स्त्री का प्रेम और पुरुष की उम्र
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भारत में रुपहले पर्दे पर इन दिनों जब हैरी मेट सेजल फिल्म चल रही है। इसमें शाहरुख खान और अनुष्का शर्मा मुख्य भूमिकाओं में हैं। शाहरुख ने इस फिल्म में अनुष्का के पिता या चाचा की भूमिका नहीं की है, प्रेमिका की भूमिका की है। मैं सोच रही थी कि पचास से ऊपर के पुरुष अब भी फिल्मों में नायकों की भूमिका कर पा रहे हैं। अभिनेता की उम्र अधिक हो, तो हर्ज नहीं है, पर अभिनेत्रियों की उम्र कम होनी चाहिए। शाहरुख की उम्र तिरेपन है, जबकि अनुष्का उन्तीस साल की है। क्या ऐसी फिल्म बनाने के बारे में सोचा जा सकता था, जिसमें अभिनेता की उम्र उन्तीस और नायिका की उम्र तिरेपन हो!
हमने इससे भी उम्रदराज अभिनेताओं को कमउम्र अभिनेत्रियों के साथ काम करते देखा है। चीनी कम में अमिताभ बच्चन की प्रेमिका तब्बू थी और नि:शब्द में जिया खान। नि:शब्द के नायक की उम्र पैंसठ और प्रेमिका की उम्र उन्नीस थी। दक्षिण भारत की फिल्मों में नायक-नायिका की उम्र में बहुत अंतर रहता है। लिंग फिल्म में रजनीकांत की उम्र तिरेसठ थी और सोनाक्षी सिन्हा की उम्र सत्ताइस। सोलह से अट्ठारह साल की उम्र में श्रीदेवी साठ साल के नायकों के साथ फिल्में किया करती थीं।
शाहरुख, सलमान और आमिर खान पचास से अधिक की उम्र के हैं। फिर भी बॉलीवुड में उनकी लोकप्रियता थोड़ी भी कम नहीं हुई है। माधुरी दीक्षित को संन्यास ले लेना पड़ता है। प्रीति जिंटा, जूही चावला, काजल, रानी मुखर्जी-सबको खो जाना पड़ता है। बावजूद इसके कि इन सबकी उम्र शाहरुख खान से कम है। बांग्ला सिनेमा में विश्वजीत के बेटे प्रसेनजित अब भी नायक की भूमिका निभाते हैं। जबकि कभी उनके साथ नायिका की भूमिका निभाने वाली अभिनेत्रियां मां और मौसी की भूमिकाओं में खुद को कब की ढाल चुकी हैं। पर प्रसेनजित अब भी कमउम्र नायिकाओं के नायक हैं।
भारतीय उपमहाद्वीप के समाज में मैंने यह चीज खास तौर पर देखी है। उम्रदराज पुरुष कम उम्र औरतों से प्रेम करना चाहते हैं, उनसे शादी करना चाहते हैं। समाज से सिनेमा सीखता है। या सिनेमा से समाज सीखता है! संभवतः दोनों एक-दूसरे से सीखते हैं। उम्रदराज पुरुषों में लड़कियों या कम उम्र महिलाओं की चाहत के नतीजे भी दिखते हैं। इंटरनेट चाइल्ड पोर्नोग्राफी से भरे हुए हैं। अंदाज लगाया जा सकता है कि यह पोर्न किसके लिए है। लेकिन हमारा समाज इसकी विपरीत स्थिति को स्वीकार नहीं करता। कोई अधिक उम्र की महिला अगर कम उम्र के पुरुष से प्रेम करती है और उससे शादी करना चाहती है, तो समाज में उसकी आलोचना होने लगेगी। ऐसी महिला सिर उठाकर शायद ही चल सके। हालांकि भारत में सचिन तेंदुलकर जैसे उदाहरण भी हैं, जिनकी पत्नी अंजलि उनसे कुछ साल बड़ी हैं। लेकिन ऐसे उदाहरण अपवाद ही हैं। अगर यहां ऐसी फिल्म बनाई जाए, जिसमें बड़ी उम्र की नायिका और कम उम्र नायक हो, तो बॉक्स ऑफिस में उसका पिटना तय है। मैं हिंदी सीरियल नहीं देखती। लेकिन ठीक इसी समय पहरेदार पिया की नाम के एक सीरियल को बंद करने की मांग इसीलिए हो रही है कि उसमें लड़के से लड़की बड़ी है। यानी हमारा समाज, हमारी मानसिकता इसे स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है।
इस संबंध में आया एक सर्वेक्षण भी हमारी मदद करता है। यह सर्वेक्षण बताता है कि पुरुष चाहे किसी भी उम्र के क्यों न हों, वे शादी करने के लिए चौबीस या उससे कम उम्र की महिलाओं को तरजीह देते हैं। और लड़कियों की पसंद क्या है? तीस वर्ष तक की महिलाएं अपनी उम्र के या अपने से थोड़ी बड़ी उम्र के पति की कामना करती हैं। लेकिन चालीस की उम्र में शादी करने वाली महिलाओं की पसंद बदल जाती है। तब वे खुद से दो-तीन साल छोटे पति की कामना करती हैं। इसका मनोवैज्ञानिक कारण बताया जाता है। लेकिन महिलाओं की पसंद-नापसंद की भला परवाह कौन करता है? जिस समाज में शादी के समय लड़कियों से उसकी पसंद पूछने की जरूरत नहीं समझी जाती और प्रेम को विवाह में तब्दील करने वाली साहसी लड़कियां कई बार मौत के घाट उतार दी जाती हैं, उस समाज में उम्र के मामले में महिलाओं की पसंद का सम्मान किया जाएगा, यह सोचना ही भोलापन है।
समाज की इस सोच को देखते हुए हमारी यह धारणा बन गई है कि उम्रदराज पुरुषों को कम उम्र की स्त्रियां अच्छी लग ही सकती हैं। वे उनसे प्रेम कर सकती हैं, उनसे शादी कर सकती हैं। इसमें कुछ भी अस्वाभाविक नहीं है। इसी सोच का अगला चरण यह है कि लड़कियों को अपने से अधिक उम्र के पुरुष से ही शादी करनी चाहिए। महिला का पति उससे दो साल बड़ा हो या बीस साल, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। पति बड़ा ही होना चाहिए, छोटा नहीं। बांग्लादेश के चर्चित लेखक हुमायूं अहमद (अब दिवगंत) जिस सहजता के साथ अपनी बेटी की उम्र की महिला से दूसरी शादी कर स्वाभाविक जीवन बिता सकते थे, कोई महिला अपने बेटे की उम्र के पति से शादी कर वैसा जीवन बिताने के बारे में नहीं सोच सकती। हमारा समाज इसकी इजाजत नहीं देता।
पर माफ कीजिए, इस सोच में मेरा विश्वास नहीं है कि पुरुष हर उम्र में फिट है, जबकि औरतें बीस से तीस साल के बीच ही फिट हैं। दूसरी और चीजों की तरह यह हमारे समाज की पुरुषवर्चस्ववादी धारणा का ही उदाहरण है। यानी पुरुष जो चाहे वह कर सकता है, लेकिन महिला को इसकी इजाजत नहीं है। सिनेमा ने समाज की कई बद्धमूल धारणा पर चोट की है, तो कई नए आइडिया भी दिए हैं। हिंदी सिनेमा भी इसका अपवाद नहीं है। समकालीन हिंदी सिनेमा का पुरुषवर्चस्ववादी सोच पर टिके रहना हैरान और उदास करता है। हो सकता है, आनेवाले दिनों में कभी वह इस मामले में भी कोई नया आइडिया, नई सोच लेकर आए।