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पर्दे के पीछे के खेल में सूत्रधार रहे अरुण जेटली
नई दिल्ली/हेमंत रस्तोगी
Updated Mon, 03 Jun 2013 01:42 AM IST
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बीसीसीआई की महत्वपूर्ण वर्किंग कमेटी की बैठक से पहले लिखी गई पर्दे के पीछे की कहानी किसी सस्पेंस थ्रिलर की तरह रोचक है।
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इस पटकथा के सूत्रधार कोई और नहीं बल्कि अगले बोर्ड अध्यक्ष की दावेदारी में नंबर वन अरुण जेटली हैं। श्रीनिवासन पद छोड़ने के लिए तैयार हुए तो उनके स्थान पर यह जिम्मेदारी संभालने के लिए उनकी पहली पसंद अरुण जेटली थे।
सही मायनों में श्रीनिवासन कैंप और खुद जगमोहन डालमिया भी इसके लिए तैयार थे। लेकिन जेटली इस पचड़े में नहीं फंसना चाहते थे। सूत्रों की मानें तो खुद उन्होंने ही श्रीनिवासन से डालमिया के नाम को पक्का कराया।
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शनिवार की रात तक जेटली कैंप के खासम-खास लोगों को भी यह नहीं मालूम था कि श्रीनिवासन की जगह बोर्ड का कार्यभार संभालनें कौन जा रहा है।
हां, उन्हें यह जरूर उम्मीद थी कि रविवार की सुबह तक वे जेटली को इसके लिए जरूर तैयार कर लेंगे। लेकिन उन्होंने कुछ ऐसी व्यूह रचना की कि बैठक में हंगामें के बगैर सब कुछ उनके मन मुताबिक हो गया।
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जेटली ने ही रातों रात श्रीनिवासन को अपनी बजाय डालमिया के नाम के लिए तैयार कर लिया। डालमिया से अच्छे संबंधों के चलते श्रीनिवासन को भी इसमें कोई एतराज नहीं हुआ।
खुद जेटली ने बैठक में डालमिया के नाम का प्रस्ताव किया। सबसे ज्यादा विरोध की उम्मीद आईएस बिंद्रा से थी। लेकिन बिंद्रा और डालमिया के अच्छे संबंध रहे हैं, जिसके चलते वह भी विरोध नहीं कर सके।
जेटली ने डालमिया के नाम की पटकथा लिखकर एक तीर से कई शिकार खेले हैं। बोर्ड के चुनाव सितंबर में हैं। बोर्ड की रोटेशन पॉलिसी के तहत अगला अध्यक्ष नॉर्थ जोन से होना है।
इसलिए उनकी राह में कोई अड़चन नहीं आए इसके लिए उन्होंने श्रीनिवासन का विश्वास तो हासिल कर ही लिया है साथ में डालमिया को भी अपनी ओर मोड़ लिया है।
यही नहीं डालमिया को श्रीनिवासन के स्थान पर कार्यभार सौंपने के लिए कोई कानूनी अड़चन नहीं आए। इसकी व्यवस्था जेटली के दिमाग की उपज है।
क्रिकेट को छोड़ कुर्सी बचाई
भद्रजनों के खेल की साख पर ऐसा बट्टा तो कभी नहीं लगा था। जहां लक्ष्य स्पॉट फिक्सिंग जैसे कलंक से इस खेल को बचाने का होना चाहिए था, वहां भीतरघात राजनीति और आपसी गुटबाजी ने दुनिया के सबसे अमीर क्रिकेट बोर्ड की बेशर्मी की पोल खोलकर रख दी।
क्रिकेट के हश्र को भूल मामला कुर्सी बचाने का रह गया। श्रीनिवासन के दामाद मैयप्पन के खिलाफ जांच के लिए गठित पैनल का क्या हुआ, किसी को खबर नहीं।
पैनल के सदस्य जगदाले अब बीसीसीआई का हिस्सा नहीं हैं जबकि दो अन्य सदस्य तमिलनाडु हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त जज हैं। जगदाले की जगह तीसरे व्यक्ति के बारे में किसी ने सुध नहीं ली।
क्यों चुप हैं क्रिकेट के दिग्गज
विवाद उठा, बढ़ा और फिर फैलता गया। देश क्रिकेट में चल रही राजनीति उथल-पुथल से जूझ रहा है और राष्ट्रीय टीम के कप्तान कहते हैं, सही समय आने पर बोलेंगे। कोई नहीं जानता कब आएगा वो वक्त।
सचिन तेंदुलकर जरूर प्रेस रिलीज जारी कर इस विवाद को शर्मनाक और दुर्भाग्यपूर्ण करार देते हैं।
मगर पूर्व कप्तान सुनील गावस्कर, कपिल देव, सौरव गांगुली और अनिल कुंबले जैसे इस खेल के महान खिलाड़ियों का रुख सामने नहीं आता। क्या इन्हें एकजुट होकर खेल में हो रही इस राजनीति के खिलाफ आवाज नहीं उठानी चाहिए?
31 का गणित
27 रणजी ट्रॉफी में खेलने वाली सभी इकाइयां
1 क्रिकेट क्लब ऑफ इंडिया
1 नेशनल क्रिकेट क्लब (कोलकाता)
1 ऑल इंडिया यूनिवर्सिटीज
1 बीसीसीआई अध्यक्ष का खुद का वोट
(कुल 31 सदस्यों का दो-तिहाई चाहिए श्रीनिवासन को हटाने के लिए)
--श्रीनिवासन का दो साल का कार्यकाल इस वर्ष सितंबर में खत्म हो रहा है। वे दोबारा चुने जाते हैं तो इसे एक साल तक के लिए बढ़ाया जा सकता है। ऐसे में संभावना है कि सितंबर के अंत में होने वाली बोर्ड एजीएम तक श्रीनिवासन अपने पद पर बने रह सकते हैं।
--बीसीसीआई अध्यक्ष पद के लिए आखिरी बार वर्ष 2005 में चुनाव हुए थे। तब शरद पवार ने रणबीर सिंह महेंद्रा को मात दी थी।