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विश्वयुद्ध : महाविनाशक हथियार और आइंस्टीन, जीवन से चहकती-महकती धरती की गौरवगाथा

Sat, 06 Aug 2022 08:17 AM IST
Vir Singh वीर सिंह
Updated Sat, 06 Aug 2022 08:17 AM IST
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सार
हिरोशिमा के लोग तो आज तक मानते हैं कि 'लिटिल बॉय' नाम से जो परमाणु बम हिरोशिमा पर गिराया गया था, उसके लिए आइंस्टीन का फार्मूला ही उत्तरदायी है। पृथ्वी के पारिस्थितिक तंत्र में, जहां जीवन प्रक्रियाएं चलती हैं और जिससे संपूर्ण जैवमंडल का जीवन अक्षुण्ण रहता है, पदार्थ-ऊर्जा संबंध भिन्न प्रकृति का होता है।
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World War: Weapon of Great Destruction and Albert Einstein, saga of life on earth
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay

विस्तार

हिरोशिमा और नागासाकी पर द्वितीय विश्वयुद्ध के वे परमाणु बादल मानव मस्तिष्क पटल पर किसी टैटू की तरह खुद गए हैं। धरती से उठकर आकाश को ढक देने वाले वे 'बादल' मानव इतिहास के कदाचित सबसे भयावह दृश्य थे। दुनिया के राजनीतिक अखाड़ों में जब-जब युद्धों की पृष्ठभूमियां बनती हैं, तब-तब वे बादल मस्तिष्क पटल पर ऐसे उभरते हैं, जैसे कोई दुःस्वप्न साकार होने वाला हो! 



जिंदा धरती को भुतहा ग्रह में बदलने की विनाशलीला रचने की शक्ति रखने वाले छह और नौ अगस्त, 1945 के उन दो दृश्यों के गर्भ में एक फॉर्मूला छिपा था, जिस पर कदाचित ही हमारा ध्यान जाता है। उस समीकरण के जनक हैं बीसवीं शताब्दी के सुप्रसिद्ध भौतिकशास्त्री, नोबेल पुरस्कार विजेता, जन-जन के हृदयस्थल पर राज करने वाले तथा मानव मस्तिष्क में एक कौतूहल-सा पैदा करने वाले अल्बर्ट आइंस्टीन! 


वह समीकरण है : (E=mc2), अर्थात, ऊर्जा = द्रव्यमान x (प्रकाश गति)2। पृथ्वी पर जीवन के लिए अनुकूलन निर्धारित करने वाले कारकों में सबसे प्रमुख है ऊष्मप्रवैगिकी, अर्थात थर्मोडायनामिक्स या उष्मागतिकी। थर्मोडायनामिक्स का पहला नियम कहता है कि ऊर्जा को न तो निर्मित किया जा सकता है और न ही नष्ट; इसे केवल एक रूप से दूसरे रूप में परिवर्तित किया जा सकता है। 

पृथ्वी के पारिस्थितिक तंत्र में सौर ऊर्जा जैव रासायनिक ऊर्जा (प्रकाश संश्लेषण के माध्यम से) में और बाद में ऊष्मा ऊर्जा (श्वसन के माध्यम से) में बदल जाती है। अल्बर्ट आइंस्टीन के विशेष सापेक्षता सिद्धांत का समीकरण इस तथ्य को व्यक्त करता है कि द्रव्यमान और ऊर्जा एक ही भौतिक इकाई हैं और इन्हें एक-दूसरे में बदला जा सकता है। 

बीसवीं शताब्दी का यह सबसे प्रसिद्ध समीकरण (जिसके कारण हिरोशिमा और नागासाकी में महाविनाश हुआ और परमाणु रिएक्टरों का संचालन भी हुआ) सितारों की सतह पर और ब्रह्मांड में कहीं भी परमाणु प्रतिक्रियाओं में पदार्थ-ऊर्जा संबंध को प्रकट करता है। वास्तव में आइंस्टीन के फॉर्मूले ने ही परमाणु बम के निर्माण का सिद्धांत रचा था। 

हिरोशिमा के लोग तो आज तक मानते हैं कि 'लिटिल बॉय' नाम से जो परमाणु बम हिरोशिमा पर गिराया गया था, उसके लिए आइंस्टीन का फार्मूला ही उत्तरदायी है। पृथ्वी के पारिस्थितिक तंत्र में, जहां जीवन प्रक्रियाएं चलती हैं और जिससे संपूर्ण जैवमंडल का जीवन अक्षुण्ण रहता है, पदार्थ-ऊर्जा संबंध भिन्न प्रकृति का होता है। किसी पारिस्थितिक तंत्र की दो बुनियादी और अनूठी विशेषताएं होती हैं : एक-पदार्थ न तो उत्पन्न होता है और न ही नष्ट, और दो-ऊर्जा का संरक्षण होता है। 

ऊर्जा और पदार्थ का यह जीवंत गठजोड़ केवल जैवमंडल में ही संभव है, जिसे आइंस्टीन का यह अमर समीकरण और मानव इतिहास में सबसे अधिक रोमांचित करने वाला फॉर्मूला छू तक न सका। आइंस्टीन का ऊर्जा-पदार्थ समीकरण जहां कहीं भी नाभिकीय क्रियाएं चलती हैं, लागू होता है। प्रकाश पैदा करने वाली ब्रह्मांडीय क्रिया को आइंस्टीन ने ऐसे अभिव्यक्त किया कि वह मानव के हाथों में पड़कर विनाशकारी हो गई। 

हजारों महाविनाशक नाभिकीय हथियारों में भी आइंस्टीन का फॉर्मूला छिपा है। वैसे नाभिकीय ऊर्जा को विद्युत में बदलने वाले रिएक्टर में भी आइंस्टीन का फॉर्मूला छिपा है, पर इसके खतरे भी कम नहीं। किसी पारिस्थितिक प्रणाली में ऊर्जा-पदार्थ संबंध सृजन-विनाश चक्र से अवमुक्त है। अंतरिक्ष से पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश के साथ प्रकाश का व्यवहार बदल जाता है, वह जीवन सृजन की भूमिका में आ जाता है। 

संक्षेप में कहें, तो जीवन लीलाओं में अवैध है मौत का अनुगामी आइंस्टीन का वह फॉर्मूला। पारिस्थितिक तंत्र में ऊर्जा जीवन के संश्लेषण में, जीवन के संरक्षण में, जीवों के शरीर विज्ञान में, जीवन के अस्तित्व संरक्षण में, और एक जलवायु प्रणाली के निर्माण में शामिल होकर अपनी परोपकारिता की कहानी लिखती है। जैवमंडल में चुनिंदा पदार्थों को संश्लेषित कर प्रकाश ऊर्जा जो ऊर्जा-पदार्थ संबंध बुनती है, वही जीवन से चहकती-महकती धरती की गौरवगाथा है।

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