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नजरिया: आधी आबादी के अधिकारों पर इनकी बातें, इनका सच
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विस्तार
अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस में अभी कुछ देर है। लेकिन मैं महसूस कर रही हूं कि उसकी तैयारी शुरू हो चुकी है। महिला दिवस का पालन आजकल खूब धूमधाम से किया जाता है। सुबह-सुबह मुझे बहुत लोग, जिनमें महिलाएं और सामाजिक कार्यकर्ता ही ज्यादा होते हैं, फोन कर महिला दिवस की शुभकामनाएं देते हैं। यह मुझे थोड़ा अटपटा लगता है। अगर महिलाओं को पुरुषों के बराबर अधिकार मिलते, तो महिला दिवस का कोई औचित्य ही नहीं था। यहां तो हालत यह है कि एक दिन की गहमागहमी के बाद महिलाओं के लिए पूरा साल संघर्ष में ही बीतता है।
महिला-विरोधी सामाजिक मानसिकता का ताजा उदाहरण एनिमल नाम की फिल्म है, जो अब तक 900 करोड़ रुपये से भी अधिक का कारोबार कर चुकी है। बेहद लोकप्रिय यह फिल्म भयंकर नारी-विद्वेषी है। मैं सिर्फ भारत की बात नहीं कर रही। पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में अभी जहरीले मर्दवाद का प्रचलन है। महिला दिवस से ठीक पहले एक महिला-विद्वेषी फिल्म के प्रति समाज के जुनून को भला क्या कहेंगे? इससे बड़ी विडंबना और क्या होगी कि आज एनिमल फिल्म का जुनून जिनके सिर चढ़कर बोल रहा है, कल वही महिला दिवस पर महिलाओं के हक में बड़ी-बड़ी बातें करेंगे!
सच तो यह है कि आजकल महिला दिवस को जोर-शोर से मनाया भी जाता है। पिछले साल इसी खास दिन जब मैं बैंक गई, तो देखा कि उसे रंग-बिरंगे गुब्बारों से सजाया गया है। अंदर जाने पर एक कर्मचारी ने मुझे गुलाब भेंट कर विश भी किया था। परचून की दुकान पर गई, तो वहां भी दुकानदार ने मुझे विश किया था। उस दिन बैंक और दुकान में मैं जब तक रही, मैंने देखा कि आनेवाली हर महिला का स्वागत किया जा रहा है। देश-विदेश घूम चुकने बावजूद मेरे लिए यह नया अनुभव था। इसका मतलब तो यही है कि साधारण आदमी भी अब महिला दिवस के बारे में जानता है। उसे यह भी मालूम है कि इस दिन महिलाओं का सम्मान करना चाहिए।
सवाल यह है कि महिलाओं के प्रति यह श्रद्धा भावना सिर्फ एक दिन के लिए सीमित क्यों है। ऐसा मैं जान-बूझकर ही कह रही हूं। अगर हमारा समाज सचमुच महिलाओं का सम्मान करता, उन्हें पुरुषों के बराबर समझता और महिलाओं के अधिकारों के लिए आवाज उठाता, तो अखबारों के पृष्ठ यौन अपराधों के वृत्तांतों से भरे हुए कतई न होते। फिर यह भी नहीं मान लेना चाहिए कि महिला दिवस के दिन महिलाओं के खिलाफ अपराध होता ही न होगा।
इसीलिए महिलाओं के हक की लड़ाई लड़ते हुए भी महिला दिवस मुझे बहुत आकर्षित नहीं करता। यह कुछ उन अनुष्ठानों की तरह है, जिनके औचित्य-अनौचित्य पर सवाल उठाए बिना हमें जिनका पालन करना पड़ता है। महिला दिवस का आयोजन मुझे स्कूलों में कक्षा शुरू होने से पहले गाए जानेवाले राष्ट्रगान की तरह लगता है, जिसमें छात्र खड़े होते हैं, तो सिर्फ इसलिए कि यह एक नियम है। स्कूलों में अनेक छात्र ऐसे होते हैं, जिनका राष्ट्रगान से कोई भावनात्मक लगाव नहीं होता। ठीक उसी तरह महिला दिवस के अनुष्ठान में मेरी कोई रुचि नहीं है, क्योंकि मैंने पाया है कि महिला दिवस का सालाना अनुष्ठान किसी भी देश में स्त्रियों की स्थिति बदलने में मददगार साबित नहीं हुआ है।
यह दिवस अब लगभग हर देश में मनाया जाता है। जब आम लोग महिला दिवस के महत्व और औचित्य को समझने लगे हैं, तब महिलाओं के साथ होनेवाले अपराधों में कमी क्यों नहीं होती? जब सामाजिक स्तर पर स्त्रियों के प्रति कोई उदार बदलाव नहीं है, कन्या भ्रूणहत्या से लेकर शिक्षा और रोजगार के मोर्चे पर महिलाओं के प्रति दुराव कायम है, तो भला यह क्यों न माना जाए कि उपभोक्तावादी आयोजनों-अनुष्ठानों में यह भी एक सालाना अनुष्ठान है? अगर महिलाओं के हित में सचमुच ही कुछ करना है, तो उसके लिए साल के तीन सौ पैंसठ दिन हैं। लेकिन चलन यह है कि एक दिन तो महिलाओं के हित में बड़ी-बड़ी बातें करो और पूरे साल महिला-विरोधी अभियान चलाए रहो।
अगर अपनी बात करूं, तो कहना पड़ता है कि नारी-विरोधी समाज में बैठकर मैं पिछले करीब चालीस साल से महिलाओं के हक में लिख रही हूं। इसके बावजूद कोई बड़ा और सार्थक बदलाव तो कहीं दिख नहीं रहा। फिर यह भी लगता है कि मैंने भला कितना बड़ा जोखिम उठाया। हजारों नारीवादियों ने हजारों साल से महिलाओं के लिए मुझसे कहीं ज्यादा बड़ा जोखिम उठाया है। उनकी लड़ाई के आगे मेरा अभियान तो बहुत ही छोटा है। चूंकि स्त्रियों को उनके अधिकार आज तक नहीं मिले हैं, जो पुरुषवर्चस्ववादी समाज में आसान नहीं हैं, इस कारण उनके लिए लड़ने वाली असंख्य महिलाओं की लड़ाई को भी मान्यता नहीं मिली है। महिलाओं को न्याय देने के विपरीत इन दिनों कई देशों में पुरुष संरक्षण समिति और पुरुषों को अधिकार दिलाने जैसे संगठन खड़े हो गए हैं। जहां इस तरह के कदम उठाए जा रहे हों, वहां महिलाओं को न्याय और अधिकार दिलाने का अभियान कितना पीछे चला गया होगा, इसकी कल्पना ही की जा सकती है।
हालांकि इस चौतरफा हताशा के बीच कहीं-कहीं उम्मीद भरे दृश्य भी दिखाई पड़ते हैं। कुछ समय पहले मैंने काबुल की सड़कों पर कुछ पुरुषों को नीला बुर्का पहने और हाथ में बैनर लिए गुजरते देखा था। वे स्त्रियों पर होनेवाला अत्याचार खत्म करने के लिए अभियान चला रहे थे। मैं वह दृश्य देखकर मुग्ध थी। महिलाओं के हक में सड़कों पर निकलने वाले अन्य जुलूसों से वह जुलूस ज्यादा मर्मस्पर्शी और तार्किक था। हालांकि काबुल की सड़क पर उस दिन अफगान पुरुषों की संख्या पंद्रह-बीस से ज्यादा नहीं थी। जबकि मैं चाहती हूं कि यह संख्या बढ़े। मुझे पश्चिम के देशों की याद आई, जहां महिलाओं के अधिकारों की लड़ाई लड़ने के लिए महिलाओं के जूते पहनकर पुरुष सड़कों पर एक मील तक चले थे। उनकी मांग थी कि महिलाओं के खिलाफ यौन अपराध समेत जो तमाम अपराध पुरुष करते हैं, वे सब बंद हों। तुर्किये और भारत में भी महिलाओं के अधिकारों के लिए पुरुषों को सड़कों पर उतरते देखा गया है। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर भी महिलाओं के प्रति सच्चा सम्मान दिखाने वालों की संख्या बढ़ रही है। जब तक महिलाओं के अधिकारों के लिए सड़कों पर अधिक से अधिक पुरुष नहीं उतरेंगे, तब तक महिलाओं के जीवन में वास्तविक बदलाव आना संभव नहीं है।