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उत्तराखंड के बारे में चौंका देने वाली कुछ बातें

Mon, 08 Jul 2013 01:56 PM IST
वेद विलास उनियाल
वेद विलास उनियाल Updated Mon, 08 Jul 2013 01:56 PM IST
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carelessness is every where in uttarakhand

सूरज गुसांई का बेटा छत से गिर गया। उसे चोट आई। उसे पहले एक प्राइवेट डॉक्टर को दिखाया गया, डॉक्टर ने हाथ खड़े कर दिए. कहा सिर का मामला है। उन्होंने कई डॉक्टरों को दिखाया। देहरादून से श्रीनगर भी ले गए और वहां से डाक्टर ने फिर देहरादून भेज दिया। बाद में मालूम पड़ा कि कुछ हुआ ही नहीं था। ऐसी ही कुछ बातें जो आपको चौंकाएंगी...

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सिरोहबगड़ जैसा का तैसा
श्रीनगर से रुद्रप्रयाग के बीच सिरोहबगड़ हर साल बारिश में टूट जाता है। एक बार नहीं की कई बार। मगर इसे हमेशा फौरी तौर पर ठीक किया गया। सिरोहबगड़ की समस्या आज की नहीं। पुराने लोग बताते हैं कि 60 साल पहले भी उन्होंने इस जगह को इसी तरह टूटते देखा। पर कभी इसे स्थाई रूप से ठीक नहीं किया गया। हर बार टूटा और बुलडोजर लगाकर ठीक कर लिया। टनल सुरंग बनाने या पुल बनाकर वैकल्पिक मार्ग बनाने जैसे इसके विकल्प के बारे में कभी नही सोचा।
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आधुनिक संसाधनों के बावजूद इसका कोई समाधान नहीं हुआ। इस बार तो राहुल गांधी भी सिरोह बगड़ देखने आए। पर कहां जाता है कि सिरोहबगड़ के टूटे रहने से कुछ लोगों का न्यारा वारा होता है। ऐसे डेर्जंस जोन कुछ लोगों के लिए कमाऊ पूत की तरह होते हैं। इसलिए स्थाई समाधान न किए जाने की परंपरा चली आ रही है।

पता नहीं कौन डॉक्टर, कौन स्टूडेंट
श्रीनगर बेस अस्पताल का हाल बुरा है। पता ही नही चलता वहा कौन डॉक्टर है कौन स्टूडेंट। स्टूडेंट ही कई बार अस्पताल चलाते हैं। एक तरह से सीनियर डॉक्टरों की मदद होती रहती है। कई बार मरीज के आने पर भविष्य का डाक्टर अपने सीनियर की सलाह लेता है। फोन पर मरीज के उपचार की सलाह ली जाती है. फोन का सिलसिला कई बार लंबा भी चल जाता है। तब तक मरीज बेचारा बैठा देखता रहता है। कुछ कर नहीं पाता।

मेट नहीं, गैंगमैन नहीं
बरसात में टूटे रास्तों की जल्दी मरम्मत कैसे हो। उत्तराखंड में गैंगमैनो, श्रमिकों का बहुत अभाव है। उनकी भर्ती पर भी रोक है। लिहाजा कई बार तो मेटों को ही गैंगमैन का काम करना पड़ता है। पहाड़ों में लड़के अब अस्थाई गैंगमैन का काम नहीं करना चाहते। इसके बजाय उन्हें अपना रोजगार करना अच्छा लगता है।


साथ ही इसमें पैसा भी बहुत कम दिया जाता है। कई बार जोखिमर्पूण स्थिति में काम करना पड़ता है। पर सरकार अभी फैसला लेने की स्थिति में नहीं है। लिहाजा काम तो प्रभावित होता ही है। पर चिंता कौन करे।

ब्लीचिंग दिया, बताया नहीं

आपदा प्रभावित क्षेत्रों में कई जगह लोगों को ब्लीचिंग बांटा गया। मक्खियां आदि हटाने के लिए लोग इसका उपयोग कर सकें, इसके लिए राहत सामग्री के तौर पर ब्लीचिंग के पैकेट्स भी बंटे। लेकिन चमोली और कुछ जगहों में दिक्कत यह हुई कि लोगों को इसके बारे में कुछ बताया नहीं गया। लोगों को इस कठिन समय में खाने पीने की चीजों से ही ज्यादा मतलब था। इसलिए आटा चावल की जगह ब्लीचिंग देखकर वह चौंके।

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