{"_id":"57308ecb4f1c1b4c129198f5","slug":"we-must-dialogue-with-kashmir","type":"story","status":"publish","title_hn":"पाक से न सही कश्मीर से तो बात करें","category":{"title":"Columns","title_hn":"कॉलम","slug":"columns"}}
पाक से न सही कश्मीर से तो बात करें
कुमार प्रशांत
Updated Tue, 10 May 2016 01:35 PM IST
विज्ञापन
कुमार प्रशांत
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
तो पाकिस्तान ने बातचीत बंद करने का मन बनाकर रखा है। कभी हम, तो कभी वे ऐसा मन बनाते ही रहते हैं। दोनों देशों में बनती और बदलती सरकारों की कसौटी भी इसी एक सवाल पर होती रही है कि किसने, किससे, कब और कहां बातचीत की। भारत में तो एकदम प्रारंभ से ही लोकतांत्रिक सरकारें रही हैं, पाकिस्तान में सरकारों का चरित्र लगातार बनता-बिगड़ता रहा है। बातचीत फिर भी दांव-पेचों में फंसती रहती है।
विज्ञापन
लेकिन एक सवाल है, जिससे हम मुंह चुराते हैं : क्या बातचीत भारत और पाकिस्तान के बीच ही होनी है? इस विवाद के दो ही घटक हैं, ऐसा मानना सच नहीं और उचित भी नहीं। भारत पाकिस्तान के बीच जब भी बातचीत होगी, कश्मीर के लोग उसका तीसरा कोण होंगे ही। साठ वर्षों से अधिक समय में भी हम कश्मीर को इस तरह अपना नहीं सके कि वह अपना बन जाए। जब सत्ता का सवाल आया, तो पिता मुफ्ती से लेकर बेटी महबूबा तक से भाजपा ने रिश्ते बना लिए, अन्यथा उसकी खुली घोषणा तो यही थी न कि ये सब देशद्रोही ताकतें हैं, जिनके साथ बैठना भी कुफ्र है। कुछ ऐसा ही रवैया कांग्रेस का भी रहा है और नेशनल कांफ्रेंस का भी। सब हाथ मिलाकर सत्ता में जाते रहे और सत्ता हाथ से जाते ही एक-दूसरे पर कालिख उछालते रहे हैं। इन सबके बावजूद न नेशनल कांफ्रेंस, न कांग्रेस, न भाजपा और न स्वर्गीय मुफ्ती ही कभी ऐसी हैसियत बना सके कि कह सकें कि कश्मीर का अवाम उनके साथ है। पाकिस्तान इसी का फायदा उठाकर अलगाववादियों को उकसाता भी रहा है।
विज्ञापन
आज अगर हमारे सोचने और करने के लिए कुछ बचता है, तो वह यह है कि पाकिस्तान हमसे बात करे या न करे, हम कश्मीर में एक सुनियोजित ‘संवाद सत्याग्रह’ करें। यह काम नौजवानों को करना होगा। ये संवेदनशील, प्रशिक्षित युवा कश्मीर पहुंचें और विमर्श का एक अटूट सिलसिला शुरू हो। और हमें कश्मीर के लोगों पर पूरा भरोसा करना चाहिए कि वे घटनाक्रम से व्यथित हैं, चालों-कुचालों के कारण भटके और उग्र भी हैं, लेकिन पागल नहीं हैं। ऐसा ही मानकर तो गांधी भी नोआखाली पहुंचे थे न!
विज्ञापन
यह सत्याग्रह इसलिए कि कश्मीर यह समझ सके कि वह जितना घायल है, बाकी का देश भी उतना ही घायल है, राजनीतिक बेईमानी का शिकार अकेला वह नहीं है, क्षेत्रीय असंतुलन केवल उसके हिस्से नहीं आया है, फौज-पुलिस के जख्मों से केवल उसका सीना चाक नहीं हुआ है और यह भी कि फौज-पुलिस का अपना सीना भी उतना ही रक्तरंजित है।
हो सकता है, कश्मीर हमसे उलट कर कहे कि वह इस देश को ही अपना नहीं मानता, तो इसके लोकतंत्र की फिक्र क्यों करे? ठीक है, लेकिन कश्मीर को यह बताना तो होगा ही कि उसका जो भी देश होगा, वहां भी सवाल तो सारे यही होंगे। कश्मीरी युवा चाहें, तो पाकिस्तानी युवाओं से बात करें, म्यांमार और अफगानी युवाओं से बात करें कि श्रीलंकाई युवाओं से बात करें, जवाब एक ही मिलेगा कि जवाब किसी के पास नहीं! तख्त, तिजोरी और तलवार के बल पर चलने वाला तंत्र दुनिया में हर कहीं एक ही काम कर रहा है-वह लोक की पीठ पर बैठा, उसकी गर्दन दबा रहा है। कश्मीर भी समझे और हम सब भी, कि इस लड़ाई में अगर लोक को सबल और सफल होना है, तो ‘संवाद सत्याग्रह’ तेज करना होगा। ऐसा ही एक ‘संवाद सत्याग्रह’ जयप्रकाश नारायण ने आजादी के बाद नगालैंड में चलाया था। खुले संवाद में गजब की शक्ति होती है।