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जब पारस के लिए मचल उठा मन

Tue, 08 Oct 2013 06:44 PM IST
शिवकुमार गोयल
शिवकुमार गोयल Updated Tue, 08 Oct 2013 06:44 PM IST
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yearned for paras stone

महर्षि परुच्छेप सरस्वती के वरद पुत्र थे। वह अपने शिष्यों को धर्मानुसार जीवन बिताने की प्रेरणा दिया करते थे। सुपर्ण भी महर्षि के मेधावी शिष्यों में था। उसने काम, क्रोध, मोह और अहंकार को फटकने नहीं दिया था।

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एक दिन उसने देखा कि गुरुदेव ने एक याचक पर दया कर उसके लोहे के भिक्षापात्र को पाषाण खंड का स्पर्श कराकर स्वर्ण में बदल डाला। सोने के भिक्षापात्र ने सुपर्ण के मन में हलचल मचा दी। उसने कहा, गुरुदेव, यदि आप मेरे लिए लौहखंडों को स्वर्ण बनाने की कृपा करें, तो मैं कुछ समय तक ऐश्वर्यपूर्ण जीवन का आनंद ले सकता हूं।
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महर्षि ने शिष्य का आग्रह देखा, तो उसे संसार की वास्तविकता दिखाने देशाटन पर निकल गए। सुपर्ण ने देखा कि लोग धन-संपत्ति के लिए पागल बने हुए हैं। धन के लोभ में मानव घृणित से घृणित दुष्कर्म करने को तैयार है। वापस आश्रम लौटकर महर्षि ने सुपर्ण से पूछा, संसार तुम्हें कैसा लगा?
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उसने कहा, गुरुदेव, बड़े-बड़े विद्वान तक धन-संपत्ति के लिए पतनोन्मुख होने को तत्पर दिखाई दिए। सद्गृहस्थ माने जाने वाले लोग भी पारस पत्थर के बदले पतिव्रता पत्नी को सौंपने को तैयार थे। उन जैसा पतित कहां मिलेगा?


महर्षि ने कहा, सुपर्ण, तुम अपने को क्या पतित नहीं मानते हो, जो वर्षों की साधना-तपस्या से प्राप्त महादीक्षा का तिरस्कार कर क्षुद्र पारस के लिए मचल उठे? महर्षि के शब्द सुनकर सुपर्ण पश्चाताप के आंसू रो पड़ा।

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