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इन दिनों

Sat, 08 Jun 2013 10:17 PM IST
यश मालवीय
यश मालवीय Updated Sat, 08 Jun 2013 10:17 PM IST
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yash malviya poem

बड़े मजे की बातें

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हो जाती हैं इन दिनों
जैसे पीक आवर में चले पर
लोकल में बैठने की जगह मिल गई
दूध फ्रिज में रखना भूल गए
पर बिल्ली ने पिया नहीं
दूर-दूर तक बादल नहीं थे
पर होने लगी घ्ानघोर बारिश
कलकत्ता मेल में अगले ही दिन
कन्फर्म बर्थ मिल गई
बैंक गए और
दो मिनट में ही सारा काम हो गया,
कंप्यूटर हैंग नहीं हुआ
एटीएम में भी एक बार में ही
नल के पानी की तरह पैसा निकला
पुरवाई चली और
जोड़ों में दर्द नहीं उठा
जो भी अमरूद खाने चले
वह भीतर से ही गुलाबी निकला
मनपसंद सीडी सुनते हुए
बिजली नहीं कटी
सड़क पर जाम नहीं लगा
और वक्त से ऑफिस पहुंच गए
दाल में कंकड़ नहीं आया
गमले भर खेती में भी मिला
पूरे गुलशन का लुत्फ
कठिन आलोचक को एक ही बार में पसंद आ गई कोई सरल कविता
नहीं मिला मेरे परम प्रिय मित्र के
नए गीत में कोई भी छंद-दोष
उमस और दोपहर में भी
दिन अच्छा कटा
कॉफी हाउस में वेटर ने
जरा भी देर नहीं लगाई,
डोसे के साथ सांभर और चटनी
लजीज मिले
और सबसे मजे की बात तो यह हुई
कि मेरे रकीब ने खुद फोन लगाकर
फ्लोरेंस नाइटिंगेल से मेरी बात कराई
इससे ज्यादा मजे में चार चांद लगाने वाली और क्या बात हो सकती थी,
सचमुच बड़े मजे की बातें
हो जाती हैं इन दिनों
बेमौसम ही कोई कली चटख जाती है और खुशबू में नहा उठता है
मन का आंगन।

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