हमारी कामयाबी पर दुनिया का अचंभा
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भारत ने जब देश में ही निर्मित रॉकेट के जरिये एक ही बार में सौ उपग्रहों को अंतरिक्ष में स्थापित किया, तो यह दुनिया के लिए बहुत बड़ा अचंभा था। ऐसी उपलब्धि अब तक अमेरिका भी हासिल नहीं कर सका है। पर यह कारनामा भारत जैसे देश ने कर दिखाया था। गरीबी, बेकारी, अशिक्षा, भ्रष्टाचार, सामाजिक विसंगतियों, क्षेत्रीय तनावों, आंतरिक मतभेदों और भौगोलिक दुर्गमताओं से घिरे इस देश ने विज्ञान और टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में बड़ी तरक्की कर ली है। दुनिया के लिए भारत की तकनीकी तरक्की एक स्वाभाविक अचंभा है। इसीलिए जब हम परमाणु शक्ति का परीक्षण करते हैं या फिर चंद्रमा व मंगल पर अपने यान भेज देते हैं, तो आलोचना के स्वर ज्यादा मुखर हो जाते हैं।
यही आलोचना और अचंभा भारत की कामयाबी का सबूत है। भारत के साथ आजाद हुए दूसरे देशों की अवस्था देखिए। हमसे बहुत कम आबादी और हमसे बहुत कम समस्याओं का बोझ लेकर भी वे तरक्की की दौड़ में पिछड़ से गए। पर सत्तर साल की इस अवधि में भारत औद्योगिकीकरण, टेक्नोलॉजी, विज्ञान और इनसे जुड़े क्षेत्रों, जैसे शिक्षा व शोध में ठीकठाक फासला तय करने में कामयाब रहा। हालांकि ज्यादातर मामलों में हम अमेरिका, रूस, यूरोप, जापान और चीन से पीछे हैं, पर न तो उनका इतिहास भारत के जैसा रहा है, न उनकी चुनौतियां भारत की चुनौतियों जैसी।
कुछ समय पहले अमेरिका से आए एक तकनीकी विशेषज्ञ ने टिप्पणी की कि वहां के ऐश्वर्य और दबदबे की स्थिति तक पहुंचने में भारत को लंबा समय लगेगा। मैंने जवाब दिया कि अगर ऐसा है, तो भारत का प्रदर्शन काबिल-ए-तारीफ कहा जाएगा। अमेरिका को आजाद हुए करीब ढाई सौ साल हो चुके हैं। अगर उसे मौजूदा स्थिति तक पहुंचने में इतना वक्त लगा और उससे चार गुना आबादी, गरीबी और पिछड़ेपन के बावजूद हम सौ-सवा सौ साल में उसकी बराबरी पर आ जाएं, तो क्या बात है!
हालांकि हमारी सीमाएं भी रही हैं। शायद हमारी महत्वाकांक्षाओं के मुकाबले हमारी प्रगति कुछ कम रही हो, पर 1947 में 12 फीसदी साक्षरता के स्तर वाला देश अगर सत्तर साल में 74 फीसदी साक्षरता के स्तर तक पहुंचकर परमाणु शक्ति, वैश्विक आईटी शक्ति, अंतरिक्ष शक्ति और सैन्य शक्ति में बदल चुका है, तो तरक्की तो हमने की है। आज हम मानव युक्त अंतरिक्ष यान और सौर मंडल से बाहर टोही यान भेजने की सोच रहे हैं। 1962 की लड़ाई में लाचार-सी नजर आने वाली सेना आज ब्रह्मोस, अग्नि, पृथ्वी, नाग, आकाश जैसी अत्याधुनिक मिसाइलों से लैस हो चीन को ललकारने का आत्मविश्वास दे रही है। जब-जब विकसित देशों ने हमें तकनीक देने से इन्कार किया, हमने उसे खुद विकसित किया। परमाणु शक्ति, क्रायोजेनिक इंजन और सुपर कंप्यूटर इसके उदाहरण हैं। संचार उपकरणों का व्यापक प्रसार हुआ है। ई-प्रशासन से लेकर ई-कॉमर्स और आईटी आउटसोर्सिंग से लेकर दूरसंचार तक कामयाबी के अनेक उदाहरण मौजूद हैं। रिलायंस जियो और फ्लिपकार्ट महज कारोबारी सफलताएं नहीं हैं, वे भारत की क्षमताओं और उसमें निहित अवसरों की अभिव्यक्ति भी हैं।
पंडित जवाहर लाल नेहरू ने 1950 के दशक में औद्योगिक क्रांति का सूत्रपात किया, तो उनके तीन दशक बाद राजीव गांधी ने सूचना और संचार क्रांति की परिकल्पना की। राजीव गांधी के तीन दशक बाद अब नरेंद्र मोदी 'डिजिटल रूपांतरण' की क्रांति का संचालन कर भारत के उज्ज्वल भविष्य की नींव डाल सकते हैं।
लेखक सुपरिचित तकनीकविद हैं