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सूरत-ए-हाल : संकट में यूनुस सरकार, नोबेल विजेता के नेतृत्व से निराश हैं बांग्लादेश के सेना प्रमुख
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बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के मुख्य सलाहकार मोहम्मद यूनुस
- फोटो :
एएनआई
विस्तार
बांग्लादेश के सेना प्रमुख जनरल वकार-उज-जमां ने हाल ही में एक प्रमुख संपादक से कहा कि वह देश में तेजी से बिगड़ती कानून व्यवस्था की स्थिति को नियंत्रित करने में नोबेल पुरस्कार विजेता मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार की ‘विफलता’ से निराश हैं। उन्होंने कथित तौर पर इस बात पर ‘गंभीर संदेह’ जताया कि क्या यूनुस प्रशासन वास्तव में निकट भविष्य में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव करा सकता है।
जनरल वकार एक रूढ़िवादी और सुरक्षित ढंग से चलने वाले सैन्य नेता हैं, जिन्होंने पिछले साल अगस्त में शेख हसीना सरकार के हटने के बाद देश में मार्शल लॉ लागू करके सीधे नियंत्रण लेने के सैन्य एवं बाहरी, दोनों उकसावे का विरोध किया। उन्होंने अपने कुछ करीबी दोस्तों से जो कहा, उनमें से कुछ ने इस लेखक को बताया कि बांग्लादेश में सैन्य शासन कभी भी लोकप्रिय नहीं रहा है और जियाउर रहमान और एचएम इरशाद जैसे जनरलों को शीघ्र ही जनता की नाराजगी झेलनी पड़ी।
यहां तक कि तत्कालीन सेना प्रमुख मोईन यू अहमद के नेतृत्व में सेना समर्थित कार्यवाहक सरकार (2006-08) भी नए चुनावों की मांग बढ़ने के कारण अलोकप्रिय हो गई। इसलिए यह जानते हुए कि प्रत्यक्ष सैन्य शासन दुनिया भर में तेजी से अलोकप्रिय हो रहा है, वकार ने सेना को सीधे प्रभार संभालने से दूर रखने का फैसला किया। उनके करीबी लोगों से मिली जानकारी के अनुसार, सैन्य प्रमुख जल्द से जल्द चुनाव कराने के इच्छुक हैं और उसके बाद निर्वाचित सरकार को कार्यभार संभालने देना चाहते हैं। अंतरिम सरकार जितनी लंबी चलेगी और कानून-व्यवस्था के साथ-साथ अर्थव्यवस्था को नियंत्रित करने में विफल रहेगी, सेना को ही दोषी ठहराया जाएगा। जब छात्रों और कट्टरपंथियों की उग्र भीड़ ने बांग्लादेश के संस्थापक शेख मुजीबुर रहमान के घर में स्थित संग्रहालय को ध्वस्त किया, तो सैनिकों के मूकदर्शक बने रहने से सेना की छवि खराब ही हुई।
पिछले साल जुलाई-अगस्त में जनरल वकार द्वारा आंदोलनरत छात्रों पर गोली न चलाने और खून-खराबा न करने के फैसले का पूरे मुल्क में स्वागत किया गया था। लेकिन, हर तरफ फैली अराजकता के बीच मूकदर्शक सेना की छवि उन लोगों को रास नहीं आ रही है, जो स्थिरता और सुरक्षा चाहते हैं। कुछ लोग पहले से ही सवाल उठा रहे हैं कि मुल्क में कानून-व्यवस्था बहाल करने में असमर्थ सेना को संयुक्त राष्ट्र शांति स्थापना की जिम्मेदारी कैसे दी जा सकती है। सेना प्रमुख जनरल वकार को यह एहसास होने लगा है कि उन्हें सिर्फ वादे करने के बजाय निर्णायक रूप से काम करना होगा। यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि जनरल वकार ने ही हसीना के नेतृत्व वाली अवामी लीग सरकार के सत्ता से बाहर होने के बाद राजनीतिक दलों, सिविल सोसायटी और छात्र आंदोलनकारियों से विचार-विमर्श के बाद अंतरिम सरकार स्थापित करने की पहल की थी।
सेना प्रमुख ने हसीना के सत्ता से बाहर होने के बाद राष्ट्र के नाम अपने पहले संबोधन में कहा कि वे सामान्य स्थिति बहाल करने की जिम्मेदारी ले रहे हैं और उन्होंने जल्द से जल्द राजनीतिक व्यवस्था बहाल करने का भी वादा किया। हालांकि, सेना प्रमुख ने अब तक यूनुस और उनकी सरकार का दृढ़ता से समर्थन किया है, लेकिन जब उन्हें एहसास हुआ कि नोबेल पुरस्कार विजेता को समय से पहले चुनाव कराने में कोई दिलचस्पी नहीं है और वह पहले सुधारों को आगे बढ़ाना चाहते हैं, तो वह असहज होने लगे। यह बेचैनी तब सामने आई, जब जनरल वकार ने एकतरफा तौर पर कहा कि चुनाव 2025 में ही होंगे, जबकि उस समय यूनुस अमेरिका में थे।
बांग्लादेशी सैन्य सूत्रों का कहना है कि जनरल वकार अपने कमांडरों और खुफिया सेवाओं के प्रमुखों से गंभीर परामर्श कर रहे हैं, ताकि इस दलदल से बाहर निकलने का रास्ता निकाला जा सके। चूंकि यूनुस और छात्र अपनी खुद की पार्टी शुरू करने और रमजान के बाद देश भर में छात्र संघों और स्थानीय निकायों के चुनाव कराने के लिए तैयार हैं, इसलिए सेना यूनुस पर संसदीय चुनावों के लिए एक स्पष्ट रोडमैप की घोषणा करने का दबाव डाल सकती है। यदि यूनुस ऐसा करने से इन्कार करते हैं, तो सेना प्रमुख, सेना से पूर्ण समर्थन का आश्वासन मिलने के बाद या तो राष्ट्रपति शहाबुद्दीन चुप्पू को अपनी आपातकालीन शक्तियों का प्रयोग करने के लिए कह सकते हैं, या सेना को पहले से प्राप्त मैजिस्ट्रेसी शक्तियों का उपयोग करके कानून और व्यवस्था को मजबूती से बहाल कर सकते हैं। वैकल्पिक रूप से, वह राष्ट्रपति पर दबाव डाल सकते हैं कि वह अंतरिम सरकार को बर्खास्त कर दें, जिसका कोई सांविधानिक आधार नहीं है और उसकी जगह एक कार्यवाहक सरकार गठित करें। हाल ही में एक अदालती आदेश ने कार्यवाहक प्रशासन के प्रावधान को वापस लाया है, जिसे 2009 में सत्ता में आने के बाद हसीना सरकार ने खत्म कर दिया था।
प्रमुख राजनीतिक दलों और प्रमुख नागरिक समाज समूहों के प्रतिनिधित्व वाला एक कार्यवाहक प्रशासन जनरल वकार को शीघ्र चुनाव कराने के लिए रोडमैप प्रदान कर सकता है। कुछ अटकलों में यह संभावना भी जताई गई है कि जनरल वकार शेख हसीना को भारत से वापस लाकर प्रधानमंत्री बना सकते हैं, क्योंकि राष्ट्रपति ने कहा है कि उन्होंने आधिकारिक तौर पर इस्तीफा नहीं दिया है। सोशल मीडिया पर हाल ही में हसीना के बयान के बाद ऐसी अटकलों को और बल मिला है कि ‘अल्लाह ने मुझे इसलिए जिंदा रखा है, ताकि मैं लौटूं और अपने लोगों और पुलिसकर्मियों की हत्या के लिए जिम्मेदार लोगों को सजा दिलाऊं।’ उन्होंने यह बात दिल्ली में निर्वासन में रहते हुए कही है, जिससे अफवाहों को और बल मिला है कि हसीना जल्द ही बांग्लादेश वापस आ जाएंगी। यूनुस सरकार हसीना के प्रत्यर्पण की मांग कर रही है, ताकि उन पर मुकदमा चलाया जा सके। यह संदिग्ध लगता है कि सेना प्रमुख उन्हें वापस लाने का जोखिम उठाएंगे या नहीं, क्योंकि इससे कोई बड़ा नया संकट पैदा हो सकता है। लेकिन ऐसे संकेत मिल रहे हैं कि सेना प्रमुख अराजकता को रोकने और राष्ट्रीय चुनाव की खातिर माहौल बनाने के लिए शीर्ष स्तर पर बदलाव पर विचार कर रहे हैं।