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परंपराओं से टकराती महिलाएं

Thu, 04 Oct 2018 06:04 PM IST
सुभाषिनी सहगल अली
सुभाषिनी सहगल अली Updated Thu, 04 Oct 2018 06:04 PM IST
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Women clashing with traditions
सुभाषिनी सहगल अली

महिलाओं के लिए न्याय की कठिन लड़ाई के मार्ग में सबसे जटिल रोड़े परंपराओं, धार्मिक रीति-रिवाजों और संस्कारों के होते हैं। अधिकतर परंपराएं, धार्मिक रीति-रिवाज और संस्कार महिलाओं को नियंत्रित करने के लिए उनका निचला दर्जा बनाए रखते हैं। इन रोड़ों को हटाने के लिए महिलाओं को अपने अंदर साहस जुटाना पड़ता है, आंदोलन और संघर्ष करने पड़ते हैं, हर कदम पर सरकार की मदद की अनिवार्यता से मजबूर होना पड़ता है।


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सरकारें संविधान और समानता के प्रति अपनी कटिबद्धता की दुहाई देती हैं, पर उनकी नीयत, नीति और व्यवहार को बदलती राजनीतिक प्राथमिकताएं और राजनीतिक लाभ की समझदारी तय करती है। तीन तलाक पर नरेंद्र मोदी और उनके मंत्री मुस्लिम महिलाओं के रक्षक होने का दावा कर रहे हैं। सच्चाई यह है कि तीन बहादुर मुस्लिम महिलाओं ने सर्वोच्च न्यायालय में एक बार में तीन तलाक कहकर तलाक देने की प्रथा के खिलाफ अर्जी लगाईं थी। न्यायालय ने तीन तलाक को गलत और संविधान-विरोधी ठहरा दिया। यह मुस्लिम महिलाओं की बड़ी जीत थी। सरकार ने इस मामले का राजनीतिक लाभ उठाने के लिए तीन तलाक के खिलाफ कानून बना डाला, जिसके तहत एक दीवानी के जुर्म को एक फौजदारी के जुर्म में बदल दिया। संसदीय रास्ते से अलग हटकर सरकार ने कानून को अध्यादेश के माध्यम से लागू कर दिया।

क्या सरकार सच में मुस्लिम महिलाओं की पक्षधर है? मुसलमानों में एक बोहरा समुदाय है, जिसका एक बहुत बेदर्द रिवाज है, बच्चियों का खतना। अनेक बोहरा महिलाओं ने इस बर्बरता के खिलाफ अभियान चलाया। उनके समर्थन में हजारों लोगों ने हस्ताक्षर किए। उनकी तरफ से एक महिला वकील सुनीता तिवारी ने खतना बंद करने की मांग सर्वोच्च न्यायालय से की। शीर्ष अदालत ने मांग का समर्थन किया, और एटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने भी माना कि यह प्रथा बुनियादी अधिकारों के विरुद्ध है। बोहरा महिलाओं को लगा कि जल्दी ही उनकी जीत होगी। पर इस बीच मोदी जी का भव्य सत्कार बोहरा समुदाय की ओर से हुआ, और सितंबर के आखिरी सप्ताह में जब दोबारा सुनवाई हुई, तो एटॉर्नी जनरल अपनी बात से पलट गए। उन्होंने बोहरा समुदाय के धार्मिक नेताओं का समर्थन करते हुए मांग की कि फैसले की सुनवाई सर्वोच्च न्यायालय की पांच न्यायमूर्ति की पीठ द्वारा की जाए। मामला फिलहाल टल गया है।

हाल ही में केरल की वाम मोर्चा सरकार ने सबरीमला की यात्रा में महिलाओं की भागीदारी के पक्ष में सर्वोच्च न्यायालय के सामने अपना पक्ष रखा और न्यायालय ने इसे उचित भी ठहराया। मान्यता यह थी कि सबरीमला की गुफा में विराजमान अय्यप्पा कट्टर ब्रह्मचारी हैं और महिलाओं को अपने करीब देखने से परहेज करते हैं। दरअसल सदियों से माहवारी के दौरान महिलाओं को अशुद्ध माना जाता रहा है। उस अवस्था में उन्हें धार्मिक या शुभ आयोजन में भाग लेने से रोका जाता है। शीर्ष अदालत के फैसले ने न केवल महिलाओं की बराबरी के अधिकार को सुनिश्चित किया, बल्कि विशेष दिनों में उनके अपवित्र होने की मान्यता पर भी प्रहार किया। इस फैसले का असर एक तीर्थयात्रा तक सीमित न रहकर तमाम क्षेत्रों में देखने को मिलेगा। अदालत का फैसला तमाम महिलाओं को उस शर्मिंदगी से मुक्त करेगा, जो उन्हें कभी होनी ही नहीं चाहिए थी। अब जब महिलाएं यात्रा में शामिल होकर पहाड़ी पर चढ़ेंगी, तो यह जग जाहिर हो जाएगा कि गुफा में अय्यप्पा विराजते हैं, पर पहाड़ी तो सबरी की है।

-लेखिका माकपा पोलित ब्यूरो की सदस्य हैं

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