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आपका पैसा और कितने हाथ!

Wed, 05 Dec 2012 11:04 PM IST
कुमार प्रशांत
कुमार प्रशांत Updated Wed, 05 Dec 2012 11:04 PM IST
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your money and how many hands

पता नहीं, यह क्या रहस्य है कि कांग्रेस अपनी मुसीबतें खुद ही खड़ी करती चलती है। जिस काम को ऐसे भी किया जा सकता है कि कम से कम विरोध हो, वह उसी काम को ऐसे करती है कि एक झूठा विरोध सारे देश में फैल जाता है। ताजा फैसला नकद सबसिडी का है। इसे ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश ने नाम दिया है, जिसका पैसा उसके हाथ। यह अभी किया जाना क्या इसलिए जरूरी था कि इससे चुनावी लाभ मिलेगा? क्या लाभ मिलेगा, यह बाद की बात है, लेकिन गुजरात विधानसभा चुनाव से ठीक पहले इसकी घोषणा से जो विवाद पैदा हुआ है, वह तो हम देख रहे हैं। चुनाव आयोग ने भी इस पर ऐतराज जताया है, और अगर किसी रास्ते अदालत भी इसमें आ पहुंचे, तो हैरानी नहीं होनी चाहिए।

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2014 का चुनाव अब बहुत दूर नहीं है और मनमोहन सिंह सरकार के तरकश के कोई भी तीर काम नहीं आ रहे हैं। इसकी घबराहट कांग्रेस में ऊपर से नीचे तक फैली हुई है और कार्यकर्ताओं की तरफ जड़विहीन नेताओं का खासा दबाव है। वे पूछ रहे हैं कि ऐसे खाली तरकश के साथ चुनावी मैदान में कैसे उतर सकते हैं। खासकर तब, जब उन्हें पता है कि तरकश में तीर भले कोई भी न हो, लेकिन घोटालों का जंगल बहुत घना है। इसलिए किसी जादुई मंत्र की तलाश है।
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मनमोहन सरकार को पता है कि 2014 के चुनाव में क्या होगा; इसका दारोमदार 2012 और 2013 के विधानसभा चुनावों के नतीजों पर है। वैसे इस साल अब तक हुए विधानसभा चुनावों में ज्यादातर जगहों पर कांग्रेस की पराजय हुई है। यह अलग बात है कि अभी हिमाचल प्रदेश और गुजरात के नतीजे आने बाकी हैं। फिर अगले साल कर्नाटक, मध्य प्रदेश, राजस्थान, नई दिल्ली और त्रिपुरा में विधानसभा चुनाव होंगे, जिनके नतीजों की आंच लोकसभा तक पहुंचने वाली है। इसलिए मनमोहन सरकार को सारा गणित कुछ इस तरह बिठाना है कि 2014 की लड़ाई आसान हो सके।
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इस आसान लड़ाई का आयोजन बहुत कठिन है, इसलिए उसे तात्कालिक मंत्र की खोज है। कोशिश हो रही है कि आपका पैसा, आपके हाथ को इस मंत्र में तबदील किया जाए। सरकार इस योजना को देश के 51 जिलों में लागू करने जा रही थी। लेकिन चुनाव आयोग के निर्देश के बाद उनमें से गुजरात के चार और हिमाचल के दो जिलों में फिलहाल यह लागू नहीं होगा। केंद्र सरकार अगर यह सोच रही है कि इस योजना की घोषणा से जो हवा बनेगी, वह गुजरात में चुनावी फसल काटने में मददगार साबित होगी, तो यह उसके खयाली पुलाव ही हैं। अभी तो इस योजना के कील-कांटे भी तैयार नहीं हुए हैं। कई सारे पेच हैं, जिन्हें प्रशासकीय स्तर पर दुरुस्त किया जाना बाकी है। इसलिए यह चुनावी मंत्र कम से कम गुजरात चुनाव में असर डाल सकेगा, ऐसी संभावना नजर नहीं आती।

हां, 2013 के विधानसभा चुनाव जरूर आम चुनाव का बुखार नापेंगे। तब तक नकद सबसिडी की यह योजना कहां तक पहुंचेगी, यह देखने वाली बात होगी। वैसे तब तक इसे कम से कम आधे देश को अपने दायरे में समेट लेना चाहिए। लेकिन राह में अनेक बाधाएं हैं। जैसे, अभी तक आधार कार्ड बने ही कितने हैं, और जो बने हैं, उनमें से कितने पूर्ण हैं या फिर सरकारी अधिकारियों द्वारा मान्य हैं? अब तक अनुमान के मुताबिक देश में तकरीबन 25 करोड़ लोगों के आधार कार्ड बन चुके हैं।

वैसे पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त टी. एन. शेषन के समय मतदाता पहचान पत्र बनवाने में जितनी गंभीरता दिखाई गई थी, वैसी गंभीरता आधार कार्ड बनवाने के मामले में नहीं दिखती। इसके अलावा हर गांव, हर नगर में प्रत्येक व्यक्ति का खाता खुलवाने के लिए एक व्यापक अभियान की जरूरत होगी। इस अभियान को लागू करने के लिए फौज कहां से आएगी? जयराम रमेश ग्रामीण योजनाओं से जुड़े आंगनबाड़ी जैसे कार्यकर्ताओं को इसमें लगाने की बात करते हैं। क्या यह काफी होगा? शायद सबसे अच्छा और परिणामकारी कदम यह होगा कि सारे स्कूल-कॉलेज तीन महीने के लिए बंद कर दिए जाएं और शिक्षकों व ऊंची कक्षाओं में पढ़ने वाले विद्यार्थियों को आधार कार्ड तैयार करवाने और बैंक के खाते खुलवाने की जिम्मेदारी सौंप दी जाए।

क्या सरकार ऐसी हिम्मत जुटा सकेगी? और फिर यह भी देखना होगा कि आधार कार्ड के आधार पर आखिर क्या-क्या काम होंगे। अगर इसे विभिन्न पेंशन और छात्रवृत्ति योजनाओं तक ही सीमित रखना है, तो इतनी बड़ी मुहिम का क्या मतलब है? हां, अगर इसे अनाज के समर्थन मूल्य, जनवितरण प्रणाली से मिलने वाले राशन, ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं, बाल पोषण योजनाओं, मनरेगा की मजदूरी के भुगतान, सभी तरह के सरकारी दस्तावेजों, पासपोर्ट वगैरह से जोड़ा जाता है, तभी इसकी पूरी संभावना जाहिर हो सकेगी।

अगर, बांग्लादेश, म्यांमार, पाकिस्तान जैसे देशों से अवैध रूप से आने वाले लोगों को आधार कार्ड के जरिये रोका जा सका, तो इसकी ताकत बढ़ जाएगी। अगर ऐसा हो कि आधार कार्ड का नाता भूख, प्यास और आवास से जुड़ जाए, तो यह वह मंत्र बन सकता है, जिसकी कांग्रेस को तलाश है। लेकिन कांग्रेस ही नहीं, सत्ता पर काबिज होने की जुगत लगाने वाले हर दल को समझ लेना चाहिए कि सरकारी पैसे के रास्ते में सबसे बड़ी बाधा आपका राजनीतिक तंत्र ही है, जो हर मंच पर वेश बदलकर हाजिर हो जाता है।


वह राजीव गांधी के शब्दों में सत्ता की दलाली भी करता है। एनजीओ भी चलाता है। ठेकेदार भी है। जन वितरण प्रणाली के अधिकांश सूत्र उसके हाथों में है। वह मंच पर भी है और नेपथ्य में भी। आपका पैसा आपके हाथ के नारे के बीच में दूसरे कई हाथ हैं, जिन्हें रोकने, बांधने और अंतिम स्थिति में काटने की जरूरत पड़ेगी। इसके बिना यह मंत्र न तो बनता है और न ही साकार होता है।

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