फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   Prakash Jha Is The Real Hero Of Jai Gangajal

जब नायक से बड़ा बन जाता है सपोर्टिंग एक्टर

Sat, 12 Mar 2016 12:43 AM IST
दिनेश श्रीनेत/अमर उजाला, नई दिल्ली
दिनेश श्रीनेत/अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Sat, 12 Mar 2016 12:43 AM IST
विज्ञापन
Prakash Jha Is The Real Hero Of Jai Gangajal
इंडियन बाइस्कोप
जब आप 'जय गंगाजल' देखकर निकलते हैं तो देर तक आपके जेहन में डीसीपी बीएन सिंह घूमता रहेगा। प्रकाश झा पहली बार स्क्रीन पर आए हैं और अन्य निर्देशकों के मुकाबले उन्होंने अपने लिए एक लंबा रोल चुना है और उसे बेहद सधे तरीके से निभाया भी है। 
विज्ञापन


कहानी जैसे-जैसे आगे बढ़ती है आभा माथुर (प्रियंका चोपड़ा) का किरदार इकहरा होता जाता है और प्रकाश झा ज्यादा मजबूती से उभरते हैं। यह पहली बार नहीं हुआ है। ऐसी बहुत सी फिल्में हैं जिनमें सपोर्टिंग एक्टर मुख्य किरदार पर भारी पड़ जाता है। नमक हराम में अमिताभ बच्चन का नाम अक्सर लिया जाता है। इसके अलावा 'सत्या' के मनोज बाजपेई, 'नाम' के संजय दत्त और 'दीवाना' में शाहरुख खान का नाम तुरंत याद आ जाता है। 
विज्ञापन


मगर 'जय गंगाजल' में अंत तक पहुंचते-पहुंचते लगता है कि यदि प्रकाश झा थोड़ी और हिम्मत जुटाते और इस फिल्म में आभा माथुर की कहानी कहने की बजाय बीएन सिंह की कहानी कहते तो शायद वे ज्यादा अहम फिल्म बना पाते। यह एक भ्रष्ट पुलिस अधिकारी के सामाजिक और मानवीय तौर पर जागरुक होने और भ्रष्ट सिस्टम के खिलाफ खड़े होने की कहानी है। 
विज्ञापन
विज्ञापन


एक संवेदनशील निर्देशक के लिए न सिर्फ इस कहानी में बल्कि इस किरदार में बहुत संभावनाएं हैं। प्रकाश झा इन संभावनाओं का दुहरे स्तर पर निर्वाह करते हैं- बतौर निर्देशक और साथ ही साथ बतौर अभिनेता। दिलचस्प यह है कि इस किरदार को बेहतर बनाने में उनके निर्देशक से ज्यादा उनके अभिनेता का योगदान है, जो पहली बार सामने आया है।

उन्होंने इस चरित्र को बहुत कम संवाद दिए हैं और उसकी कमी अपनी आंखों व चेहरे के भाव और शारीरिक भाव-भंगिमाओं से पूरी करते हैं। वे एक घाघ किस्म के पुलिस अधिकारी के रूप में सामने आते हैं, जो सिस्टम में मौजूद हर गड़बड़ी को पहचानता है। शुरु के कुछ दृश्यों में उनका संवाद "आपको किसी ने गलत मिसगाइड किया है..." ध्यान खींचता है। 

कहानी हमारी ईमानदार आइपीएस प्रियंका चोपड़ा को दोहरे संघर्ष में ले जाती है। पहला संघर्ष भ्रष्ट राजनेता बब्लू पांडे से है और दूसरा संघर्ष बीएन सिंह जैसे लोगों लोगों से है, जिनके हाथ में पूरा तंत्र है और जो जानते हैं कि कोई लाख सिर पटक ले उनकी मर्जी के बिना कुछ नहीं कर सकता। प्रियंका इस फिल्म में इस तरह से ईमानदार हैं जैसे मिनरल वाटर 100 प्रतिशत स्वच्छ होता है। उनके किसी निजी जीवन, उलझन, काम्प्लेक्स, कुंठा की झलक भी नहीं मिलती। 


जबकि बीएन सिंह का स्याह चरित्र धीरे-धीरे बदलता है। प्रकाश झा की अदायगी में एक किस्म का ठहराव है। उन्होंने इतनी लाउड फिल्म में चरित्र को अंडरप्ले किया है और इसके बाद भी उसे गुम नहीं होने दिया। शायद प्रकाश झा के ये 'शेड्स ऑफ ग्रे' न देखने को मिलते तो फिल्म बहुत ही सपाट और उबाऊ हो जाती। इस फिल्म की मजबूरी थी कि वह प्रकाश झा को नायक नहीं बना सकती थी। लिहाजा कहानी लौटकर उसी पुराने ट्रैक पर पहुंच जाती है। 
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed