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रघुराम राजन की गलती क्या है
एम के वेणु
Updated Tue, 24 May 2016 03:49 PM IST
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इस वर्ष सितंबर में तीन वर्ष का अपना कार्यकाल पूरा करने वाले रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन को हटाने के लिए भाजपा के कुछ वरिष्ठ नेताओं ने अभियान चला रखा है। इनमें सबसे मुखर राज्यसभा सांसद सुब्रमण्यम स्वामी हैं, जिन्होंने सार्वजनिक रूप से कहा कि राजन को निश्चित रूप से हटाया जाना चाहिए, क्योंकि वह 'इरादतन अर्थव्यवस्था को नष्ट कर रहे हैं।' स्वामी ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखा है कि राजन 'मानसिक रूप से पूरी तरह से भारतीय नहीं हैं, क्योंकि उन्हें अमेरिका द्वारा ग्रीन कार्ड मिला हुआ है।'
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स्वामी तो खुलेआम राजन के खिलाफ मुखर हैं, जबकि भाजपा के कई वरिष्ठ मंत्री, खासकर जो आर्थिक विभागों का कामकाज देखते हैं, निजी तौर पर भुनभुनाते हैं कि रिजर्व बैंक जैसी संस्था का नेतृत्व करने के लिहाज से, जिस पर मुद्रास्फीति से मुकाबला करने और विकास और वित्तीय स्थिरता का वातावरण तैयार करने की जिम्मेदारी है, राजन सही व्यक्ति नहीं हैं।
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यह अजीब है कि जहां सरकार के कुछ आर्थिक प्रबंधक राजन को अयोग्य मानते हैं, वहीं वैश्विक निवेशक समुदाय और स्वतंत्र आर्थिक विश्लेषक राजन की प्रशंसा कर रहे हैं कि उन्होंने आंशिक रूप से ब्याज दर में कटौती की, मौद्रिक स्थिरता कायम रखने में कामयाबी पाई और बैंकों में बड़े पैमाने पर खराब ऋणों को साफ करने में तत्परता दिखाई। इसलिए कुछ भाजपा नेताओं द्वारा नए सिरे से राजन को अर्थव्यवस्था में ठहराव के लिए दोषी ठहराने की कोशिश ऐसा धब्बा है, जो नहीं धुलेगा। इस संदर्भ में प्रधानमंत्री मोदी की चुप्पी ने वैश्विक निवेशकों को गलत संकेत दिया है। बड़े घरेलू बड़े व्यवसायियों ने अपना मुनाफा बढ़ाने के लिए ब्याज दर में भारी कटौती के लिए काफी लॉबिंग की थी। पर रिजर्व बैंक ने साफ कहा कि ब्याज दरों में भारी कटौती तभी होगी, जब खासकर खाद्य मुद्रास्फीति पूरी तरह निचले स्तर पर स्थिर होगी। इसने यह तर्क भी दिया कि कर्ज देने की ब्याज दर में भारी कटौती करने पर जमा राशि पर ब्याज दर में भी उतनी ही कटौती की जरूरत होगी, जिससे सावधि जमाकर्ताओं और छोटी बचत करने वालों की आय घटेगी, जो ब्याज से मिलने वाली आय पर निर्भर हैं।
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राजन ने यह कहते हुए अपने आलोचकों का मुकाबला किया, कि पिछले साल भर से ब्याज दर में क्रमिक 150 बेसिस पॉइंट की कटौती का फायदा पूरी तरह कर्ज लेने वालों को नहीं दिया गया है, क्योंकि बड़े पैमाने पर बैंक का धन व्यवसायियों (एक अनुमान के मुताबिक, 10 लाख करोड़) को दिया गया, जिसकी वसूली मुश्किल है। विशेषज्ञों के मुताबिक, अभी बैंकों के पास उधार देने के लिए पर्याप्त धन नहीं है।
इसलिए खराब ऋण के नकारात्मक प्रभावों का दोष; जिसके लिए एनडीए यूपीए को जिम्मेदार ठहराता है, रिजर्व बैंक के गवर्नर पर नहीं थोपा जा सकता, जैसा कि भाजपा नेता करते दिख रहे हैं। इसके विपरीत, राजन इस बढ़ते खराब ऋणों से निपटने के लिए तत्परता की कमी का रोना रो रहे हैं, जिसकी स्थिति आर्थिक सुधारों में देरी के कारण और भी खराब होती जा रही है। कुछ लोग राजन को इसलिए भी दोषी मानते हैं, क्योंकि उन्होंने पिछला कर्ज न चुकाने वाले बड़े व्यवसायियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की वकालत की थी। कर्ज न चुकाने वाले उद्योपतियों द्वारा भव्य समारोह आयोजित करने की पहली बार सार्वजनिक आलोचना राजन ने ही की थी।
ब्याज दरों पर कितनी जल्दी कितनी ज्यादा कटौती हो, यह बहस पिछले दो वर्षों से, जब से राजग सत्ता में आया है, तेज हुई है। जबकि राजन ने ब्याज दरों में उतनी ही कटौती की, जिससे मुद्रास्फीति के नियंत्रण में मदद मिले। उन्होंने पूरी वित्तीय व्यवस्था की स्थिरता पर ध्यान देने के अलावा उस मुद्रा की स्थिरता पर भी नजर रखी, अस्थिर वैश्विक अर्थव्यवस्था के कारण जिस पर असर पड़ने की आशंका थी। उन्होंने ब्याज दरों में कटौती की शर्त के रूप में सरकार को सख्त वित्तीय अनुशासन के लिए बाध्य किया। जब अर्थव्यवस्था में भारी सार्वजनिक निवेश की जरूरत है, तब राजन की इस सख्ती से अनेक लोग असहमत हैं। मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद पनगड़िया राजकोषीय सुधार की गति धीमी करने के पक्षपाती थे, पर वित्त मंत्री ने अंततः राजन की लाइन पर चलना पसंद किया। बजट पेश करने के बाद वित्त मंत्री ने कहा था कि वित्तीय एवं मौद्रिक नीतियों के बीच तालमेल के संबंध में वह और रघुराम राजन एक साथ हैं। ऐसे में राजन के खिलाफ अभियान में आई तेजी अजीब है।
यह परंपरा बन गई है कि रिजर्व बैंक के गवर्नर का कार्यकाल पांच वर्षों का होता है। पहले के चार गवर्नर-डी सुब्बाराव, वाई वेणुगोपाल रेड्डी, बिमल जालान, और सी. रंगराजन सबने पांच साल कार्य किया, पर तीन साल और दो साल के कार्यकाल के तहत। इनमें वेणुगापाल रेड्डी अपवाद रहे, जिन्हें तत्कालीन वित्त मंत्री जसवंत सिंह ने पूरे पांच साल का कार्यकाल यह कहते हुए दिया कि इससे संस्थान में स्थिरता बनी रहेगी। इसलिए यह अपेक्षा हो सकती है कि रघुराम राजन को भी पांच साल का कार्यकाल दिया जाना चाहिए, खासकर इसलिए कि वह उभरती अर्थव्यवस्थाओं में केंद्रीय बैंक के एक बेहतर गवर्नर माने जाते हैं। यदि उन्हें और दो वर्ष का कार्यकाल नहीं दिया गया, तो यह उम्मीद गलत साबित होगी। अगर राजन की जगह इस जटिल कार्य के लिए किसी अकुशल व्यक्ति को लाया जाएगा, तो यह निराशा और बढ़ जाएगी। पूरी दुनिया में आर्थिक प्रबंधकों की धारणा है कि रिजर्व बैंक के मौजूदा गवर्नर का भारतीय अर्थव्यवस्था पर प्रभाव अब तक का सबसे समझदारी भरा रहा है।
प्रधानमंत्री ने राजन के पेशेवर रवैये की सराहना ही की है। वित्त मंत्री ने संकेत दिया है कि राजन को सेवा विस्तार योग्यता के आधार पर दिया जाएगा, उनके खिलाफ चलाए जा रहे नकारात्मक अभियान के आधार पर नहीं। लेकिन सच यह है कि राजन को सेवा विस्तार न देकर सरकार अपनी ही हंसी कराएगी।