फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   you can not stop voice of cag

कैग की आवाज आप दबा नहीं सकते

Fri, 30 Nov 2012 09:55 PM IST
Updated Fri, 30 Nov 2012 09:55 PM IST
विज्ञापन
you can not stop voice of cag

2जी पर कैग के नुकसान के आकलन को लेकर सरकार की ओर से लगातार सवाल खड़े किए जा रहे हैं। इन सवालों के बीच कैग को बहुसदस्यीय बनाने की बहस भी शुरू हो गई है। इस मसले पर देश के पूर्व नियंत्रक और महालेखा परीक्षक वी एन कौल से धीरज कनोजिया ने बातचीत की-

विज्ञापन

 
2 जी स्पेक्ट्रम घोटाले पर कैग के नुकसान के आकलन को लेकर सवाल खड़े हो रहे है। आपका क्या कहना है?
यह गलत परंपरा है। कैग एक सांविधानिक संस्था है। अपनी पारदर्शिता के कारण शुरू से ही कैग ने अपनी प्रतिष्ठा बना रखी है। केंद्र के मामले हों या राज्य के, कैग की समीक्षा हमेशा ही काफी अहम स्थान रखती है। उसकी साख पर सवाल खड़े करना गलत चलन है। इससे आगे चलकर सांविधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता को नुकसान पहुंचेगा। सरकार का रवैया इस सिलसिले में ठीक नहीं है। इससे बचा जाना चाहिए था। सांविधानिक संस्थाओं को राजनीति से भी दूर रखना चाहिए। यही देश के लिए हितकारी होगा। अगर इस तरह की परंपरा को बढ़ाया जाएगा, तो आरोप-प्रत्यारोप का दौर थमने वाला नहीं है।
विज्ञापन

 
इन सवालों के बीच शुंगलू कमेटी की सिफारिशों के आधार पर कैग को बहुसदस्यीय बनाने के सरकार के प्रस्ताव को आप किस तरह देखते हैं?
कैग को बहुसदस्यीय बनाना एक तरह से इस स्वतंत्र संस्था को तोड़ने जैसा होगा। पहले भी ऐसे सुझाव सामने आए थे, मगर उन्हें सिरे से खारिज कर दिया गया। राजग सरकार के समय आबिद हुसैन कमेटी ने कैग में कॉलेजियम प्रणाली पर विचार किया था। उस समय सरकार में शीर्ष स्तर पर चर्चा हुई और बाद में सर्वसम्मति से कॉलेजियम सिस्टम को ठीक नहीं माना गया और वह सुझाव वहीं खारिज हो गया। कैग स्वतंत्र तौर पर सलाह देने वाली एक पूर्ण संस्था है। इस सांविधानिक संस्था के ढांचे के साथ छेड़छाड़ गलत होगा।
विज्ञापन
विज्ञापन


लेकिन कैग की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठ रहे है। उस पर राजनीतिक आरोप भी लगे है। मसलन, उसे एक राजनीतिक दल विशेष से जुड़ा भी बताया जा रहा है।
भारतीय संविधान के मुताबिक कैग का कर्तव्य प्रशासनिक कामों में खामियां उजागर करने का है। यह बात ठीक है कि उसका काम नीति बनाना नहीं है। मगर यह बात भी सर्वविदित है कि उसके काम की प्रशंसा और निंदा, दोनों स्वाभाविक है। पर इसका मतलब यह नहीं कि उस पर राजनीतिक आरोप लगाया जाए। इससे एक गलत चलन शुरू हो जाएगा। पहले 2 जी स्पेक्ट्रम और अब कोयला घोटाले पर कैग की रिपोर्ट के बाद सरकार ने जान-बूझकर यह मुद्दा उछाला है कि कैग को बहुसदस्यीय बनाना चाहिए। यह बेहद दिलचस्प है। मुझे समझ नहीं आ रहा कि सरकार ऐसी बात क्यों कर रही है। इस तरह का मुद्दा उछालकर एक निहायत ही गैरजरूरी विवाद खड़ा किया जा रहा है।


कहा जा रहा है कि पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त टी एन शेषन के समय चुनाव आयोग ने जिस तरह सरकार की नाक में दम कर रखा था, वैसा ही काम अब कैग कर रहा है।
यह विचित्र है कि सरकार को अगर कुछ असुविधाजनक लगता है, तो वह उसकी आलोचना पर उतर आती है। आप कैग की आवाज को नहीं दबा सकते। दुनिया भर में कैग जैसी ऑडिटर संस्थाएं हैं। लेकिन वहां उनकी स्वतंत्रता को बरकरार रखने की कोशिश की जाती है। फ्रांस, जर्मनी और कोरिया की ऑडिटर संस्थाओं की तरह भारत के कैग की अंतरराष्ट्रीय ख्याति है। भ्रष्टाचार के मामलों को इसने प्रभावी तरीके से उजागर किया है। यह देखने को मिल रहा है कि गठबंधन की सरकारों में भ्रष्टाचार के मामले ज्यादा हैं। 2जी स्पेक्ट्रम घोटाला इसका सबसे बड़ा उदाहरण है।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed