बीमा बिना बदहाल किसान
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बेमौसम की बरसात एवं तेज हवाओं ने देश के उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र में फसलों को भारी नुकसान पहुंचाया है। कृषि मंत्रालय का अनुमान है कि पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान और महाराष्ट्र में 50 लाख हेक्टेयर भूमि में खड़ी फसल बर्बाद हुई है। खबरें हैं कि उत्तर प्रदेश में गेहूं की फसल को हुए नुकसान को देखकर कम से कम चार किसानों ने आत्महत्या कर ली है और एक किसान को दिल का दौरा पड़ा। पंजाब, हरियाणा और महाराष्ट्र के विदर्भ में भी किसानों की हालत ठीक नहीं है। किसानों को यह नुकसान ऐसे समय हुआ है, जब वे सोच रहे थे कि खरीफ सीजन में मानसून की कमी के चलते हुई क्षति की भरपाई रबी की फसल से हो जाएगी। करनाल स्थित गेहूं अनुसंधान निदेशालय के मुताबिक, गेहूं की करीब 20 प्रतिशत और सरसों की करीब 30 फीसदी फसल को नुकसान हुआ है।
पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल ने कम से कम सात लाख हेक्टेयर में फसल बर्बाद होने के चलते क्षतिपूर्ति के रूप में सात सौ करोड़ रुपये की मांग की है। उन्होंने मुआवजे की मौजूदा सीमा 3,600 रुपये प्रति एकड़ से बढ़ाकर 10,000 रुपये प्रति एकड़ करने की मांग की है। साथ ही, कृषि मंत्रालय को उन्होंने लिखा है, 'मौजूदा मुआवजा राशि प्रति एकड़ बोए गए बीज की कीमत के लिए भी उचित नहीं है, अन्य लागत खर्च की तो बात ही छोड़िए।'
इसने मुझे एक ऐसे मुद्दे की तरफ ध्यान दिलाया है, जिस पर पिछले तीन दशकों से बात हो रही है, लेकिन अब भी उसकी शुरुआत नहीं हुई है। मैं किसानों के लिए जरूरी प्रभावी फसल बीमा योजना की बात कर रहा हूं। किसानों के लिए, खासकर छोटे और सीमांत किसान, जो मौसम की मार से खुद को बचाने के लिए मासिक प्रीमियम राशि का भुगतान नहीं कर सकते, एक के बाद एक आई सरकार फसल बीमा का प्रारूप लाने में विफल रही है। किसानों के लिए विश्वसनीय और आसान बीमा प्रणाली लागू करने में सरकारें विफल क्यों रही हैं? इसका जवाब है-राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव।
जहां तक मैं जानता हूं, मौसम संबंधी फसल बीमा समेत फसल बीमा से जुड़ी कई योजनाएं हैं, लेकिन इन सभी में एक बुनियादी खामी है-इन योजनाओं में क्षेत्र के आधार पर बीमा किया जाता है, जिसमें गांव या तालुका में हुए नुकसान का औसत निर्धारित किया जाता है। अगर किसी गांव की 10 एकड़ जमीन पर ओले पड़े हैं और फसल पूरी तरह से बर्बाद हो गई है, तो किसान नुकसान का पर्याप्त मुआवजा पाने में अक्षम रहेगा। इसका सीधा कारण है कि गांव की क्षति का औसत कुछ किसानों को हुए गंभीर नुकसान को प्रतिबिंबित नहीं करता।
असल में बीमा योजनाएं सूखे को ध्यान में रखकर तैयार की गई हैं, लेकिन मौसम आधारित फसल बीमा सूखे से अलग होता है। किसानों को हर तरह से हुए नुकसान की भरपाई के लिए बीमा योजना में पर्याप्त संरक्षण जरूरी है। यही वजह है कि कृषि मंत्रालय द्वारा तैयार फसल बीमा योजना के मसौदे को पंजाब ने खारिज कर दिया। ताजा मसौदा बीमा मुआवजे के लिए 70 फीसदी क्षतिपूर्ति की बात करता है। सोचने वाली बात है कि प्राकृतिक आपदाएं गांव के आधार पर नहीं आतीं, कभी ऐसा भी होता है कि गांव का कुछ हिस्सा प्रभावित होता है और कुछ हिस्से की फसलों को नुकसान नहीं पहुंचता। नई बीमा पॉलिसी इस मामले में पहले से मौजूद पॉलिसी से अलग नहीं है। इसके अलावा, कुल फसल मूल्य का दस फीसदी प्रीमियम बहुत ज्यादा है। जरूरत यह है कि खेत जिन कृषि-पारिस्थिकी क्षेत्र में स्थित है, उसके आधार पर प्रति एकड़ पर प्रीमियम निर्धारित किया जाए। मसलन, सिंचित क्षेत्र और असिंचित क्षेत्र के लिए प्रीमियम अलग-अलग होना चाहिए।
आखिर हरेक किसान का व्यक्तिगत रूप से बीमा क्यों नहीं किया जा सकता? जब फसल की बुवाई और कटाई के मूल्यांकन के लिए प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल किया जा रहा है, तो हरेक कृषक परिवार को हुए नुकसान का आकलन उसी प्रौद्योगिकी के जरिये क्यों नहीं किया जा सकता? मान लीजिए, आप किसी शहर में रहते हैं और आपके घर में आग लग गई, तो बीमा कंपनियां पूरी कॉलोनी के औसत के आधार पर तो नुकसान का मूल्यांकन नहीं करती न। हमेशा बीमा की व्यक्तिगत क्षति का ही मूल्यांकन किया जाता है।
बीमा कंपनियां ज्यादा काम का बहाना बनाकर ऐसा करने के प्रति हमेशा अनिच्छा जताती रही हैं। वे अपनी परिचालन लागत बढ़ाना नहीं चाहतीं और जानती हैं कि किसान असंगठित हैं और देश के आर्थिक परिदृश्य में वे कहीं नहीं हैं। यह अनुचित है। अगर सरकार यह अनिवार्य कर दे कि निजी बीमा कंपनियां अपने कारोबार का कम से कम 40 फीसदी कृषि को समर्पित करेंगी, और यह सुनिश्चित करे कि सरकार की नीति किसान केंद्रित है, तभी आत्महत्या का विकल्प चुनने वाले विवश किसानों को बचाया जा सकता है।
चूंकि नरेंद्र मोदी सरकार ने बीमा क्षेत्र में 49 फीसदी सीधे विदेशी निवेश को मंजूरी दी है, ऐसे में, भारत में बीमा क्षेत्र में आने वाली उन कंपनियों के लिए यह क्यों नहीं अनिवार्य बनाया जाता कि वे कम से कम 40 फीसदी निवेश कृषि क्षेत्र में परिवार के आधार पर करें। जब तक सरकार बीमा कंपनियों के लिए यह अनिवार्य नहीं करेगी कि वे प्रत्येक किसान के लिए एक बीमा योजना तैयार करें, तब तक कोई विदेशी कंपनी ग्रामीण क्षेत्र में जाने में शायद ही रुचि लेगी। लेकिन अगर वे विस्तृत भारतीय बाजार का हिस्सा बनने को उत्सुक हैं, तो यही वक्त है कि उनके लिए यह अनिवार्य किया जाए कि देश की सामाजिक जरूरतों को भी वे पूरा करें। अगर वे किसानों को फसल बीमा उपलब्ध कराने की प्रतिबद्धता नहीं जतातीं, तो उन्हें भारत में प्रवेश की इजाजत देने की जरूरत नहीं है। वे शुरू में हिचकेंगी और धमकाएंगी, लेकिन यह उनकी सामान्य रणनीति रही है। बीमा क्षेत्र में एफडीआई का क्या मतलब, अगर देश की एक बड़ी आबादी यानी कृषि क्षेत्र के 60 करोड़ लोगों को उसका लाभ न मिले?