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पांच दिन तक अकेले सेवा करते रहे एसपी चमोली
लखपत रावत
Updated Wed, 26 Jun 2013 03:55 PM IST
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अपनी नजरों के सामने मौत का तांडव देखने के बाद भी अपने कर्तव्य का निष्ठापूर्वक निवर्हन कर गौरीकुंड अस्पताल में तैनात फार्मेसिस्ट एसपी चमोली ने एक मिसाल कायम की है।
गौरीकुंड में तबाही के बाद जब सब लोग यहां से पलायन कर रहे थे, तब चमोली ने यही रुकने का निर्णय लिया और पीड़ितों की मदद करने की ठानी।
18 जून से 23 जून तक गौरीकुंड अस्पताल में ही डटे रहे और इस त्रासदी से पीड़ित लगभग 1600 लोगों का उपचार भी किया। 23 की शाम को तबियत खराब होने पर वे रुद्रप्रयाग वापस लौट गए।
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एलोपैथिक अस्तपाल गौरीकुंड में तैनात फार्मेसिस्ट एसपी चमोली ने बताया कि 16 जून को दोपहर लगभग दो बजकर तीस मिनट पर घोड़ा-खच्चर मजदूरों ने बताया कि घिनुरपाणी में बादल फट गया है।
इसके बाद धीरे-धीरे मंदाकिनी नदी का पानी बढ़ने लगा। शाम सवा सात बजे पुलिस द्वारा एलर्ट किया गया और मैं अपने परिवार व अस्पताल के स्टाफ के साथ पुलिस चौकी में चला गया।
कई होटल व लॉज बह गए
इस दौरान गौरीकुंड में कई होटल व लॉज बह गए थे। 17 जून की सुबह मैं अपनी पत्नी व बेटे और अन्य लोगों के साथ तड़के सुबह तीन बजकर तीस मिनट पर गौरीगांव को रवाना हुआ।
17 को प्रात: सवा सात बजे जब केदारनाथ धाम में भयंकर आवाज हुई तो इससे गौरी गांव भी हिल गया और हम जंगल की ओर चले गए।
इसके बाद जब स्थिति सामान्य हुई तो मै अपने परिवार समेत वापस गौरी गांव लौट आया। 18 जून को परिवार को गौरी गांव में छोड़कर मै गौरीकुंड को रवाना हुआ और अस्पताल में पहुंचा।
वहां जाकर देखा कि अस्पताल क्षतिग्रस्त हो गया है और परिसर में लाशें पड़ी हैं। मैने कुछ स्थानीय लोगों की मदद से लाशों को पुलिस के हवाले किया। इसके बाद डिस्पेंसरी में बैठ गया।
दवाईयां व उपकरण सलामत थे
डिस्पेंसरी में सभी दवाईयां व उपकरण सलामत थे। मै हर दिन सुबह अस्पताल में जाकर शाम को वापस गौरी गांव लौट जाता था। 18 जून से 23 जून तक अस्पताल में 1600 मरीज आए, जिनका मैने उपचार किया। इस दौरान दिनभर मैने बिस्कुट व पानी पीकर ही गुजारा किया।
चमोली ने बताया कि 23 को तबियत बिगड़ने पर वह वापस लौट आए। उन्होंने बताया कि विकट परिस्थितियों में सेवा देने के लिए उनके उच्चाधिकारी लगातार उन्हें प्रेरित करते रहे।
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गौरीकुंड में तबाही के बाद जब सब लोग यहां से पलायन कर रहे थे, तब चमोली ने यही रुकने का निर्णय लिया और पीड़ितों की मदद करने की ठानी।
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18 जून से 23 जून तक गौरीकुंड अस्पताल में ही डटे रहे और इस त्रासदी से पीड़ित लगभग 1600 लोगों का उपचार भी किया। 23 की शाम को तबियत खराब होने पर वे रुद्रप्रयाग वापस लौट गए।
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एलोपैथिक अस्तपाल गौरीकुंड में तैनात फार्मेसिस्ट एसपी चमोली ने बताया कि 16 जून को दोपहर लगभग दो बजकर तीस मिनट पर घोड़ा-खच्चर मजदूरों ने बताया कि घिनुरपाणी में बादल फट गया है।
इसके बाद धीरे-धीरे मंदाकिनी नदी का पानी बढ़ने लगा। शाम सवा सात बजे पुलिस द्वारा एलर्ट किया गया और मैं अपने परिवार व अस्पताल के स्टाफ के साथ पुलिस चौकी में चला गया।
कई होटल व लॉज बह गए
इस दौरान गौरीकुंड में कई होटल व लॉज बह गए थे। 17 जून की सुबह मैं अपनी पत्नी व बेटे और अन्य लोगों के साथ तड़के सुबह तीन बजकर तीस मिनट पर गौरीगांव को रवाना हुआ।
17 को प्रात: सवा सात बजे जब केदारनाथ धाम में भयंकर आवाज हुई तो इससे गौरी गांव भी हिल गया और हम जंगल की ओर चले गए।
इसके बाद जब स्थिति सामान्य हुई तो मै अपने परिवार समेत वापस गौरी गांव लौट आया। 18 जून को परिवार को गौरी गांव में छोड़कर मै गौरीकुंड को रवाना हुआ और अस्पताल में पहुंचा।
वहां जाकर देखा कि अस्पताल क्षतिग्रस्त हो गया है और परिसर में लाशें पड़ी हैं। मैने कुछ स्थानीय लोगों की मदद से लाशों को पुलिस के हवाले किया। इसके बाद डिस्पेंसरी में बैठ गया।
दवाईयां व उपकरण सलामत थे
डिस्पेंसरी में सभी दवाईयां व उपकरण सलामत थे। मै हर दिन सुबह अस्पताल में जाकर शाम को वापस गौरी गांव लौट जाता था। 18 जून से 23 जून तक अस्पताल में 1600 मरीज आए, जिनका मैने उपचार किया। इस दौरान दिनभर मैने बिस्कुट व पानी पीकर ही गुजारा किया।
चमोली ने बताया कि 23 को तबियत बिगड़ने पर वह वापस लौट आए। उन्होंने बताया कि विकट परिस्थितियों में सेवा देने के लिए उनके उच्चाधिकारी लगातार उन्हें प्रेरित करते रहे।