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खतरे में है हमारी जैव विविधता

anil prakash joshi अनिल प्रकाश जोशी
Updated Fri, 05 Jun 2020 08:00 AM IST
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World Environment Day 2020 : Our biodiversity is in danger
बंगलूरू में सूर्यास्त के समय उल्सूर झील में तैरते कचरे के ढेर पर खाने की तलाश करता पक्षी। - फोटो : PTI

मनुष्य का यह सोचना गलत था कि पृथ्वी और प्रकृति में उसका ही नियंत्रण है। उसकी यह भूल बड़ी भारी पड़ी है। उसने अपने अलावा दूसरे जीव-जंतुओं व पेड़-पौधों के बारे में नहीं माना कि वे भी दुनिया में उसी तरह का स्थान व महत्व रखते है, जो मनुष्य का है। इस बार का पर्यावरण दिवस दुनिया की जैव विविधता से जुड़ा है।


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हमने पिछले वर्षों में 80 लाख से भी ज्यादा जीव-जंतुओं और पेड़-पौधों को विलुप्त कर दिया है। आज 10 लाख जीव खतरे की सीमा में  हैं। छोटी हवाइयन स्नेल हाल में लुप्त हो चुकी है। सबसे बड़ी फ्रेशवॉटर मछली भी हमें अलविदा कह चुकी है। हमने पक्षियों की तीन प्रजातियां खो दी हैं। पिछले साल शार्क की एक, मेंढक की दो और कई तरह के पौधे विलुप्त हो गए।

हाल ही में लैंडमार्क ग्लोबल एसेसमेंट नाम के पेपर ने इन सभी प्रजातियों की जैव विभिन्नता व स्वास्थ्य के बारे में एक बड़ा खुलासा किया है। समरी फॉर पॉलिसी मेकर्स नाम से करीब चालीस पेज के दस्तावेज में 15,000 वैज्ञानिकों और करीब 145 विशेषज्ञों ने इसका विस्तार से विवरण दिया है कि पिछले 15 साल में कुल 50 देशों में हमने क्या खोया है।



इसके अनुसार, करीब 87 लाख प्रजातियों को हमने पूरी तरह से नष्ट कर दिया है। एक रिपोर्ट के अनुसार, मानवीय गतिविधियों के कारण समुद्र का 66 फीसदी हिस्सा आज गंभीर स्थिति में पहुंच चुका है। समुद्र में करीब 400 डेड जोन माने गए हैं, जहां तमाम समुद्री प्रजातियों का जीवन कठिन हो चुका है।

यह स्थिति इसलिए भी गंभीर है, क्योंकि दुनिया में जितना कार्बन उत्सर्जन होता है, उसका 60 फीसदी हिस्सा अकेले समुद्र ही झेलता है। इसी कारण प्रवाल भित्ति (कोरल रीफ), ऊष्णकटिबंधीय क्षेत्र की दलदली जमीन वाले वन (मैनग्रोव) और समुद्रतटीय क्षेत्रों में जनजीवन गंभीर खतरे की तरफ पहुंच चुके हैं। पिछले 300 साल में करीब 15 फीसदी वेटलैंड्स खत्म हो गए हैं।

वर्ष 2015 में ही 33 फीसदी समुद्री मछलियों को संरक्षित मछलियों का दर्जा दिया जा चुका था। गोल्डन टोड मेंढक गायब होने के कगार पर है, तो पिंटाजियांट कछुआ और दुर्लभ प्रजाति की रंगीन तितली ऑरेंज अपरविंग मॉथ हमारे बीच है ही नहीं। चीन में पाई जाने वाली 23 फीट लंबी सबसे बड़ी मछली हमारा साथ छोड़ रही है। अर्जेंटीना, उरुग्वे और ब्राजील में पाई जाने वाली ग्लॉक्स मकाऊ पक्षी संकट का सामना कर रही है।

दरअसल औद्योगिकीकरण, शहरीकरण और खनन आदि में प्रकृति को दरकिनार कर हम इसके उपभोग पर ही केंद्रित रहे। वर्ष 2000 में आई एक रिपोर्ट के अनुसार, हमने पक्षियों की 1,225 प्रजातियां खो दी हैं और 78 जीव प्रजातियां खतरे के स्तर पर पहुंच चुकी हैं। 95 फीसदी गिद्ध समाप्त हो चुके हैं। वर्ष 2013 में आए एक और आंकड़े के मुताबिक, पौधों की नौ प्रजातियां हम खो चुके हैं।

ऐसा इसलिए हुआ, क्योंकि हमने प्रकृति को अत्यधिक नुकसान पहुंचाया है। 1980 से 2000 के बीच करीब 10 करोड़ हेक्टेयर ऊष्णकटिबंधीय वन नष्ट कर दिए गए। पिछले पांच दशक में हमारी वनों की आवश्यकता करीब 45 फीसदी बढ़ गई, लेकिन जब से उद्योग खड़े हुए, तब से करीब 68 फीसदी वनों को हमने पूरी तरह खोया है और करीब 29 करोड़ हेक्टेयर वन, जो हमने पैदा किए, वे स्थायी वन नहीं बन सकते, क्योंकि उनमें प्रकृति की समन्वयता को नहीं देखा गया।

आज भी दुनिया में दो अरब लोग जलाऊ लकड़ी पर निर्भर हैं। दुनिया में एक भी ऐसी प्रजाति नहीं है, जो अपने आप में बड़ा पारिस्थितिक महत्व न रखती हो। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि वह चाहे मिट्टी के जीवाणु हों या अन्य कोई प्राणी, प्रकृति और हमारे जीवन में उनका भी योगदान है।

पर मनुष्य ने अपने हित औेर उपयोग में दूसरे जीवों के आवास व खाद्य शृंखला को पूरी तरह संकट में डाल दिया। हम यह भूल गए कि इनके न होने का मतलब मनुष्य का भी विलुप्त होना है। यह विडंबना ही है कि हम यह तक नहीं समझ पा रहे कि पहले से खतरे में पड़ी हमारी जैव विविधता को कोरोना ने बड़े खतरे में डाल दिया है। कोरोना के संकट के बीच संतुलित रहना और प्रकृति को संतुलित रखना ही आज की आवश्यकता है। प्रकृति के नियमों को तोड़ने का नतीजा गंभीर ही होगा।

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