{"_id":"11-66038","slug":"Dehradun-66038-11","type":"story","status":"publish","title_hn":"जलजला सा आया और बिछ गईं लाशें ","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
जलजला सा आया और बिछ गईं लाशें
देहरादून/ब्यूरो
Updated Fri, 28 Jun 2013 11:26 AM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
ऐसा लगा जैसे भूकंप आ गया हो, जमीन हिल रही थी और तभी एक विस्फोट की आवाज
विज्ञापन
सुनाई दी। इसके बाद जो सैलाब आया उसने पांच मिनट में ही पूरे इलाके को
श्मशान में बदल दिया।
उत्तराखंड आपदा की विशेष कवरेज
पानी के साथ आए मलबे से करीब 20 लोग मर चुके थे। लाशों के बीच छह दिन गुजारने के बाद मुश्किल से घर पहुंचा हूं। यह कहना है केदारनाथ में जलप्रलय को करीब से देखने वाले जीएमवीएन के भवान सिंह रावत का।
19 टूरिस्ट भी मौजूद थे
मोहकमपुर निवासी भवान सिंह रावत केदारनाथ स्थित जीएमवीएन के टूरिस्ट रेस्ट हाउस में मैनेजर के रूप में कार्यरत हैं। यात्रा सीजन में उनके साथ करीब 21 लोगों की टीम मौजूद थी। भवान सिंह ने बताया कि 16 जून को उनके रेस्ट हाउस में 19 टूरिस्ट भी मौजूद थे।
रात साढे़ 8 बजे लगा कि भूकंप आ गया। बाहर देखा तो मंदिर के पीछे से पानी के साथ मलबा आ रहा था। बचने के लिए वे मंदिर की ओर भागे, लेकिन वहां भीड़ के कारण जगह न मिलने पर उन्होंने मंदिर समिति के ऑफिस में शरण ली। उनके सामने 14 हट, स्टाफ रूम, चौकीदार रूम पानी के साथ बह गए।
एक मंजिल में भर गई मिट्टी
मंदिर के पीछे शंकराचार्य भवन व भारत सेवा आश्रम की एक मंजिल में मिट्टी भर गई। आईटीबीपी के जवानों ने तुरंत कार्रवाई करते हुए कीचड़ में फंसे 15-16 लोगों को बाहर निकाला। लोगों के अनुसार करीब 20 लोग मिट्टी के नीचे दब चुके थे। आईटीबीपी ने एक होटल से एसडीएम और सीओ को भी घायल अवस्था में बाहर निकाला था।
सारी रात डर के साथ काटी। 17 जून की सुबह 5 बजे रेस्ट हाउस गए, लेकिन कीचड़ भरा होने के कारण काली कमली व जलाराम धर्मशाला में रुके। सुबह गाइड ने रेस्ट हाउस की बिल्डिंग में मौजूद पर्यटकों को निकाला। सुबह सवा 7 बजे दोबारा विस्फोट की आवाज सुनाई दी। तभी एक व्यक्ति छत से भागता आया और बोला भागो, भयंकर आ गया है।
करीब 15 लोग मंदिर से 150 मीटर दूर एक मकान की ओट में दुबक गए और ऊपर से पत्थरों व पानी के साथ मौत को आते देखते रहे। मगर तभी पत्थरों ने ढेर ने पानी का रास्ता बदल दिया। एक ओर रेस्ट हाउस व दूसरी ओर फ्रंटियर हाउस पानी में बह गए। 5 मिनट बाद सब शांत हो गया और चारों ओर सिर्फ लाशें दिखाई दीं।
बिखरी पड़ी थीं लाशें
वह रात धर्मशाला में काटी, 18 की सुबह मंदिर गए तो वहां लाशें बिखरी पड़ी थीं। इसी दिन प्राइवेट चॉपर केदारनाथ पहुंचा, लेकिन इसमें सिर्फ चार घायल ही जा पाए। इसके बाद भवना सिंह मंदाकिनी नदी और उफनती गौरी गंगा को पार कर मैदानी जगह पर पहुंचे। 21 जून को हेलीकॉप्टर वहां पहुंचा और उनकी जान बच गई।
उत्तराखंड आपदा की विशेष कवरेज
पानी के साथ आए मलबे से करीब 20 लोग मर चुके थे। लाशों के बीच छह दिन गुजारने के बाद मुश्किल से घर पहुंचा हूं। यह कहना है केदारनाथ में जलप्रलय को करीब से देखने वाले जीएमवीएन के भवान सिंह रावत का।
19 टूरिस्ट भी मौजूद थे
मोहकमपुर निवासी भवान सिंह रावत केदारनाथ स्थित जीएमवीएन के टूरिस्ट रेस्ट हाउस में मैनेजर के रूप में कार्यरत हैं। यात्रा सीजन में उनके साथ करीब 21 लोगों की टीम मौजूद थी। भवान सिंह ने बताया कि 16 जून को उनके रेस्ट हाउस में 19 टूरिस्ट भी मौजूद थे।
रात साढे़ 8 बजे लगा कि भूकंप आ गया। बाहर देखा तो मंदिर के पीछे से पानी के साथ मलबा आ रहा था। बचने के लिए वे मंदिर की ओर भागे, लेकिन वहां भीड़ के कारण जगह न मिलने पर उन्होंने मंदिर समिति के ऑफिस में शरण ली। उनके सामने 14 हट, स्टाफ रूम, चौकीदार रूम पानी के साथ बह गए।
एक मंजिल में भर गई मिट्टी
मंदिर के पीछे शंकराचार्य भवन व भारत सेवा आश्रम की एक मंजिल में मिट्टी भर गई। आईटीबीपी के जवानों ने तुरंत कार्रवाई करते हुए कीचड़ में फंसे 15-16 लोगों को बाहर निकाला। लोगों के अनुसार करीब 20 लोग मिट्टी के नीचे दब चुके थे। आईटीबीपी ने एक होटल से एसडीएम और सीओ को भी घायल अवस्था में बाहर निकाला था।
सारी रात डर के साथ काटी। 17 जून की सुबह 5 बजे रेस्ट हाउस गए, लेकिन कीचड़ भरा होने के कारण काली कमली व जलाराम धर्मशाला में रुके। सुबह गाइड ने रेस्ट हाउस की बिल्डिंग में मौजूद पर्यटकों को निकाला। सुबह सवा 7 बजे दोबारा विस्फोट की आवाज सुनाई दी। तभी एक व्यक्ति छत से भागता आया और बोला भागो, भयंकर आ गया है।
करीब 15 लोग मंदिर से 150 मीटर दूर एक मकान की ओट में दुबक गए और ऊपर से पत्थरों व पानी के साथ मौत को आते देखते रहे। मगर तभी पत्थरों ने ढेर ने पानी का रास्ता बदल दिया। एक ओर रेस्ट हाउस व दूसरी ओर फ्रंटियर हाउस पानी में बह गए। 5 मिनट बाद सब शांत हो गया और चारों ओर सिर्फ लाशें दिखाई दीं।
बिखरी पड़ी थीं लाशें
वह रात धर्मशाला में काटी, 18 की सुबह मंदिर गए तो वहां लाशें बिखरी पड़ी थीं। इसी दिन प्राइवेट चॉपर केदारनाथ पहुंचा, लेकिन इसमें सिर्फ चार घायल ही जा पाए। इसके बाद भवना सिंह मंदाकिनी नदी और उफनती गौरी गंगा को पार कर मैदानी जगह पर पहुंचे। 21 जून को हेलीकॉप्टर वहां पहुंचा और उनकी जान बच गई।