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आर्थिक दिशा बदलने की बात भूले प्रधानमंत्री

Sun, 29 May 2016 06:45 PM IST
तवलीन सिंह
तवलीन सिंह Updated Sun, 29 May 2016 06:45 PM IST
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PM forget to change diection of economy
तवलीन सिंह

राजनीतिक पंडितों को वे चीजें नहीं दिखतीं, दूर से औरों को राजनीतिक और आर्थिक परिवर्तन के तौर पर दिखती हैं। सो मोदी सरकार के दो वर्ष पूरे होने पर कई महान पंडितों ने अपने विचार टीवी और अखबारों में व्यक्त किए। सहमति इस बात पर बनी कि प्रधानमंत्री ने अपने चुनावी वायदे पूरे नहीं किए हैं, अभी अच्छे दिन क्षितिज पर भी नहीं दिख रहे हैं।

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नरेंद्र मोदी की आर्थिक और राजनीतिक विफलताएं गिनवाने बैठे, तो रोजगार के अवसरों के अभाव का जिक्र आया और राजनीतिक विफलताओं में पंडितों ने गंभीर अंदाज में कहा कि बेशक मोदी के अपने मंत्रिमंडल में भ्रष्टाचार कम हुआ है, पर जब दृष्टि नीचे जाती है, तो वही भ्रष्ट अधिकारी और उनकी भ्रष्ट आदतें दिखती हैं। यह भी कहा गया कि जिन राज्यों में भाजपा की सरकारें हैं, वहां वैसा परिवर्तन अभी तक नहीं दिखा है, जिसकी उम्मीद मोदी के आने से थी। मैंने खुद ध्यान दिलाया कि भाजपा के मुख्यमंत्रियों ने अभी तक देश के लोगों को यह नहीं दिखाया है कि उनके आने के बाद प्रशासन में वह संवेदनशीलता होगी, जो कांग्रेस के जमाने में नहीं थी।
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इन चीजों के बारे में सोच ही रही थी कि टीवी पर सदगुरु जग्गी वासुदेव का इंटरव्यू देखा बरखा दत्त के साथ। बरखा ने उनसे कई कठिन सवाल पूछे भारतीय संस्कृति, हिंदुत्व, बाबा रामदेव के उद्योगपति बन जाने के बारे में और यह भी पूछा कि क्या देश में पूंजीवाद बढ़ रहा है। इस सवाल का जवाब देते हुए सदगुरु ने कहा कि अगर ऐसा हो भी रहा है, तो हर्ज क्या है! याद दिलाया कि हमने 1947 के बाद जो समाजवादी आर्थिक नीतियां अपनाईं, उनके कारण देश के ज्यादातर लोग गरीबी में जकड़े हैं। सदगुरु के शब्दों में, ‘मैं रहता हूं देहातों में और वहां का हाल यह है कि अधिकतर बच्चे सुबह स्कूल जाते हैं, उस पोषण के बिना जिसकी उन्हें सख्त जरूरत है पढ़ाई करने के लिए। गर्भवती महिलाओं के पास वह क्षमता नहीं है उन चीजों को खाने की, जिनसे गर्भ में पलता बच्चा स्वस्थ पैदा हो। यह हाल है अपने देश का दशकों के समाजवाद के बाद, सो अगर हम आर्थिक दिशा बदलने का प्रयास कर रहे हैं, तो बहुत अच्छी बात है।’
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सदगुरु ने वही बातें कही हैं, जो हम राजनीतिक पंडितों को कहनी चाहिए थी। कही होती, तो शायद प्रधानमंत्री उस मानसिकता को बदलने की कोशिश करते, जिसमें परिवर्तन आए बगैर देश में परिवर्तन नहीं आएगा। जब नरसिंहा राव ने लाइसेंस राज समाप्त किया भी, तो चुपके से, जैसे कि कोई अपराध किया हो। नतीजा यह हुआ कि लोगों को लगा कि आर्थिक सुधारों का लाभ सिर्फ उद्योगपतियों को हुआ है।


ऐसा लगता है कि मोदी भी यही गलती अब तक करते आए हैं । चुनाव अभियान के दौरान उन्होंने कई बार कहा कि देश की आर्थिक दिशा बदलने की जरूरत है, लेकिन प्रधानमंत्री बन जाने के बाद उनकी भाषा बिल्कुल बदल गई। वह भी गरीबी हटाने की बातें करते हैं, जो हम इंदिरा गांधी के जमाने से सुनते आ रहे हैं। प्रधानमंत्री जानते हैं कि गलत आर्थिक दिशा के कारण गरीबी दूर नहीं हुई और इसके लिए मानसिकता बदलने की जरूरत है। वह ऐसा कर सकते हैं, लेकिन क्यों नहीं कर रहे, यह कोई नहीं जानता। अफवाह है कि लुटियन के अधिकारियों ने उन्हें रास्ते से भटका दिया है। अगर ऐसा है, तो उन्हें शीघ्र उस रास्ते पर लौट जाना चाहिए, जिसका सपना उन्होंने 2014 के चुनाव अभियान में दिखाया था, वरना परिवर्तन का वह सपना टूट जाएगा अगले वर्ष तक।

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