फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   Will there be transparency in the electoral bond scheme now

चुनावी बॉन्ड योजना : क्या अब पार्दर्शिता आएगी, राजनीतिक फंडिंग पर बाकी हैं कुछ आशंकाएं

Sat, 24 Feb 2024 06:46 AM IST
शिव शरण शुक्ला सिद्धार्थ सिंह
सिद्धार्थ सिंह Published by: शिव शरण शुक्ला Updated Sat, 24 Feb 2024 06:46 AM IST
विज्ञापन
सार
इस मामले में याचिकाकर्ताओं की शिकायत यह थी कि यह जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 और कंपनी अधिनियम के तहत राजनीतिक फंडिंग की पारदर्शिता के उद्देश्य को विफल करती है। लेकिन मौजूदा व्यवस्था के अभाव में चुनावी बॉन्ड योजना के खत्म हो जाने पर पारदर्शिता आने के बजाय राजनीतिक फंडिंग के और अधिक अपारदर्शी हो जाने की आशंका है।
loader
Will there be transparency in the electoral bond scheme now
चुनावी बॉन्ड - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

सर्वोच्च न्यायालय ने वित्त अधिनियम, 2017 में पेश की गई चुनावी बॉन्ड योजना को हाल ही में रद्द कर दिया। अदालत ने कहा कि बॉन्ड संविधान के अनुच्छेद 19(1)(ए) के तहत सूचना के अधिकार का उल्लंघन करते हैं। अदालत ने यह भी माना कि असीमित कॉरपोरेट फंडिंग की अनुमति देने वाली कंपनी अधिनियम की धारा 182(1) के प्रावधान को हटाना संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है, जो कानून के समक्ष समानता का सिद्धांत पेश करता है। शीर्ष अदालत ने भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) से कहा है कि 12 अप्रैल, 2019 तक की गई ऐसी सभी खरीद का विवरण आगामी छह मार्च तक चुनाव आयोग को दें। साथ ही चुनाव आयोग को एसबीआई से मिली सभी जानकारियों को अपनी वेबसाइट पर 13 मार्च तक प्रकाशित करना होगा। चुनावी बॉन्ड योजना के तहत कोई व्यक्ति या संगठन उन्हें खरीद सकता है और अपनी पसंद के राजनीतिक दल को दान कर सकता है। ये दल उन्हें 15 दिन के बाद भुना सकते हैं। इन बॉन्डों को खरीदने के इच्छुक लोगों के लिए सख्त केवाईसी मानदंड हैं। खरीदारों की पहचान एसबीआई को होती है, जिसके पास इसके लेन-देन का एक समर्पित विंग है।


इस मामले में याचिकाकर्ताओं की शिकायत यह थी कि यह जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 और कंपनी अधिनियम के तहत राजनीतिक फंडिंग की पारदर्शिता के उद्देश्य को विफल करती है। लेकिन मौजूदा व्यवस्था के अभाव में चुनावी बॉन्ड योजना के खत्म हो जाने पर पारदर्शिता आने के बजाय राजनीतिक फंडिंग के और अधिक अपारदर्शी हो जाने की आशंका है। दरअसल, कोई भी कंपनी किसी राजनीतिक दल को बड़ा चंदा नहीं देना चाहेगी, और विशेष रूप से खुलेआम ऐसा करते हुए दिखना भी नहीं चाहेगी। इसकी वजह यह नहीं है कि कॉरपोरेट फंडिंग किसी भी तरह से भ्रष्ट या अवैध है, बल्कि यह है कि कोई खास व्यक्ति या कंपनी किसी खास राजनीतिक दल को इसलिए पसंद करती है, क्योंकि उसे लगता है कि उसकी आर्थिक नीतियां एवं विचार अन्य दलों से बेहतर हैं। लेकिन इस व्याख्या को या तो अस्वीकार्य माना जाता है या छोड़ दिया जाता है। स्वतंत्र भारत का इतिहास ऐसे उदाहरणों से भरा पड़ा है कि पहले इस तरह के राजनीतिक चंदे गुप्त रूप से या अधिकांशतः भ्रष्ट तरीके से दिए जाते थे। चुनावी बॉन्ड योजना राजनीतिक चंदे के उन अनियमित साधनों को खत्म करने के लिए एक सुधारात्मक योजना थी। बॉन्ड नकद नहीं खरीदे जा सकते थे और उनकी खरीद के लिए सख्त केवाईसी मानदंडों की आवश्यकता थी।


यह एक मिथक है कि भारतीय लोकतंत्र 'छोटे दान' से जीवित रह सकता है और बड़े पैमाने पर राजनीतिक अभियान जारी रख सकता है, जो भारतीय राजनीति की विशेषता है। अब समय आ गया है कि भारत को आधुनिक एथेंस के रूप में देखना बंद कर दिया जाए, जहां छोटी-मोटी नकदी और अल्पकालिक चंदा पारदर्शिता के लिए अद्भुत काम करेगी। चुनाव प्रचार में खर्च होने वाली राशि पर विचार करें। वर्ष 2019 के चुनाव में 55 से 60 हजार करोड़ रुपये खर्च हुए थे। इतनी ज्यादा रकम चुनावों की स्टेट फंडिंग से नहीं आ सकती। आप निश्चिंत हो सकते हैं कि यह पैसा दान से भी नहीं आ सकता है। यह विश्वास कि चुनाव को परोपकारी संरक्षकों द्वारा वित्तपोषित किया जा सकता है, शहरी आख्यान है। भारतीय लोकतंत्र खर्चीला है, लेकिन भारतीय राजनीति को पवित्र करने की इच्छा रखने वाले एक्टिविस्ट वकील इस तथ्य को स्वीकार करने से इन्कार करते हैं।

कागज पर अदालत का फैसला ‘सूचनात्मक लोकतंत्र’ की धारणा को आगे बढ़ाता है, जहां मतदाता राजनीतिक दलों, संबंधित उम्मीदवारों और इन पार्टियों और उम्मीदवारों की नीतियों के बारे में जानकारी के आधार पर विकल्प चुनते हैं।

भारत के प्रधान न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ ने आगे कहा, ‘प्रभावी ढंग से अपनी पसंद के उम्मीदवार को मतदान करने के लिए राजनीतिक दलों की फंडिंग के बारे में जानकारी आवश्यक है।’ लेकिन सर्वोच्च अदालत के फैसले से यही लगता है कि न्याय एक बार फिर मुट्ठी भर एक्टिविस्ट वकीलों द्वारा फैलाए गए 'राजनीतिक जाल' में फंस गया है।

सवाल यह है कि ऐसी 'बेहतर' जानकारी की उपलब्धता मतदाता की पसंद को किस हद तक प्रभावित करेगी? शहरी क्षेत्रों के एक बेहद छोटे वर्ग को छोड़कर भारत के अधिकांश लोग राजनीतिक फंडिंग के स्रोतों की परवाह नहीं करते। ग्रामीण और अर्ध ग्रामीण भारत में फसलों के लाभकारी मूल्य, खाद-बीज की कीमत, सरकारी नौकरी, शिक्षा के अवसर और जीवन की संभावनाओं को प्रभावित करने वाले मुद्दे महत्वपूर्ण हैं।

कुछ अत्यंत भ्रष्ट पार्टियां और राजनेता ये सब चीजें उपलब्ध कराकर सफल हो जाते हैं, जबकि अच्छे उम्मीदवार और पार्टियां विधानसभाओं में प्रवेश नहीं पातीं, क्योंकि वे वह नहीं कर पाते, जो भारतीय राजनीति की उथल-पुथल में आवश्यक है। इसकी संभावना बहुत कम है कि राजनीतिक दलों के फंडिंग स्रोतों का पता चलने से मतदाताओं के  'बेहतर' चुनावी विकल्प चुनने पर कोई प्रभाव पड़ेगा। यह एक और शहरी कानूनी किंवदंती है। अब जबकि लोकसभा के चुनाव कुछ ही महीने दूर हैं, यह स्पष्ट नहीं है कि चुनावी फंडिंग के मोर्चे पर आगे क्या होगा। लेकिन यह साफ है कि जैसे पानी अपने बहने का रास्ता ढूंढ लेता है, राजनीतिक दल भी फंडिंग का
रास्ता ढूंढ लेंगे।

कई लोगों को इस बात से परेशानी थी कि चुनावी बॉन्ड योजना के तहत दान का एक बड़ा हिस्सा भाजपा की झोली में चला गया। कथित तौर पर यह अन्य राजनीतिक दलों से समान अवसर छीन लेता था। यह उन लोगों की वास्तविक, लेकिन अघोषित शिकायत के मूल में था, जो चुनावी बॉन्ड योजना को गैर-कानूनी घोषित करना चाहते थे। यह याद रखने योग्य है कि भारतीय राजनीति की प्रकृति ऐसी है कि सत्तारूढ़ पार्टी ही राजनीतिक अभियानों के लिए जरूरी अधिकतम संसाधन जुटाती है। यह जवाहर लाल नेहरू के भारत के लिए भी उतना ही सच था, जितना आज है। लेकिन प्रचार की ताकत ऐसी है कि इतिहास के इस पहलू को या तो नकार दिया जाता है या दबा दिया जाता है और अतीत को सुनहरे रंगों में रंग दिया जाता है, जबकि समकालीन वास्तविकता को अंधकारमय बताया जाता है।
 
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

Next Article

Followed