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साम, दाम, दंड, भेद: अकेली महसूस कर रही दुनिया, समझने और सुलझाने के लिए कौटिल्य के चार मंत्र बुनियादी टूलकिट

Sat, 31 Oct 2026 05:27 AM IST
ज्योति भास्कर नन्दितेश निलय (स्पीकर, लेखक एवं  एथिक्स प्रशिक्षक)
नन्दितेश निलय (स्पीकर, लेखक एवं  एथिक्स प्रशिक्षक) Published by: ज्योति भास्कर Updated Sat, 31 Oct 2026 05:27 AM IST
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सार
युद्ध, एआई और सोशल मीडिया के दौर में अकेली महसूस कर रही दुनिया को समझने और सुलझाने के लिए कौटिल्य के चार मंत्र बुनियादी टूलकिट हो सकते हैं। इनमें सबसे महत्वपूर्ण ‘साम’ ही है, क्योंकि बातचीत, तर्क, सहानुभूति और सद्भावना से ही सहमति बनाई जा सकती है।
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world feeling alone amid war AI and social media Kautilya four strategies essential toolkit for resolution
कौटिल्य के चार मंत्र बुनियादी टूलकिट - फोटो : अमर उजाला प्रिंट-ग्राफिक्स

विस्तार

अगर आप भी मोटिवेशन या लीडरशिप के गुर तलाश रहे हैं, तो जरा गौर करिए। अगर इतिहास के पन्नों को पलटें, तो कहने के लिए राज्य संचालन के चार उपाय हैं, लेकिन इनका दायरा बहुत ही विस्तृत हो चुका है। अब ये शब्द जाने-अनजाने  प्रतिदिन के संप्रेषण और सामाजिक सरोकार में प्रवेश कर चुके हैं।



जी हां, मैं इस लेख में चर्चा करना चाहता हूं कौटिल्य द्वारा सुझाए गए उन चार शब्दों की, जो राजनीतिक परिस्थितियों को समझने और सुलझाने के आधारभूत टूलकिट तो बने ही, साथ-साथ किसी भी नेतृत्व के प्रोत्साहन के भी कमाल के माध्यम हैं। ये शब्द हैं :  साम, दाम, दंड, भेद। इसमें साम का मतलब है-समझाना और बातचीत से हल निकालना, दाम का अर्थ है-धन, प्रलोभन या आर्थिक लाभ देकर मनाना, दंड यानी जब पहले के उपाय काम न आएं, तब सजा, बल प्रयोग या भय दिखाना और भेद का अर्थ है-फूट डालना, रहस्य जानना या विभाजित करके कमजोर करना।


जिस दुनिया में आपस में बातचीत ही मुश्किल हो रही हो, और अधिकांश समय मोबाइल पर ही बीत जाता हो, जहां विमर्श की जगह आरोप-प्रत्यारोप का माहौल बन जाता हो, वहां साम की जगह घरों में भी बनती है, संस्थाओं, कस्बे और सफर में भी। और बनती है उस हर आत्म-संवाद में भी, जो धीरे-धीरे मद्धिम होता जा रहा है। आखिर वह विमर्श, वह समझदारी से किया हुआ संवाद ही तो है, जो  मनुष्य के समाज को बिखरने से बचाता है। 

इस दौर में साम एआई चैटबॉट के लिए टूलकिट तो बन चुका है, लेकिन हमारे लिए अभी यह राजनीतिक सीमाओं में ही कैद है। आखिर किसी परिवार, किसी संस्था में होता संवाद, समझदारी से किया गया संवाद और गतिरोध को तोड़ने वाला संवाद ही हर उस लीडर की जरूरत है, जो अपनी टीम को प्रोत्साहित करना चाहते हैं। वह साम ही तो है, जो वर्षों कैद रिश्तों के बंद ताले को तोड़ना चाहता है, जो दो व्यक्ति या दो राष्ट्रों के बीच आसानी से अपनी जड़ें जमा लेता है। 

अगर कोई किसी से बरसों-बरसों तक नाराज रहे और बातचीत करने से परहेज करे, तो साम को यह पसंद नहीं। साम इस वर्चुअल और अकेली पड़ती दुनिया को यह समझाना चाहता है कि बातचीत, तर्क, सहानुभूति, साझा हितों और सद्भावना के जरिये ही आपस में सहमति बनाई जा सकती है या यों कहें कि उस विरोध या नाराजगी के स्वर को सुनने का प्रयास किया जा सकता है। और यह दोनों पक्षों से संभव है। 

दाम यानी वह प्रोत्साहन, उपहार, पुरस्कार या भौतिक लाभ, जो रिश्तों को सिर्फ मजबूत ही नहीं बनाता, बल्कि अच्छे कार्य को मान्यता भी देता है। दाम वह पुरस्कार है, जिसका सिर्फ मात्रात्मक महत्व ही नहीं है, बल्कि गुणात्मक महत्व भी उतना ही है। 
किसी की पीठ थपथपाना, हौसला अफजाई करना एक नेतृत्व कला है और किसी लीडरशिप के द्वारा अपनाई साम की दक्षता ही उस दाम को एक नैतिक ऊंचाई देती है और इस पूरी प्रक्रिया को भी बहुत उपयोगी बनाती है। इसका उपयोग नैतिक रूप से इसलिए किया जाता है, ताकि व्यक्ति की क्षमता को मान्यता मिल सके। 

रही बात दंड की, तो इसका उपयोग जवाबदेही तय करने के लिए किया जा सकता है। सिर्फ भय या सजा से आगे भी इस माध्यम का इस्तेमाल हो सकता है, जिससे लोग भयभीत होकर सिर्फ सही काम न करें, बल्कि एक जवाबदेही के साथ उस कार्य को कर सकें। और भेद को फिर जितना कम किया जा सके, वह किया जाए।

प्रेमचंद की कहानी पंच परमेश्वर को पढ़ने से लगता है कि जुम्मन शेख और अलगू चौधरी के साथ साम, दाम, दंड, भेद की कहानी भी चलती रही। साम उस पंचायत में खूब नजर आया और उस खुली सुनवाई में भी। जुम्मन की बूढ़ी मौसी उस भरोसे और देखभाल के मूल्यों के साथ उस दान की प्रक्रिया में जुम्मन पर भरोसा करती है। 

किसी लीडर के लिए वह भरोसा ही तो सबकुछ है और कई बार एक कर्मचारी के लिए वह पारितोषिक एक जिम्मेदारी के भाव भी लिए आता है। जुम्मन और उसकी पत्नी मौसी के दान के उत्तरदायित्व से चूक गए और फिर वह सबकुछ टूट गया, जिसे नहीं टूटना था। किसी लीडरशिप के लिए जब साम और दाम के रास्ते बंद हो जाते हैं, तो फिर वह दंड आता है, जो जवाबदेही को तय करता है और फिर पंच परमेश्वर में निष्पक्ष और न्यायपूर्ण फैसला आता है और बिना किसी बदले की भावना के संतुलन बहाल करता है। 

और यह न भूलिए कि दंड और भेद तक पहुंचने के पहले किसी लीडरशिप को यह आकलन निस्संदेह करना चाहिए कि उनकी तरफ से साम और दाम को लेकर कैसे प्रयास हुए और परिवार या समाज के स्तर पर भी साम का व्यवहार या आचरण पोषित होता है या नहीं। क्योंकि बदलती दुनिया में विमर्श की जगह बस अपनी बात कहने की होड़ लगी है। कोई समझना-समझाना नहीं चाहता। बस बात भेद से होकर भेद पर ही मानो खत्म होना चाहती है। दंड और भेद का ही बोलबाला है, लेकिन साम और वह शाबाश को लिए दाम कहीं न कहीं कुंठित मन का हिस्सा बन चुका है। और परिणाम, बस वह भेद।

लेकिन अलगू चौधरी और जुम्मन शेख के बीच कोई भेद का भाव नहीं आया, क्योंकि उनका साम बहुत ही मजबूत था, उसमें वह आत्म-विमर्श था, वह भरोसा और समझना-समझाना भी था, जो हर परिवार, समाज, संस्था और राष्ट्र के नेतृत्व कला की जरूरत होती है। आखिर मनुष्य का मनुष्य के पास बैठना, संवाद करना, उसके दुख-सुख को समझना और फिर उस यकीन को स्थापित करना किसी भी दौर को उस भेद से बचा ले जाता है, जो साम, दाम, दंड और भेद हमें सिखा जाते हैं। 

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