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रक्षा सौदों का सच

Fri, 29 Apr 2016 07:28 PM IST
प्रशांत दीक्षित
प्रशांत दीक्षित Updated Fri, 29 Apr 2016 07:28 PM IST
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Truth about Defence deal
प्रशांत दीक्षित

देश के सियासी माहौल पर अगस्ता वेस्टलैंड रिश्वत घोटाले के तेजी से उभरने के साथ ही हम लोग अजीब विरोधाभास की स्थिति में फंस गए हैं। यूपीए शासनकाल में रक्षामंत्री ने भ्रष्टाचार विरोधी सबसे पुष्ट व्यवस्था कायम की थी और प्रयास किए थे कि रक्षा संबंधी खरीद हथियार विक्रेताओं के अनुकूल फैसले करवाने वाले बिचौलियों और पैसे के लेन-देन से मुक्त रहे, पर उन पर भारत की रक्षा तैयारियों को ताक पर रखने के आरोप लग रहे हैं।

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सबसे पहले देखना होगा कि रक्षा सौदों में भ्रष्टाचार होता कैसे है। भले ही इसके तरीके अलग-अलग हों, लेकिन यह वैश्विक परिघटना है। मसलन, अमेरिका में हथियार निर्माता नीति-निर्माताओं को इस धारणा को मानने पर मजबूर करते हैं कि अमेरिका खतरे में है और फिर हथियारों को विकसित करने के लिए सहायता और यहां तक कि सब्सिडी देने के लिए प्रस्ताव पेश करते हैं। ऐसा ही एक मंच, अमेरिकी कंपनी नार्थरोप ग्रमन है, जिसने अमेरिकी वायु सेना के लिए बी 2 बॉम्बर विकसित किया, जिसकी औसत लागत वर्ष 1997 में प्रति विमान 2.1 अरब डॉलर थी। कुल 132 विमान खरीदे जाने की योजना बनी थी, लेकिन बाद में 21 विमान निर्मित हुए और 20 अब भी उड़ रहे हैं। ये विमान थर्मोन्यूक्लियर बम के साथ 12,000 किलोमीटर दूर लक्ष्य को निशाना बनाने की क्षमता के साथ विकसित किए गए थे, हालांकि अमेरिका के पास पहले से ही सामरिक वायु कमान के विमान और परमाणु क्षमता से लैस अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइलें मौजूद थीं। इसी तरह अमेरिका अपने नाटो सहयोगियों को पारस्परिकता के नाम पर अमेरिकी उपकरण खरीदने के लिए मजबूर करता है। इसके लिए यूरोपीय नेताओं पर भारी दबाव बनाया जाता है, लेकिन ये बातें कभी सामने नहीं आतीं। वर्ष 2002 में अमेरिका ने अपने जीडीपी का चार फीसदी रक्षा पर खर्च किया था और रक्षा विभाग, पेंटागन और विदेश विभाग के बहुत से लोग कॉर्पोरेट उदारता से लाभान्वित हुए। रक्षा खर्च में भारी कटौती के बावजूद अमेरिका ने वर्ष 2012 में रक्षा पर 900 अरब डॉलर खर्च किए। लेकिन सिर्फ हाल के दिनों में इनसाइडर ट्रेडिंग को संकट के स्रोत के रूप में देखा गया है।
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हमारे देश में इतना ज्यादा पैसा खर्च नहीं होता। अपने जीडीपी का मात्र 1.9 फीसदी रक्षा पर खर्च करते हुए 2015 में हमारा रक्षा बजट मात्र 45 अरब डॉलर का था। इसलिए हमें उसका बेहतर उपयोग करना होगा और वह भी नीति-निर्माताओं की जेब में जाने से रोकते हुए। हमें न केवल यह सुनिश्चित करना होगा कि हम भ्रष्टाचार से सख्ती से निपटेंगे, बल्कि उसे सजा दिलाने के लिए हर संभव उपायों का इस्तेमाल करेंगे। दूसरी तरफ हमें बिचौलियों की भूमिका कम करने के तरीके ढूंढने होंगे। इस लिहाज से सरकार से सरकार के बीच सौदा सबसे सुरक्षित विकल्प है। सी-130जे और सी-17 गैलेक्सी जैसे कई सौदे सीधे अमेरिकी सरकार से किए गए थे। इसी तरह हाल ही में फ्रांस की सरकार से राफेल की खरीदारी हो रही है। 124 राफेल विमान खरीदने की योजना के मुकाबले मात्र 36 राफेल लड़ाकू विमान नौ अरब डॉलर में खरीदा गया है। इस पर काफी पैसा खर्च किया गया है, पर रक्षा सौदों में सबसे महत्वपूर्ण है पारदर्शिता और अनियमितता पर रोक। भ्रष्टाचार न होने देने की बात कहना आसान है, पर करना मुश्किल। हेरा-फेरी हमेशा संभव होती है।
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लेकिन किसी भी आरोप को उसकी निर्णायक परिणति तक पहुंचाने में हमारी अक्षमता किसी से छिपी नहीं है। बोफोर्स का मुद्दा अब भी अनसुलझा है। और इसलिए हम यह मानने पर मजबूर हैं कि यह मुद्दा शुद्ध रूप से राजनीतिक उद्देश्य से उछाला गया। राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने ठीक ही कहा था कि 'यह केवल मीडिया ट्राइल था।' एक पूर्व रक्षा सचिव, जिनके खिलाफ बोफोर्स मामले में आरोप पत्र दाखिल किया गया था, बदनामी में जीते रहे और 71 वर्ष की उम्र में मर गए। विडंबना यह थी कि बोफोर्स एक मजबूत हथियार था और सरकार के पास इस पर से प्रतिबंध हटाने और 1999 के कारगिल युद्ध के दौरान इनमें से कुछ तोपों का इस्तेमाल करने के अलावा कोई चारा नहीं था। फिर एचडीडब्ल्यू पनडुब्बियों के मामले की जांच सीबीआई द्वारा 1990 से की जा रही थी। मार्च, 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने सबूतों के अभाव में 465 करोड़ रुपये के पनडुब्बी सौदे में रिश्वत के आरोप से एचडीडब्ल्यू को बरी कर दिया। विदेश मंत्रालय ने रक्षा मंत्रालय को लिखा कि वह एचडीडब्ल्यू के साथ बात करने के लिए स्वतंत्र है।

इसी तरह, रक्षा मंत्रालय के सूत्रों के मुताबिक, दक्षिण अफ्रीका की रक्षा कंपनी डेनेल, जिसे रिश्वत के आरोपों के बाद काली सूची में डाला गया था, फिर से भारत के साथ व्यापार शुरू करने में सक्षम हो सकती है। इस कंपनी को काली सूची से हटाया जा सकता है, क्योंकि सीबीआई कथित तौर पर एंटी-मैटेरियल राइफल खरीद मामले में कंपनी के खिलाफ कोई भी आरोप साबित करने में नाकाम रही है।
मुझे आशंका है कि कहीं अगस्ता मामले का भी वही हश्र न हो। जहां एक तरफ सत्तारूढ़ पार्टी भाजपा है, जो इतालवी अदालत के संकेत के आधार पर कांग्रेस नेतृत्व पर सीधे उंगली उठा रही है, तो दूसरी ओर यूपीए सरकार ने ही इस सौदे को रद्द कर दिया था और इसकी सीबीआई को इसकी जांच सौंपी थी। सीबीआई के पास यह मामला पिछले तीन साल से है। बोफोर्स की तरह ही अगस्ता एड्ब्ल्यू 101 भी गुणवत्ता के मामले में उम्दा है। यह हेलिकॉप्टर 4500 मीटर की ऊंचाई पर उड़ान भरने में खासा सक्षम है। हालांकि अगस्ता को समायोजित करने के लिए जानबूझ कर गुणात्मक आवश्यकता की सीमा को घटाने का आरोप तर्कसंगत प्रतीत नहीं होता, क्योंकि यह ऐसा हेलिकॉप्टर है, जो तमाम गुणात्मक आवश्यकताओं को पूरा करता है और परिचालन सीमा को कम करना बेहतर उपाय है, जो एसपीजी समेत कई लोगों की सलाह पर किया गया था।


यह समय ही बताएगा कि रक्षा सौदों से संबंधित आशंकाओं को पार करने में हम कब सक्षम होते हैं, पर सैन्य एवं नागरिक, दोनों क्षेत्र के नौकरशाहों को निर्भीक होकर काम करना होगा।

पूर्व एयर कोमोडोर और रक्षा मामलों के विशेषज्ञ हैं

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