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रंगमंच: विश्व रंगकर्म में नाट्यशास्त्र की जगह, लगता है अब बदलेंगे हालात

Sun, 09 Apr 2023 07:01 AM IST
gautam chatterjee गौतम चटर्जी
Updated Sun, 09 Apr 2023 07:01 AM IST
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सार
नाटक को मंचस्थ करने की मौलिक प्रविधि होने के बावजूद भरत के नाट्यशास्त्र को संस्कृत तक सीमित रखा गया, और हिंदी रंगकर्म में ब्रेख्त आदि की अभिनय पद्धतियों की प्रतिष्ठा की गई। उम्मीद करें कि यह स्थिति बदलेगी।
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world theatre day indian natya shastra hindi theatre artists in india Girish Karnad
गिरीश कर्नाड - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

भरत का नाट्यशास्त्र कलाओं की पृथ्वी का आकर ग्रंथ है। वैदिक युग में किसी भी ऋषि का दिया हुआ उच्चार शाश्वत उच्चार हुआ है। तीन हजार साल पहले जिस भी भारतीय ऋषि ने विद्या वांग्मय में जो भी कहा है, वह कालातीत या सार्वकालिक हुआ है। आखिर यह किस कोटि का उच्चार होता है कि वह अतीत का नहीं रह जाता और हर वर्तमान का प्रासंगिक छंद हो जाता है! ईसा पूर्व पांचवीं शती में भरत मुनि का रचा ग्रंथ नाट्यवेद या पंचमवेद इसी कोटि का वृहद उच्चार है कि वैश्विक कला के किसी भी काल और किसी भी उद्घाटित या नव आविष्कृत कला के मंत्र संकेत इस विशाल कोश में संग्रहीत हैं। इसे सहज ही हम नाट्यशास्त्र कहते हैं।



यदि इसकी आभा वैश्विक है, तो फिर विश्व रंगकर्म में इसकी भूमिका और सक्रियता अनिवार्य होनी चाहिए? आइए, देखते हैं। पिछले दिनों दुनिया भर के रंगकर्मियों ने विश्व रंगमंच दिवस मनाया। यूनेस्को से संबद्ध संस्था इंटरनेशनल  थियेटर इंस्टीट्यूट 1961 से हर साल 27 मार्च को यह वैश्विक उत्सव मनाती आ रही है। विश्व रंगमंच दिवस के जरिये यह संस्था दुनिया भर में हो रही सामाजिक चेतना के विकास की खबर रंगकर्म के जरिये दुनिया भर में पहुंचाती है। इस दिन हर साल किसी एक देश के रंगकर्मी का दुनिया के नाम संदेश भी प्रसारित किया जाता है। इस साल यह संदेश मिस्र की रंगकर्मी समिहा अयूब ने दिया। एक बार भारत को भी यह संदेश देने का अवसर मिला था। वर्ष 2002 में वह संदेश गिरीश कर्नाड ने दिया था। उन्होंने अपने संदेश की शुरुआत नाट्यशास्त्र से की थी।


गिरीश कर्नाड से पहले यह काम पोलिश रंगकर्मी जर्जी ग्रोटोव्स्की ने किया था। वह अपने रंगकर्मी मित्र यूजीनियो बार्बा के साथ बीती सदी के साठ के शुरुआती दशक में भारत आए, नाट्यशास्त्र सीखा, और नाट्यशास्त्रीय रंगकर्म को अपने देश में ले गए। जीवन भर वह उसी के अनुसार रंगकर्म करते रहे। लेकिन हमारे यहां क्या हुआ? संस्कृत में मिले इस विशाल ग्रंथ के बीती सदी के साठ के ही दशक में हिंदी और अंग्रेजी में अनुवाद हुए। कुछ विद्यालयों में इसका अंश पाठ्यक्रम में रखा गया और संस्कृत में लिखे प्राचीन नाटक इसी के अनुसार देश भर में मंचस्थ किए जाने लगे।

इन्हें देखते हुए दो प्रश्न उठे। पहला यह कि यदि नाट्यशास्त्र दुनिया की किसी भी भाषा में लिखे नाटक को मंचस्थ करने की मूल और शास्त्रीय प्रविधि है, तो फिर इसे भारतीय रंगकर्मियों ने सिर्फ संस्कृत भाषा तक सीमित क्यों रखा? दूसरा प्रश्न यह कि पाठ्यक्रम में होने के बावजूद हिंदी रंगकर्म के विद्यालय नाट्यशास्त्रीय अभिनय शैली की जगह स्टैनिस्लाव्स्की, ब्रेख्त, ऑर्तो, मेस्नर आदि की अभिनय पद्धतियों की प्रतिष्ठा करते क्यों चले गए? इसका नतीजा यह हुआ कि हम पिछले साठ वर्षों में रंगकर्म के निर्देशकों को तो जान पाए, लेकिन उनके असंख्य अभिनेता अंधेरे में ही रह गए, जबकि रंगकर्म शुद्धतः अभिनेता का माध्यम है, निर्देशक का नहीं।

दोनों प्रश्नों के उत्तर सिर्फ इस एक वाक्य में है कि अप्रासंगिक मान लिए गए नाट्यशास्त्र को उसके सम्यक और आत्यंतिक अर्थ में कभी पढ़ा ही नहीं गया है। वह ऐसे कि इसके जो अनुवाद हुए हैं, उनमें सिरे से उपस्थित तकनीकी शब्दावलियों को कभी बताया ही नहीं गया। प्रयोगकर्ताओं का कहना है कि हम कैसे जानें कि 2,500 साल पहले धु्रवागान कैसे गाया जाता था। जबकि इसके 32वें अध्याय की साढ़े पांच सौ कारिकाएं यही बताती हैं कि धु्रवा कैसे गाई जाए। जानना यह भी दिलचस्प हो सकता है कि ध्रुपद ध्रुवा से नहीं और ख्याल बाहर से नहीं, बल्कि प्रबंध, वस्तु और रूपक से आया है, तथा ध्रवपद और ख्याल, दोनों ‘खेलापद’ से आया है, जिसका जिक्र कालिदास ने अपनी रचना विक्रमोर्वशीयम में विस्तार से किया है।

इस छह दशकीय व्यापक अंधेरे को हमेशा के लिए दूर करने काशी के 'इंडियन माइंड' ने एक महती काम किया है। उसने नाट्यशास्त्र का हिंदी और अंग्रेजी में ऐसा अनुवाद प्रस्तुत किया है, जिसमें उन सभी शब्दावलियों की पहली बार सुगम व्याख्या है, साथ में पहली बार अभिनवगुप्त की वृत्ति का सारांश भी। अब नाट्यशास्त्र को पहली बार पढ़ा और समझा जा सकेगा, और इसमें विस्तार से वर्णित प्रविधियों के अनुसार दुनिया के किसी भी नाटक को मंचस्थ करने का सिलसिला शुरू हो सकेगा। अभिनेता को यह आश्वस्त तो करेगा ही कि वह विश्व रंगकर्म में नाट्यशास्त्र को उसकी प्रतिष्ठा सौंप सकेगा।

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