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चुनावी चुनौतियों का साल

Sun, 01 Jan 2017 07:24 PM IST
तवलीन सिंह
तवलीन सिंह Updated Sun, 01 Jan 2017 07:24 PM IST
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Year of election challenges
तवलीन स‌िंह

राजनीति की बातें करने से पहले नववर्ष की शुभकामनाएं। मैं दिल से यह दुआ करती हूं कि 2016 के आखिरी महीनों में हम सब को जो परेशानियां झेलनी पड़ीं, वे नए साल की शुरुआत होते ही कम हो जाएं। प्रधानमंत्री बहुत बार कह चुके हैं कि नोटबंदी से सिर्फ अमीरों को परेशानी हुई है, हम जैसे लोगों को नहीं। पर सैकड़ों आम लोगों से बातें करने के बाद मैं यकीन के साथ कह सकती हूं कि परेशानी सबको हुई है। फिर भी लोग नोटबंदी का समर्थन कर रहे हैं। प्रधानमंत्री को देहातों के उन किसानों से भी समर्थन मिल रहा है, जिन्हें नोटबंदी से खासी तकलीफ हुई है, क्योंकि देश के अधिकतर ग्रामीण क्षेत्र ऐसे हैं, जहां बैंकों तक पहुंचने के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ती है।

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इस समर्थन का रहस्य क्या है? विपक्ष के तमाम बड़े नेताओं के उकसाने पर भी देश का आम आदमी सड़कों पर उतरता क्यों नहीं दिखा? विपक्ष के नेता अगर इन सवालों के जवाब ढूंढने की कोशिश करते, तो शायद संसद के अंदर और बाहर हल्ला मचाना कम करते। आम जनता नोटबंदी का स्वागत इसलिए कर रही है, क्योंकि देश भर में यह आशा जग गई है कि अब भ्रष्टाचार जरूर कम हो जाएगा। जिनको राजनीति की समझ नहीं है, वे भी जानते हैं कि भ्रष्टाचार देश की राजनीतिक प्रणाली को, लोकतंत्र की हर संस्था को दीमक की तरह खोखला कर चुका है। उनको विश्वास है कि प्रधानमंत्री ने इतना बड़ा कदम सिर्फ इसलिए उठाया है, क्योंकि वह भ्रष्टाचार से लड़ना चाहते हैं।
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ऐसा कहने के बाद भी मैं प्रधानमंत्री को सावधान करना चाहती हूं कि जनता को समझना मुश्किल है और उसका मिजाज बदलने में अक्सर थोड़ा वक्त लगता है। सो इस वर्ष अगर भ्रष्टाचार कम होते नहीं दिखा, तो निराशा फैलने में देर नहीं लगेगी। अपने कार्यकाल में मोदी ने मंत्रिमंडल और आला अधिकारियों पर ऐसी नकेल कसी है कि दिल्ली के सत्ता गलियारों में घोटाला शब्द गायब रहा है। 'न खाऊंगा, न खाने दूंगा' का जो वायदा उन्होंने किया था, उसे उन्होंने बखूबी निभाया है। इसलिए पिछले दिनों विपक्ष ने जो कीचड़ उन पर उछाला, वह चिपका नहीं। लेकिन आम आदमी के जीवन में जो भ्रष्टाचार है, उसमें कमी नहीं आई है। नोटबंदी के बाद आम लोगों ने यह भी देखा है किस तरह बैंक के सामने घंटों लाइन में लगने के बाद सीमित पैसे ही मिलते हैं, दूसरी ओर, हर दूसरे-तीसरे दिन भ्रष्ट लोगों के पास लाखों रुपये नए नोटों में मिल रहे हैं। यह सिलसिला जारी रहा, तो सरकार के प्रति भरोसा गायब होने में देर नहीं लगेगी।
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वैसे भी प्रधानमंत्री के लिए यह साल उनके कार्यकाल का सबसे महत्वपूर्ण वर्ष है। केवल इसलिए नहीं कि अगले कुछ महीनों में उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड और गोवा के लोग वोट डालकर नोटबंदी पर फैसला सुनानेवाले हैं, बल्कि इसलिए भी कि इस साल मोदी को साबित करना होगा कि वह वास्तव में परिवर्तन और विकास ला सकते हैं या नहीं।

नोटबंदी के बाद वैसे भी कई विपक्षी नेता प्रधानमंत्री बनने की दौड़ में लग गए हैं। पश्चिम बंगाल में सांप्रदायिक हिंसा की घटना हुई है, पर इसकी अनदेखी कर मुख्यमंत्री हर दूसरे दिन दिल्ली में दिखती हैं।


प्रधानमंत्री के लिए देशवासियों को आश्वस्त करना सबसे बड़ी चुनौती होगा। नोटबंदी के कारण हुई परेशानियां भी जनता बर्दाश्त कर लेगी, अगर उसे लगे कि इसके बाद मोदी परिवर्तन और विकास का अपना वायदा पूरा कर सकते हैं। वर्ष 2017 प्रधानमंत्री मोदी के राजनीतिक जीवन का सबसे कठिन वर्ष साबित हो सकता है।

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