाजन होता है। कैलाश यात्रा और भारत चीन व्यापार भी इसी दर्रे से होकर होता रहा है। पवित्र कैलाश मानसरोवर यात्रा पर जाने वाले यात्री और व्यापारी लिपुपास से ही चीन में प्रवेश करते हैं। इस वर्ष कोरोना के कारण कैलाश यात्रा और भारत चीन व्यापार नहीं हो सका।

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