सूखे के संकट में सरकार और समाज की भूमिका
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भयंकर सूखे की स्थिति के बीच उम्मीद बनी है कि इंद्रदेव मेहरबान होने वाले हैं। मौसम विभाग ने जो पूर्वानुमान जारी किया है, उसके मुताबिक इस बार सामान्य से अधिक करीब 106 फीसद बारिश होने की उम्मीद है। मौसम विज्ञान इस आंकड़े को बेहतर मानता है। हालांकि मानसून से जुड़ा अभी यह पहला पूर्वानुमान है। लंबे समय तक अधिकतर पूर्वानुमानों के गलत साबित होने पर मौसम विभाग की साख पर ही सवाल खड़ा हुआ। लेकिन बीते वक्त में मौसम विज्ञान ने काफी प्रगति की है। वर्ष 2015 के मौसम विभाग के बाद वाले पूर्वानुमान में बामुश्किल दो फीसद का अंतर था।
ऐसे में अप्रैल के इस पूर्वानुमान को एक संकेत के तौर पर देखें, तो यकीनन मुल्क के लिए यह बड़ी राहत की बात है, क्योंकि पिछले साल अल-नीनो असर के चलते सामान्य से 14 फीसदी, जबकि उससे पिछले साल 12 फीसदी कम बारिश हुई थी। दो साल तक लगातार मौसम की इस बेरूखी का असर अब तक देखने को मिल रहा है। देश के दो सौ से ज्यादा जिले सूखे की चपेट में हैं। 50 करोड़ से ज्यादा लोग सीधे तौर पर सूखे से प्रभावित हैं। महाराष्ट्र के कई जिलों में धारा 144 लगी हुई है। बुंदेलखंड में बंदूक के सहारे पानी की निगरानी की जा रही है। वहीं रांची हाई कोर्ट ने नगर निगम को सेना की मदद लेने की सलाह दी है। ये अप्रैल की शुरुआत तक के हालात हैं। मई और जून अभी बाकी हैं।
सूखाग्रस्त मराठवाड़ा, विदर्भ और बुंदेलखंड जैसे इलाकों में भी मानसून बेहतर रहने वाला है। पिछली बार अल-नीनो ने रुलाया था, लेकिन इस बार ला-नीना राहत बनकर आने वाली है। चूंकि इस कृषि प्रधान देश में करीब 55 फीसदी खेती इंद्रदेव की मेहरबानी पर ही निर्भर है। लिहाजा उम्मीद जगती है कि खरीफ की फसल बेहतर रहेगी। जाहिर है, किसान की संभावित खुशी देखकर उद्योग-धंधों में भी ऊर्जा का संचार हुआ है। आंकड़े जारी होने के बाद शेयर बाजार में दिखा उत्साह इसकी झलक भर है। किसान की आय बढ़ेगी, तो बाजार में मांग बढ़ेगी, जिसका सीधा असर कंपनियों की उत्पादकता पर पड़ेगा। इन आंकड़ों से महंगाई के काबू में रहने की संभावना भी प्रबल होती है। मानो सब कुछ अच्छा-अच्छा।
लेकिन सब कुछ अच्छा-अच्छा मानकर लापरवाह हो जाना भयंकर भूल होगी। समझना होगा कि चार महीने की इन अनमोल बूंदों से बीते दो साल का जल संकट खत्म नहीं होने वाला। लिहाजा वर्षा जल के बेहतर प्रंबधन के लिए अभी से तैयार होकर सरकार और समाज, दोनों को जुटना होगा। सरकार के स्तर पर व्यावहारिक नीतियां बनें, जबकि समाज के स्तर पर उनका बेहतर क्रियान्वयन सुनिश्चित हो। पूर्व के अनुभव इस गंभीरता की जरूरत पर बल देते हैं। मसलन, मनरेगा के तहत पिछले 10 वर्षों में जल संचयन पर करीब दो लाख करोड़ रुपये खर्च कर 25 से 30 लाख जल निकाय तैयार किए गए। ये जल निकाय देश के हर गांव को जल संकट से उबारने के लिए काफी थे। लेकिन मौके पर मौजूद कितने हैं, यह एक बड़ा सवाल है। अकेले बुंदेलखंड में वर्षा जल संचयन पर करोड़ों रुपये खर्च करने के बाद भी बारिश का 80 फीसदी पानी बेकार चला जाता है। दुर्भाग्यवश सूखा और बाढ़ हमारी कार्यपालिका में कमाई के पर्व का प्रतीक बन चुके हैं। ऐसी सोच में व्यापक बदलाव लाना होगा। जल संकट वाले इलाकों में किसानों को कम पानी की खपत वाली फसलें बोने के लिए आर्थिक प्रोत्साहन दिया जाए। साथ ही वर्षा जल के बेहतर संचयन पर व्यक्तिगत स्तर पर भी पहल हो। अगली पीढ़ी के प्रति हमें जवाबदेह बनना ही होगा।