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पांच दशक बाद भी सुरक्षित हैं स्वर्गाश्रम के बाढ़ रोधक
हेमवती नंदन भट्ट
Updated Wed, 10 Jul 2013 10:39 AM IST
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बीते माह गंगा में आई बाढ़ से आधुनिक तकनीक और करोड़ों के बजट से तैयार कई नवनिर्मित घाटों और आस्थापथ को काफी नुकसान हुआ है।
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मगर, स्वर्गाश्रम क्षेत्र में छह दशक पूर्व भविष्य में बाढ़ की आशंका के दृष्टिगत बाढ़ सुरक्षा के लिए मामूली खर्च में तैयार किए गए रोधक (तटबंधों) आज भी कायम हैं। ऐसा क्यों है? क्षेत्र में रहने वाले पुराने लोग इसे वर्तमान इंजीनियरिंग की नाकामी, सरकारी विभागों और ठेकेदारों के गठजोड़ का परिणाम बताते हैं।
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गंगा में आई बाढ़ में बह गए
केंद्रीय मेगा पर्यटन सर्किट योजना और राज्य पर्यटन विभाग के तहत ऋषिकेश, मुनिकीरेती और स्वर्गाश्रम क्षेत्र में महज तीन साल पहले आस्थापथ के साथ ही गंगा तटों पर कई घाटों का निर्माण हुआ है। इनमें से 2009-10 में निर्मित कई घाट 2010,12 और जून 2013 की बारिश के कारण गंगा में आई बाढ़ में बह गए।
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इनमें से कुछ घाटों पर अब तक लाखों रुपये मरम्मत के नाम पर भी खर्च हो चुके हैं। कुछ एक के मरम्मत के प्रस्ताव शासन में लंबित हैं, जबकि हाल में क्षतिग्रस्त हुए घाटों और आस्थापथ के अनुरक्षण के लिए शासन को प्रस्ताव भेजने की तैयारी की जा रही है। मगर, इसका जवाब किसी के पास नहीं है कि करोड़ों रुपये खर्च कर तैयार की गई बाढ़ सुरक्षा और गंगा तटों के सुंदरीकरण की योजनाएं कैसे ढह गई।
शासन जवाब मांगना मुनासिब नहीं समझता
ऐसे में निम्न गुणवत्ता के चलते क्षतिग्रस्त हुए करोडों की लागत से बने घाटों की मरम्मत संबंधी प्रस्तावों को मंजूरी देने वाला शासन भी इन योजनाओं पर जवाब मांगना मुनासिब नहीं समझता। ऐसे में समझा जा सकता है कि गंगा तटों के सुंदरीकरण और बाढ़ सुरक्षा की तमाम योजनाएं किस मकसद से बनाई जा रही हैं।
इससे इतर दूसरे उदाहरण को लें तो स्वर्गाश्रम क्षेत्र में 1955-56 में गीता भवन के संस्थापक भाई हनुमान प्रसाद पोद्दार, जयदयाल गोयनका, स्वामी आत्मप्रकाश महाराज के योगदान से तैयार किए गए गंगा घाटों पर दशकों बाद भी कई बार बाढ़ की विभीषिका झेलने के बावजूद दरारें तक नहीं आई हैं।
क्षेत्र में मामूली लागत में खर्च कर बाढ़ के पानी को रोकने और उसका रुख दूसरी ओर ले जाने के लिए बनाए गए बैरियर (तटबंध) अभी भी यथावत अपने स्थान पर खड़े हैं। इन पर 1970 से लेकर 2013 तक गंगा में आई बाढ़ का कोई असर नहीं दिखता।
क्या कहते हैं स्थानीय लोग
दरअसल, करोड़ों की लागत से बने घाटों, आस्थापथ जैसी योजनाओं का बाढ़ में ध्वस्त होना वर्तमान इंजीनियरिंग की नाकामी का नमूना है। यह योजनाएं सरकारी धन की बंदरबांट के लिए बनाई जा रही हैं, जिनमें गुणवत्ता की अनदेखी हो रही है। स्वर्गाश्रम में पांच दशक पहले बने छोटे-छोटे तटबंध (ठोकरें) क्षेत्र को अभी तक सुरक्षित रखे हुए हैं।
इन पर आजतक आई बाढ़ का कोई असर नहीं हुआ है। जबकि आसपास बने करोड़ों के घाट ध्वस्त हो गए। सरकार को ऐसी तमाम योजनाओं की गुणवत्ता की जांच कराकर संबंधित अफसरों, ठेकेदारों के खिलाफ मुकदमा कायम कराना चाहिए।
- डा. नारायण सिंह रावत, प्रदेश अध्यक्ष देवभूमि उत्तराखंड तीर्थाटन एवं पर्यटन विकास समिति स्वर्गाश्रम
कई विभीषिकाओं को झेल कर रहे पहरेदारी
1955-56 में स्वर्गाश्रम और गीताभवन के गंगातटों पर बने छोटे तटबंध (ठोकरों) की सबसे पहली परीक्षा वर्ष 1970 में आई बेलाकूची की बाढ़ में हुई थी। जिसमें शीशमझाड़ी क्षेत्र में बाढ़ का पानी घुस गया था, उस वक्त यहां कुटिया, झोपड़ियां बनाकर रहने वाले साधु-संतों ने पेड़ों पर चढ़कर जान बचाई थी, जिन्हें निकालने के लिए रुड़की आर्मी और हाथियों का सहारा लेना पड़ा था, मगर इस बाढ़ से तीर्थक्षेत्र स्वर्गाश्रम को कोई नुकसान नहीं हुआ।
वर्ष 1978 की डबराणी झील से आई बाढ़, इसके बाद 2010, 12 और 13 में बीते महीने आई बाढ़ में भी गंगा का जलस्तर कई मीटर बढ़ने के बावजूद भू-कटाव, जानमाल जैसा कोई नुकसान नहीं हुआ।
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