मीडिया अधिकारों को लेकर ICC और BCCI में रार, हर साल टी-20 विश्व कप करवाने के पक्ष में नहीं है बोर्ड
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बीसीसीआई प्रबंधन में इस वक्त नए पदाधिकारियों के लिए चुनावी प्रक्रिया चल रही है। हालांकि 23 अक्तूबर को चुने जाने वाले नए सदस्यों और प्रमुखों को आईसीसी के साथ एक नए विवाद का सामना करना पड़ सकता है। आईसीसी का प्रस्तावित भावी दौरों के कार्यक्रम (एफटीपी) का भारतीय क्रिकेट बोर्ड (BCCI) के राजस्व पर विपरीत असर डाल सकता है।
नए प्रस्ताव में टी-20 विश्व कप हर साल और 50 ओवरों का विश्व कप तीन साल में एक बार कराने की पेशकश है। इसके जरिए आईसीसी 2023-2028 की अवधि के लिए वैश्विक मीडिया अधिकार बाजार में प्रवेश करना चाहती है ताकि उसे स्टार स्पोर्ट्स जैसे संभावित प्रसारकों से राजस्व का मोटा हिस्सा मिल सके।
सौरव गांगुली और टीम के लिए बड़ी चुनौती
सौरव गांगुली की अध्यक्षता वाले बीसीसीआई के सामने यह बड़ी चुनौती होगी। एफटीपी वह कैलेंडर है जो आईसीसी और सदस्य देश अलग-अलग पांच साल की अवधि के लिए बनाते हैं जिसके तहत द्विपक्षीय और बहुराष्ट्रीय टूर्नामेंट खेले जाते हैं। 2023 के बाद की अवधि के लिए प्रस्तावित मसौदे पर हाल ही में आईसीसी मुख्य कार्यकारियों की बैठक में बात की गई। बीसीसीआई सीईओ राहुल जोहरी ने साफतौर पर आईसीसी सीईओ मनु साहनी को ईमेल में कहा कि यह फैसला कई कारणों से सही नहीं होगा।
बीसीसीआई को घाटा
बोर्ड के एक सीनियर अधिकारी ने कहा कि चुनाव होने के बाद बोर्ड अब इस मामले में सख्त कदम उठाएगा। उन्होंने कहा, ‘मान लीजिए कि स्टार स्पोर्ट्स या सोनी टीवी, रेडियो, डिजिटल प्रसारण अधिकार का सौ करोड़ रुपये का बजट है। इसमें दो अहम पक्ष आईसीसी और बीसीसीआई हैं। बीसीसीआई के पास आईपीएल और द्विपक्षीय सीरीज (पाकिस्तान के अलावा) हैं। हर साल टी-20 विश्व कप कराना रोमांचक है और यदि आईसीसी बाजार में पहले पहुंचता है तो राजस्व का बड़ा हिस्सा उसके खाते में जाएगा। प्रसारक यदि 2023-2028 की अवधि के लिए आईसीसी अधिकार खरीदने पर 60 करोड़ खर्च करता है तो बीसीसीआई के बाजार में उतरने पर उसके पास 40 करोड़ रुपये ही बचे रहेंगे। इससे बीसीसीआई का राजस्व घट जाएगा।’
वहीं बीसीसीआई के सीईओ राहुल जोहरी ने कहा, ‘बीसीसीआई 2023 के बाद आईसीसी टूर्नामेंटों और प्रस्तावित अतिरिक्त आईसीसी टूर्नामेंटों पर ना तो सहमति जताता है और ना ही पुष्टि करता है। इसके अलावा बीसीसीआई को द्विपक्षीय सीरीज के अपने करार भी पूरे करने हैं। वहीं इस मसले पर कार्यसमूह (सदस्य बोर्डों के सीईओ) की राय नहीं ली गई तो एकतरफा फैसला अपरिपक्व होगा। इसके यह भी मायने हैं कि सही प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया।’