ट्रंप और मोदी के अभियान की समानता
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कई मामलों में डोनाल्ड ट्रंप का राष्ट्रपति अभियान नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री अभियान से मिलता-जुलता है। दोनों को समाज-विभाजक, मुस्लिम-विरोधी, अनुचित महत्वाकांक्षी, राजनीतिक रूप से ‘बाहरी’, अपनी पार्टी में ही वरिष्ठ नेताओं द्वारा नापसंद, वैदेशिक मामलों के अनुभव की दृष्टि से अनुपयुक्त, आदि कहा गया। दोनों को आम जनता का तीव्र समर्थन हासिल है। (ट्रंप का रिपब्लकिन पार्टी का प्रत्याशी बनना लगभग तय है।) जैसा मोदी के साथ हुआ, अति-विरोध या अंध-विरोध से ट्रंप के प्रति अमेरिकी जनता की सहानुभूति बढ़ सकती है।
जैसे मोदी को आर्थिक-विकास वाला माना गया, उसी तरह ट्रंप को भी अत्यंत सफल और अनुभवी उद्योगपति होने के नाते अर्थव्यवस्था की खामी-खूबी समझने वाला माना जा रहा है। ट्रंप ने अपने भाषणों में अमेरिका की आर्थिक नीतियों, विदेश-व्यापार, आदि की खूब धुलाई की है, जिसका संदेश है कि वह उसे सुधारेंगे। वहां अवैध मैक्सिकी प्रवासियों की बड़ी संख्या में उपस्थिति भारत में बंगलादेशी घुसपैठ से कुछ मिलती है, जिसे ठीक करने की आशा दोनों से की गई।
अंततः जिस तरह मोदी से हिंदू-विरोधी सेक्यूलरिज्म की विकृति को सुधारने की उम्मीदें की गई थीं, उसी तरह ट्रंप से भी दुनिया भर में अमेरिका-विरोधी इस्लामी रुख से निपटने की उम्मीद की जा रही है। हालांकि एक अंतर भी है। जहां मोदी ने कभी इस पर कोई वायदा नहीं किया था, वहीं ट्रंप ने खुद इस विषय को जमकर उठाया है। ट्रंप ने तो यहां तक कहा कि वह ‘मुसलमानों को अमेरिका आने नहीं देंगे, क्योंकि वे (मुसलमान) हमसे घृणा करते हैं।’
इस्लाम के प्रति आलोचनात्मक रवैये ने ही ट्रंप को सबसे विवादास्पद बनाया। अभी तक उस बयान को ट्रंप के ‘खतरनाक’ या अमान्य उम्मीदवार होने का कारण बताया जा रहा है। किंतु बड़ी संख्या में अमेरिकी मतदाताओं ने ट्रंप की बातों को सही माना। यदि लोकतंत्र का आधार जनमत का आदर है, तो इस बिंदु पर ट्रंप के लिए सहानुभूति बढ़नी स्वभाविक होगी।
पूरी दुनिया में मुसलमानों के बीच एक स्थायी अमेरिका-विरोधी भाव जग-जाहिर है। हालांकि वे अमेरिका को जिम्मेदार ठहराते हैं। मगर इसका ठोस आधार नहीं है। मुसलमानों में वही विरोधी भाव यूरोप के प्रति भी है। इसी तरह, भारत की उदारता, लोकतंत्र और सेक्यूलरिज्म की जयकार करने के बजाए वे सदैव क्षोभ, शिकायत और नाराजगी के तेवर में रहते हैं।
सच है कि मुस्लिम जगत में ऐसे विवेकशील मुसलमान भी हैं, जो इस्लाम में सुधार की आवाज उठा रहे हैं। सलमान रुश्दी से लेकर तारिक फतह और वफा सुलतान तक ऐसे लोगों की संख्या बढ़ रही है। वे इस्लाम से ऊपर उठकर मानवतावादी विचारों का प्रचार-प्रसार करना जरूरी समझते हैं। लेकिन दुनिया भर के गैर-मुस्लिम नेताओं ने अब तक उन्हें उपेक्षित किया है। ऐसे में डोनाल्ड ट्रंप का रुख एक रोचक मोड़ साबित हो सकता है। यदि कोई अमेरिकी राष्ट्रपति इस एजेंडे को हाथ में ले ले, तो इस्लामी राजनीति में सुधार आरंभ हो सकता है। दशकों से चल रहे जिहाद से असंख्य मुसलमानों समेत पूरी दुनिया हैरान-परेशान है। कोई भी बुनियादी पहल उनके मजहब को सुधारवादी दिशा दे सकती है।
डोनाल्ड ट्रंप चुनाव जीतेंगे या नहीं, यह अभी अनुत्तरित है। लेकिन ट्रंप का चुनावी अभियान इस्लामी जगत में आत्म-चिंतन और सुधार के प्रश्न को उभारेगा। इससे भारत का हित भी जुड़ा है।