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Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   World Hindi Day 2024 Hindi language prestige to be achieved only with indigenous discussions and self-respect

विश्व हिंदी दिवस: वैश्विक हो रहीं चुनौतियां, देशज विमर्श और लोगों के स्वाभिमान से ही मिलेगी प्रतिष्ठा

Wed, 10 Jan 2024 07:19 AM IST
Umesh Chaturvedi उमेश चतुर्वेदी
Updated Wed, 10 Jan 2024 07:19 AM IST
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सार
संयुक्त राष्ट्र भी हिंदी में ट्वीट, पॉडकास्ट और रेडियो प्रसारण कर रहा है। पर हिंदी को प्रतिष्ठा देशज विमर्श और लोगों के स्वाभिमान से ही मिलेगी।
 
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World Hindi Day 2024 Hindi language prestige to be achieved only with indigenous discussions and self-respect
World Hindi Day 2024 - फोटो : Amar Ujala

विस्तार


संयुक्त राष्ट्र भी हिंदी में ट्वीट, पॉडकास्ट और रेडियो प्रसारण कर रहा है। पर हिंदी को प्रतिष्ठा देशज विमर्श और लोगों के स्वाभिमान से ही मिलेगी।


संचार और तकनीक क्रांति के पहले हिंदी की वैश्विक उपस्थिति के लिए सिर्फ और सिर्फ हिंदी सिनेमा को ही जिम्मेदार माना जाता था। ऐसा था भी, लेकिन संचार और तकनीकी क्रांति ने हिंदी का जितना वैश्विक प्रसार किया है, उतना शायद ही कभी हुआ हो। आज स्थिति यह है कि विश्व हिंदी दिवस करीब 180 देशों में मनाया जाता है। हिंदी प्रेमी, पाठक, श्रोता और दर्शक संचार और तकनीकी क्रांति के जरिये दुनिया के किसी भी कोने से न सिर्फ हिंदी पढ़, सीख और देख सकते हैं, पत्रकारिता और सृजन के जरिये हिंदी को दुनिया के किसी भी कोने से न सिर्फ समृद्ध कर सकते हैं, बल्कि उसे पाठकों, श्रोताओं और दर्शकों तक पहुंचा भी सकते हैं। हिंदी के वैश्विक प्रचार-प्रसार और पहुंच के चलते यह धारणा विकसित हो रही है कि हिंदी के सामने कोई बड़ी चुनौती नहीं रही। लेकिन ऐसा नहीं है। हिंदी की राह में अब भी कई बाधाएं हैं।

जर्मन समाजशास्त्री मैक्सवेबर ने जिस नौकरशाही को लोकतंत्र का स्टील फ्रेम कहा है, उसका मानस अब भी हिंदी को लेकर सहज नहीं हो पाया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह के हिंदी प्रेम के बावजूद अब भी नौकरशाही का मानस विदेशी भाषा में ही सोचने और उसी भाषा में नीतियां बनाने पर केंद्रित है। पिछले करीब एक दशक में शासन-प्रशासन में हिंदी का प्रयोग बढ़ा है। लेकिन असलियत में हिंदी अब भी विश्व हिंदी दिवस और हिंदी दिवस पर सेलिब्रेट करने का ही एक जरिया है।


हिंदी के विस्तार में बाजार ने भी बड़ी भूमिका निभाई है। भारत का विशाल मध्य वर्ग दुनिया की नजर में सबसे बड़ा बाजार है। इस मध्य वर्ग तक अपनी पहुंच बनाने के लिए उन बहुराष्ट्रीय कंपनियों तक ने हिंदी समेत भारतीय भाषाओं को अपना हथियार बनाया है, जिनके बारे में दशक भर पहले तक सोचा नहीं जा सकता था कि वे अंग्रेजी के इतर किसी भाषा को अपने कामकाज का जरिया बना सकती हैं। लेकिन जिस सहजता से उनका सामान महानगरों के घर-घर तक पहुंच रहा है, उसी सहजता के साथ उन्होंने उन सुदूर इलाकों तक अपना उत्पाद पहुंचा दिया है, जहां अब भी भारतीय प्रशासन तंत्र पहुंचने से कतराता है।

लेकिन हमें नहीं भूलना चाहिए कि बाजार या संचार किसी भाषा का प्रसार तो बढ़ा सकते हैं, लेकिन भाषा को प्रतिष्ठा नहीं दिला सकते। भाषा को प्रतिष्ठा उसके अपने देशज विमर्श और उसे बोलने वालों के स्वाभिमान से मिलती है। दुर्भाग्यवश हिंदी को लेकर अब भी ऐसी स्थिति नहीं बन पाई है। हालांकि भाषाओं को लेकर कहावत है, भाषा बहता नीर। यानी बहाव के साथ ही जिस तरह पानी में जीवंतता रहती है, भाषाएं भी अपने प्रवाह की ही वजह से जिंदा रहती हैं। इन अर्थों में देखें, तो हिंदी भी संचार क्रांति के साथ लचीली बनी हुई है। लेकिन हिंदी का मानकीकरण ना होने की वजह से हिंदी के व्याकरण के साथ भी खिलवाड़ हो रहा है। हिंदी दूसरी भाषाओं के शब्द ले रही है, यहां तक तो ठीक है। लेकिन उन शब्दों को अपने व्याकरण में ढाला जाना चाहिए, लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है।

बतौर विदेश मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने संयुक्त राष्ट्र के मंच पर हिंदी का जो सिंहनाद किया, उसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पूर्व विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने भी जारी रखा। हिंदी में संयुक्त राष्ट्र का दफ्तर भी ट्वीट कर रहा है, हिंदी में पॉडकास्ट और रेडियो प्रसारण भी कर रहा है। लेकिन यह भी सच है कि इसी दौर में भारत में अंग्रेजी इस कदर स्थापित हुई है कि गैर अंग्रेजीभाषी देश भी भारत से संपर्क के लिए हिंदी या अपनी भाषा के बजाय अंग्रेजी को ही अपना जरिया बनाते हैं।

हिंदी की एक चुनौती स्थानीय राजनीतिक बोध भी है। खासकर गैर हिंदीभाषी राज्यों का स्थानीय नेतृत्व यदा-कदा अपने सियासी फायदे के लिए हिंदी के खिलाफ कुछ बयान दे देता है। कर्नाटक और महाराष्ट्र में यदा-कदा हिंदी बोलने वालों पर स्थानीय स्तर पर दबाव बनाया जाता है कि वे कन्नड़ या मराठी बोलें। भाषाओं को दबाव के जरिये नहीं सीखा या सिखाया जा सकता। इसे दुर्योग ही कहेंगे कि आजादी के पचहत्तर साल बाद भी हिंदी को गैर हिंदीभाषी इलाके के स्थानीय राजनीतिक बोध के गैरवाजिब हमले का सामना करना पड़ता है। हिंदी को स्वाभिमान के साथ स्नेह की भी भाषा बनाना पड़ेगा। हिंदी की वैश्विक उपस्थिति तब कहीं ज्यादा सार्थक और सहज होगी।

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