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पड़ताल : टैरिफ के अबूझ गणित और सार्वजनिक चिंताओं के बीच कैसा चल रहा है ट्रंपोनॉमिक्स, विविध दृष्टिकोण

Sat, 19 Apr 2025 07:27 AM IST
Shankar Ayair शंकर अय्यर
Updated Sat, 19 Apr 2025 07:27 AM IST
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सार
अमेरिका को फिर से महान बनाने के लिए ट्रंप समय को पीछे ले जाना चाहते हैं, लेकिन आज की वैश्विक अर्थव्यवस्था कहीं अधिक जटिल है। वह अपने उद्देश्य में सफल होते हैं या नहीं, यह तो समय ही बताएगा। फिलहाल दुनिया टैरिफ के अबूझ अर्थशास्त्रीय गणित और सार्वजनिक चिंताओं के बीच फंसी हुई है।
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world is caught between complex economic mathematics of tariffs and public concerns In Trumponomics
डोनाल्ड ट्रंप। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

इतिहास घटनाओं से निर्धारित होता है। इसमें कोई संदेह नहीं कि ट्रंप 2.0 के तहत टैरिफ ने परिचितों को भी अनजान बना दिया है। यह कुछ अर्थों में वैश्वीकरण का अंत और अनिश्चितता की शुरुआत है। स्टैंजास फ्रॉम द ग्रांडे चार्ट्रूज गीत में मैथ्यू अर्नोल्ड के शब्दों को संक्षेप में कहें, तो वैश्विक अर्थव्यवस्था दो दुनियाओं के बीच भटक रही है, एक मृत और दूसरी अभी पैदा होने वाली है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप फिर से अमेरिका को महान बनाने के नारे के साथ सत्ता में आए। उन्होंने कहा,  ‘अमेरिका को लूटा गया। अब हमारी बारी है।’ ताकत के इस प्रदर्शन ने अमेरिका के दोस्तों एवं दुश्मनों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि क्या इस पर भरोसा किया जा सकता है। उनका एकमात्र ध्यान 290 खरब डॉलर की अर्थव्यवस्था के आकार का लाभ उठाकर अमेरिका को फिर से स्थापित करने के लिए सौदे करना रहा है, तो अब तक ट्रंपोनॉमिक्स का प्रदर्शन कैसा रहा है? नीतियों के आने और उसके प्रभाव का आकलन करने के लिए बेहतर संदर्भ बिंदु 20 जनवरी होगा।



मुद्रा की मजबूती, सॉवरेन बॉन्ड का मूल्य और बाजारों का प्रदर्शन ट्रंपोनॉमिक्स के प्रदर्शन के विश्वसनीय संकेतक हैं। 20 जनवरी को, डॉलर इंडेक्स, जो अमेरिकी मुद्रा की ताकत का प्रतीक है, 109.35 पर था, जो अमेरिकी असाधारणता को दर्शाता है। इस सप्ताह यह 99.64 पर आ गया। अमेरिकी डॉलर अब अपने प्रमुख व्यापारिक साझेदारों-यूरो और येन की मुद्राओं के मुकाबले कमजोर है। बेंचमार्क एस एंड पी-500 बीते 21 जनवरी को  6,049 पर था, जो इस हफ्ते व्हाइट हाउस से सुलह के संकेत के बावजूद 5,405 पर आ गया। नैस्डैक 100, इसी अवधि में 21,566 से 12 प्रतिशत गिरकर 18,796 पर आ गया। बाजार विशेषज्ञ चिंतित हैं, क्योंकि शेयर और डॉलर में एक ही समय गिरावट दुर्लभ है। सूचकांकों में अचानक आई गिरावट खतरनाक रुख और टैरिफ नीति में उतार-चढ़ाव को दर्शाती है।


मसलन, चीन के लिए टैरिफ एक हफ्ते के भीतर 54 से 104 फीसदी और फिर 245 फीसदी तक पहुंच गया। हैरानी नहीं कि शी जिनपिंग प्रशासन, जिसने अमेरिकी वस्तुओं पर टैरिफ बढ़ाकर 125 फीसदी कर दिया, ने ट्रंप का मजाक उड़ाया। वास्तव में, टैरिफ पर 90 दिनों की रोक और वस्तुओं के लिए मनमानी छूट ने धारणाओं को और खराब कर दिया है। ट्रंप का मानना है कि टैरिफ शब्दकोश का सबसे सुंदर शब्द है और उन्होंने इसे दुनिया से अमेरिकी जुड़ाव का केंद्र बिंदु बना दिया है। इसके पीछे की विचित्र धारणाओं और गणित ने व्यापार विशेषज्ञों को भ्रमित कर दिया है। जरा लेसोथो पर विचार कीजिए, जिसके बारे में ट्रंप ने कहा था कि वह अमेरिका पर 99 फीसदी शुल्क लगाता है, अब उस पर 50 फीसदी टैरिफ थोप दिया गया है। यह देश अमेरिका को लगभग 23.5 करोड़ डॉलर का सामान निर्यात करता है और मुश्किल से 28 लाख डॉलर का सामान आयात करता है। 23 लाख लोगों वाला यह छोटा-सा देश, जिसकी प्रति व्यक्ति आय 1,100 डॉलर है, इस असंतुलन को कैसे ठीक कर सकता है? अधिक खरीदकर या कम बेचकर?

टैरिफ नीति के दृष्टिकोण (दोस्त और दुश्मन सब पर एक समान निशाना साधना) और इसके प्रभाव ने बाजारों और बाजार संचालकों को हिलाकर रख दिया है। निवेशकों को लिखे अपने वार्षिक पत्र में, जे पी मॉर्गन के सीईओ जेमी डिमन ने इसे इस प्रकार बताया: ‘अमेरिका पहले स्थान पर होगा-लेकिन अगर वह अकेला है तो नहीं।’ हेज फंड पर्शिंग स्क्वायर के सीईओ बिल एकमैन ने इस दृष्टिकोण की तुलना आर्थिक परमाणु युद्ध से की। एलन मस्क ने टैरिफ नीति के वास्तुशिल्पी पीटर नवारो को मूर्ख कहने के लिए एक्स का सहारा लिया। इन प्रतिक्रियाओं (जिसके कारण नए कर पर 90 दिन का विराम लगा) को प्रेरित करने वाला डर मुद्रा बाजारों के मैक्रो संकेतों से उत्पन्न हुआ है।

परंपरागत रूप से, अनिश्चितता सुरक्षा की ओर पलायन को प्रेरित करती है। हाल तक पसंदीदा गंतव्य अमेरिकी ट्रेजरी बिल था, जिसके परिणामस्वरूप डॉलर मजबूत हुआ। दस साल का अमेरिकी ट्रेजरी पर विश्वास टूटता हुआ दिखाई दे रहा है। बॉन्ड की कीमतों में गिरावट के कारण उच्च प्रतिफल ब्याज दरों में वृद्धि और मंदी की संभावना का संकेत है। विदेशी मुद्रा बाजार में अमेरिकी टी-बिल से विदेशी निवेशकों के बाहर निकलने और निर्मित गिरावट के साजिश के बारे में चर्चा हो रही है। इस बीच, सोने की कीमत 2,708 डॉलर प्रति औंस (28.35 ग्राम) से बढ़कर 3,236 डॉलर से अधिक हो गई, जो विकास में व्यवधान के बारे में वैश्विक चिंताओं को दर्शाती है।

इस हफ्ते की शुरुआत में, सेवाओं के लिए आईएसएम क्रय प्रबंधक सूचकांक, वह क्षेत्र जो अमेरिकी सकल घरेलू उत्पाद का तीन-चौथाई हिस्सा है, नौ महीने के निचले स्तर पर पहुंच गया। मिशिगन उपभोक्ता भावना सूचकांक 71 से अधिक से गिरकर 50.8 पर आ गया, जो उच्च कीमतों और बेरोजगारी की आशंकाओं से प्रेरित था। मिशिगन विश्वविद्यालय के एक सर्वेक्षण से पता चलता है कि मुद्रास्फीति 6.7 प्रतिशत तक बढ़ गई है, जो अमेरिकी फेडरल रिजर्व के लक्ष्य से लगभग तीन गुना अधिक है और 1981 के बाद से सबसे अधिक है। स्पष्ट रूप से, अमेरिकी उपभोक्ता घोषणाओं और उनकी जेब पर पड़ने वाले प्रभावों से हिल गया है। टैरिफ नीतियां विश्वास खत्म कर रही हैं। दुनिया भर में, शेयर सूचकांक और मुद्रा बाजार में उथल-पुथल मची हुई है, मुद्रास्फीति बढ़ रही हैं और विकास अनुमान कम हो रहे हैं। आईएमएफ की प्रबंध निदेशक क्रिस्टालिना जॉर्जीवा ने इस हफ्ते चेतावनी दी कि अमेरिका के टैरिफ उपाय 'सुस्त विकास के समय वैश्विक दृष्टिकोण के लिए एक महत्वपूर्ण जोखिम का प्रतिनिधित्व करते हैं।'

नवारो ने जिसे ‘वैश्विक रिकार्डियन रूढ़िवाद’ कहा है, उसके खिलाफ आवाज उठाना बिल्कुल सही है। सच तो यह है कि यह अमेरिका ही था, जिसने इस रूढ़िवाद को स्थापित किया, क्योंकि उसके उद्यम पूंजी, तकनीक, नौकरियां और सामान निर्यात करते थे। ट्रंप समय को पीछे ले जाना चाहते हैं, लेकिन वैश्विक अर्थव्यवस्था आज कहीं ज्यादा जटिल और परस्पर निर्भर है -उदाहरण के लिए, आईफोन घटकों की आपूर्ति शृंखला 40 देशों में फैली हुई है। इतिहास के सबक मायने रखते हैं-1890 के विलियम मैककिनले के टैरिफ कानून ने ‘1893 के आतंक’ और मंदी को जन्म दिया; 1930 के स्मूट-हॉले कानून ने अवसाद को और बढ़ा दिया। यह सच है कि ये शुरुआती दिन हैं व इससे डर और बढ़ जाता है। यह अनिश्चितता जितने लंबे समय तक चलेगी, वैश्विक गिरावट उतनी गंहरी होगी। दुनिया व्यक्तिगत सनक और सार्वजनिक चिंताओं के बीच, एक नष्ट हो चुकी व्यवस्था तथा एक प्रत्यारोपित व्यवस्था के बीच फंसी हुई है।      

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