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आपदा के बाद अब चुनौतियों का पहाड़
देहरादून/ब्यूरो
Updated Sat, 29 Jun 2013 07:39 AM IST
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आपदा में हुए नुकसान का ठीक-ठीक हिसाब लगाना अब तक मुमकिन नहीं हो सका है। लेकिन पहाड़ के जिस इलाके में नजर दौड़ाएं, नुकसान के सिवा कुछ नजर नहीं आता।
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उत्तराखंड आपदा की विशेष कवरेज
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केदारघाटी से लेकर उत्तरकाशी तक हजारों मकान, दुकान, होटल, लॉज, स्कूल, अस्पताल भवन, दफ्तर जलप्रलय की भेंट चढ़ गए। कई पेयजल परियोजनाएं ध्वस्त हो गईं। बिजली परियोजनाएं बुरी तरह प्रभावित हुई हैं। पहाड़ की लाइफलाइन सैकड़ों सड़कें पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो गईं।
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ऐसे में सबसे बड़ा सवाल पुनर्निर्माण का है। आपदा के बाद बचाव और राहत कार्य में सरकारी स्तर पर जैसी व्यवस्था दिखी, उससे आशंकाओं के पहाड़ और बड़े हो रहे हैं।
नुकसान का ब्योरा तक नहीं
सबसे मुश्किल काम आधारभूत ढांचे को फिर से खड़ा करने का है। लेकिन आपदा के 13वें दिन भी आधे से ज्यादा विभागों के पास नुकसान का ब्योरा तक नहीं है। सरकार तंत्र फिलहाल पड़ताल में उलझा है। लेकिन जानकारों का मानना है कि पूरी चुस्ती के साथ काम किया जाए तो भी जलप्रलय से तबाह पहाड़ के पुनर्निर्माण में डेढ़ से दो साल तक का समय लग जाएगा।
चार धाम यात्रा के रास्ते पर जो नुकसान हुआ है, आने वाले कई वर्षों में उसकी भरपाई संभव नहीं। हजारों लोग बेरोजगार हो गए हैं। मरने वाले और लापता होने वाले स्थानीय लोगों की संख्या भी सैकड़ों में है।
कई साल पीछे चली गई देवभूमि
इनके घरों में रोजी-रोटी का संकट है। चाय की दुकान से लेकर बड़ी परियोजनाओं तक पर चोट पड़ी है। कुल मिलाकर जलप्रलय ने उत्तराखंड को तोड़कर रख दिया है। इस कदर कि देवभूमि कई साल पीछे चली गई है।
जलप्रलय ने तोड़ी यात्रा रूट की रीढ़
रुद्रप्रयाग, चमोली, पौड़ी, टिहरी, उत्तरकाशी, हरिद्वार आदि जिलों को सीधे प्रभावित करने वाली चार धाम यात्रा पर सीधी चोट पड़ी है। इस समय यात्रा सीजन अपने चरम पर होती थी। यात्रा मार्ग के शहर-कस्बों के होटल-ढाबों से लेकर मठ-मंदिर, दुकानदारों, स्थानीय युवाओं, ट्रैवल ऐजेंसियों, मैक्सी कैब से लेकर बस कंपनियों तक की रोजी रोटी का जरिया ही यह यात्रा है।
जलप्रलय ने यात्रा रूट के फलते-फूलते शहरों और कस्बों की रीढ़ ही टूटी हुई नजर आ रही है। केदारनाथ रूट पर सोनप्रयाग से लेकर गौरीकुंड तक का सड़क मार्ग बेहद जर्जर है। गौरीकुंड से केदारनाथ का पेदल मार्ग पूरी तरह गायब है।
बदरीनाथ मार्ग की हालत भी बेहद खराब है। यह रास्ता गोंविदघाट में ही तीन जगह से टूृटा हुआ है। इससे आगे करीब डेढ़ किलोमीटर की सड़क गायब है।
सड़कों को नुकसान पहुंचा है
यही हाल हेमकुंड साहिब के रास्ते का हैं। उत्तरकाशी, पिथौरागढ़ में भी सड़कों को नुकसान पहुंचा है। एक अनुमान के मुताबिक करीब दो हजार किलोमीटर तक की सड़क को नुकसान पहुंचा है। चीन सीमा पर नीति घाटी की सामरिक महत्व की कई सड़कों को भी नुकसान पहुंचा है।
विस्थापन भी बड़ा सवाल
प्रदेश में पहले ही 233 गांवों के विस्थापन का मसला लटका पड़ा है। इस बार की आपदा के बाद इस सूची में कई गांव और जुड़ गए हैं। इस समय 200 से ज्यादा गांव ऐसे हैं, जिनके संपर्क मार्ग और पुल बह गए हैं। अभी इन्हें शेष इलाकों से जोड़ने का ही काम शुरू होना बाकी है।
बिजली से सरचार्ज तक का नुकसान
जलप्रलय की चपेट एक दर्जन जल विद्युत परियोजनाएं आई हैं। 440 मैगावाट की तपोवन विष्णुगाड परियोजना का पूरा बैराज ही बह गया। मंदाकिनी व धौली गंगा पर परियोजनाओं का यही हाल है। इससे प्रदेश को प्रति किलोवाट पानी के उपयोग पर मिलने वाले सरचार्ज का सीधा नुकसान भी है। कुछ परियोजनाओं से अब भी उत्पादन ठप है।
मौसम से लेकर मशीन तक लेगी परीक्षा
राज्य सरकार के पास जो उपकरण, मशीनें और मानव संसाधन हैं, उन्हें सरकार की वार्षिक योजना की राशि खर्च करने में ही पसीना आ जात है। ऐसे में तीन से पांच हजार करोड़ के अतिरिक्त कार्यों के लिए सरकार कौन सा फार्मूला अपनाएगी, यह देखना होगा।
वैसे भी इस साल सितंबर तक काम की गति बरसात के ऊपर ही निर्भर करेगी। टूटी सड़कें निर्माण के लिए पहाड़ पर सामग्री ले जाने में सबसे बड़ी बाधा बनेगी। सितंबर केबाद केदारनाथ, बदरीनाथ, गंगोत्री व यमुनोत्री और अन्य इलाकों में भीषण ठंड और उसके साथ बर्फबारी भी से भी काम में बाधा आएगी।
जनवरी मध्य से अप्रैल-मई तक काम को गति दी जा सकती है। इसकेबाद जून-जुलाई से फिर मानसून की आमद हो जाती है।
ये हैं कुछ और चुनौतियां
बदरी-केदार मंदिर समिति की रामबाड़ा और गौरीकुंड में 22 और अन्य स्थानों पर दर्जन भर धर्मशालाएं नष्ट हो गई। पुजारी, कर्मचारियों की आवासीय कालोनी का नामोनिशान नहीं बचा। करीब 200 करोड़ रुपए की जरूरत है।
पीडब्लूडी, पीएमजीएसवाई की 802 सड़कें टूटी है। प्रारंभिक तौर पर लगभग 600 करोड़ रुपए केनुकसान का आकलन तैयार हुआ है।
किसानों की खेती बाड़ी के लिए बनाई गई गूल और लघु सिंचाई की 1753 परियोजनाएं नष्ट हो गई है। तत्काल 53. 56 करोड़ की दरकार है।
स्कूलों और इंटर कॉलेज के 90 भवन क्षतिग्रस्त हो गए हैं। इनके लिए 7.9 करोड़ रुपए चाहिए।
जल विद्युत निगम को डेढ़ सौ करोड़ और ऊर्जा निगम को लगभग पचास करोड़ के नुकसान का अनुमान है।
जल निगम व पेयजल के दो दर्जन से ज्यादा परियोजनाएं क्षतिग्रस्त हुई हैं। इनके लिए प्रारंभिक तौर पर 100 करोड़ रुपये की जरूरत बताई गई है।
स्वास्थ्य विभाग की ओर से भी स्वास्थ्य केंद्रों की मरम्मत के लिए दस करोड़ का प्रारंभिक प्रस्ताव दिया गया है।
ये हुआ नुकसान
3000 से पांच हजार करोड़ तक के कुल नुकसान की बात सरकारी-गैर सरकारी स्तर पर कही जा रही है।
2500 करोड़ की परिसंपत्तियों के नुकसान का आकलन शासन ने किया है।
2000 किलोमीटर तक की सड़क को नुकसान पहुंचा है। पहाड़ में एक किलोमीटर सड़क बनाने में 30 लाख रुपये भी माने तो 600 करोड़ रुपये का नुकसान यही है।
150 से ज्यादा पुल या तो बह गए हैं या फिर इस हालत में हैं कि उन्हें दोबारा बनाने की जरूरत है।
3000 सरकारी-गैर सरकारी भवन क्षतिग्रस्त बताए जा रहे हैं। स्कूल, अस्पताल और अन्य सरकारी-निजी संपत्ति को नुकसान पहुंचा है सो अलग।
12 जल विद्युत परियोजनाएं भी जलप्रलय की चपेट में आई हैं।
बदरीनाथ की यात्रा तो कुछ समय बाद शुरू की ही जा सकती है। यात्रियों में विश्वास जगाना जरूरी है। यह तभी हो पाएगा जब बिजली, पानी, सड़क और कनेक्टिविटी जल्द ही दुरुस्त हो। सड़क निर्माण कार्य सबसे महत्वपूर्ण है। तत्काल राहत के साथ ही दीर्घकालिक निर्माण का कार्य भी जल्द ही शुरू हो जाना चाहिए।
- इंदु कुमार पांडे, वित्त सलाहकार, उत्तराखंड