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चुनाव जिस पर पूरी दुनिया की नजर है: लड़ाई केवल कांग्रेस में बहुमत की नहीं, नतीजे का असर कई देशों पर हो सकता है

Fri, 30 Oct 2026 05:31 AM IST
K S Tomar केएस तोमर
Updated Fri, 30 Oct 2026 05:31 AM IST
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सार
आगामी 3 नवंबर को होने वाले अमेरिकी मध्यावधि चुनाव केवल कांग्रेस में बहुमत की लड़ाई नहीं हैं, बल्कि ये राष्ट्रपति ट्रंप के शेष कार्यकाल की दिशा भी तय करेंगे। नतीजों का असर अमेरिका की घरेलू नीतियों से आगे बढ़कर ईरान, यूक्रेन, इस्राइल व भारत सहित कई देशों पर पड़ सकता है।
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US Midterm elections whole world watching battle not just for majority in Congress outcome impact on countries
अमेरिकी मध्यावधि चुनाव। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

यदि सांविधानिक रूप से नहीं, तो कम से कम राजनीतिक रूप से तीन नवंबर को तय होगा कि डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति कार्यकाल का बचा हुआ समय कैसा रहेगा। हालांकि मध्यावधि चुनाव से उनके पद पर कोई खतरा नहीं है, लेकिन यदि डेमोक्रेटिक पार्टी ‘कांग्रेस’ पर नियंत्रण हासिल कर लेती है, तो ट्रंप के लिए शासन चलाने की स्वतंत्रता काफी सीमित हो सकती है। ऐसे में उनके प्रशासन की जांच हो सकती है और उनके कई अहम फैसलों को चुनौती मिल सकती है। इसका असर घरेलू राजनीति तक सीमित नहीं रहेगा। ईरान से युद्ध, यूक्रेन और इस्राइल को सैन्य सहायता, रक्षा बजट और विदेशी मदद जैसे मुद्दों पर कांग्रेस का नियंत्रण यह तय कर सकता है कि ट्रंप अपनी निजी प्राथमिकताओं को अमेरिकी नीतियों में किस हद तक बदल पाएंगे। इसलिए यह चुनाव ट्रंप के कामकाज पर जनमत संग्रह से बढ़कर राष्ट्रपति की शक्तियों पर संस्थागत नियंत्रण की एक परीक्षा है, जो तय करेगा कि अमेरिकी विदेश नीति व्हाइट हाउस से संचालित होती रहेगी या उस पर कांग्रेस की निगरानी बढ़ेगी। भारत, चीन और पाकिस्तान के लिए इसके नतीजे मायने रखते हैं, क्योंकि भले ही राष्ट्रपति न बदले, लेकिन कांग्रेस में सत्ता का संतुलन बदलने से अमेरिका की व्यापार नीति, रणनीतिक प्रतिबद्धताओं और क्षेत्रीय कूटनीति की दिशा प्रभावित हो सकती है। 



रिपब्लिकन पार्टी की हार भारत के लिए राहत और अनिश्चितता, दोनों लेकर आ सकती है। ट्रंप की टैरिफ नीति, लेनदेन आधारित कूटनीति और दबाव बनाने के रवैये ने भारत-अमेरिका संबंधों को पेचीदा बना दिया है। यदि चुनाव में ट्रंप की पार्टी कमजोर पड़ती है, तो उनके लिए नई आर्थिक पहलों पर कांग्रेस का समर्थन जुटाना और सख्त व्यापार नीति को जारी रखना मुश्किल हो सकता है।


अगर अमेरिकी सांसद व्यापार और आर्थिक संबंधों में अधिक स्पष्टता और स्थिरता की मांग करते हैं, तो नई दिल्ली को बातचीत के लिए कुछ गुंजाइश मिल सकती है। फिर भी, भारत को यह मानकर नहीं चलना चाहिए कि डेमोक्रेटिक पार्टी के नियंत्रण वाली कांग्रेस अपने आप भारत के पक्ष में नीतियां बनाएगी। बाजार तक पहुंच, तकनीक, आव्रजन और रूस के साथ भारत के संबंधों को लेकर चिंताएं दोनों ही पार्टियों में समान रूप से मौजूद हैं। बंटी हुई सरकार रक्षा सहयोग, अहम तकनीकों और व्यापार समझौतों की दिशा में हो रही प्रगति को धीमा कर सकती है। भारत के लिए सबसे बेहतर यही होगा कि वह वाशिंगटन में दोनों दलों (रिपब्लिकन और डेमोक्रेट) का समर्थन बनाए रखे, न कि मोदी और ट्रंप के बीच के व्यक्तिगत संबंधों पर बहुत ज्यादा निर्भर रहे।

विदेश नीति की तस्वीर कहीं अधिक जटिल है। सैन्य अभियानों और विदेशी सहायता पर अमेरिकी कांग्रेस की कड़ी निगरानी उस व्यापक रणनीतिक माहौल को प्रभावित कर सकती है, जिसमें भारत काम करता है। अंतरराष्ट्रीय संघर्षों को लेकर अमेरिका का अधिक सतर्क रवैया कुछ जोखिमों को कम कर सकता है, लेकिन वाशिंगटन की प्रतिबद्धताओं को लेकर अनिश्चितता क्षेत्रीय सुरक्षा के समीकरणों को और जटिल बना सकती है। अगर रिपब्लिकन कांग्रेस पर अपना नियंत्रण बनाए रखते हैं, तो ट्रंप इस नतीजे को अपने एजेंडे के समर्थन के रूप में देखेंगे। उनका प्रशासन टैरिफ, आव्रजन और सहयोगियों के साथ बोझ साझा करने के मामलों में और अधिक सख्त रुख अपना सकता है। भारत को रक्षा, ऊर्जा और प्रौद्योगिकी के क्षेत्रों में सहयोग जारी रखने के साथ-साथ, दबाव के बीच लगातार बातचीत के लिए भी तैयार रहना होगा।

चीन इन चुनावों पर करीबी नजर रखेगा। डेमोक्रेट्स की जीत ट्रंप के काम करने की आजादी को सीमित कर सकती है, और व्यापार प्रतिबंधों, पाबंदियों तथा बीजिंग के साथ रणनीतिक प्रतिस्पर्धा पर कांग्रेस की निगरानी बढ़ा सकती है। हालांकि चीन की आर्थिक और सैन्य महत्वाकांक्षाओं का विरोध करने के मामले में दोनों पार्टियों (डेमोक्रेट्स और रिपब्लिकन्स) की सहमति है। बीजिंग को सिर्फ इसलिए अमेरिका की रणनीतिक नीति में किसी बड़े बदलाव या पीछे हटने की उम्मीद नहीं करनी चाहिए कि कांग्रेस पर डेमोक्रेट्स का नियंत्रण हो गया है। अगर ट्रंप को कांग्रेस का समर्थन मिलता रहता है, तो उनका प्रशासन चीन पर आर्थिक दबाव और बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित हो सकता है। बीजिंग इसका जवाब व्यापार में विविधता लाकर, राजनयिक संपर्क बढ़ाकर और अन्य प्रमुख शक्तियों के साथ करीबी संबंध बनाकर दे सकता है। भारत के लिए, अमेरिका और चीन के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा तकनीक और आपूर्ति-शृंखला में विविधता लाने के अवसर पैदा कर सकती है, लेकिन इससे क्षेत्रीय अस्थिरता भी बढ़ सकती है।

इस बीच, पाकिस्तान यह देखेगा कि क्या कमजोर हो रहा ट्रंप प्रशासन दक्षिण एशिया, अफगानिस्तान, आतंकवाद-विरोधी प्रयासों और क्षेत्रीय सुरक्षा के मामलों में अपनी राजनीतिक पूंजी लगाने के लिए कम इच्छुक या कम सक्षम हो गया है। फिर भी, अमेरिका के लिए पाकिस्तान का महत्व केवल कांग्रेस में शक्ति संतुलन पर नहीं, बल्कि रणनीतिक परिस्थितियों पर निर्भर करेगा। भारत को क्षेत्रीय मध्यस्थता में अमेरिकी रुचि के फिर से जागने, या किसी ऐसे लेन-देन वाले दृष्टिकोण को लेकर सतर्क रहना चाहिए, जिससे पाकिस्तान को कूटनीतिक बढ़त मिल सके। भारत की प्राथमिकता वाशिंगटन के साथ सीधा संवाद बनाए रखने, अपनी रणनीतिक स्वायत्तता की रक्षा करने और यह सुनिश्चित करने की होनी चाहिए कि अमेरिका में होने वाले घरेलू राजनीतिक बदलाव उसके क्षेत्रीय प्राथमिकताओं को तय न करें।

 इन चुनावों का असर एशिया से कहीं आगे तक जाएगा। यूरोपीय सहयोगी, पश्चिम एशिया की सरकारें और अन्य साझेदार यह परखेंगे कि क्या कांग्रेस के भरोसेमंद समर्थन के बिना ट्रंप की विदेश नीति कायम रह सकती है? यह अनिश्चितता उन देशों के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, जो अमेरिका से स्थायी प्रतिबद्धताओं की उम्मीद करते हैं। भारत और पूरी दुनिया के लिए बड़ा सवाल यह है कि क्या वाशिंगटन अपने देश के भीतर के ध्रुवीकरण के बावजूद रणनीतिक निरंतरता बनाए रख पाएगा या फिर अंतरराष्ट्रीय संबंध भी धीरे-धीरे अमेरिका की आंतरिक राजनीतिक लड़ाइयों का ही एक हिस्सा बन जाएंगे।

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