क्या राहुल बदल पाएंगे कथानक

रशीद किदवई Updated Fri, 18 May 2018 06:15 PM IST
राहुल गांधी
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कर्नाटक विधानसभा में आज बहुमत का फैसला होना है। क्या बी एस येदियुरप्पा बहुमत साबित कर पाएंगे? क्या कांग्रेस और जनता दल (एस) अपने सारे विधायकों को एकजुट रख पाएंगे? इन सवालों के जवाब आज मिल जाएंगे। इसके बावजूद कर्नाटक विधानसभा चुनाव के नतीजे कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के लिए व्यक्तिगत तौर पर बड़ा धक्का हैं।
एक अदद जीत के लिए बेकरार राहुल को गुजरात विधानसभा चुनाव के बाद भरोसा था कि इस दक्षिणी राज्य में कांग्रेस कम से कम सबसे बड़ी पार्टी बनकर जरूर उभरेगी। उनके ऐसा सोचने की वजह थी। उनके पास सिद्धारमैया के रूप में एक दमदार क्षेत्रीय क्षत्रप, जाति आधारित मजबूत वोट बैंक, संसाधन और सांगठनिक ढांचा था। लेकिन यह सब कोई काम नहीं आया और गुजरात की तरह यहां भी राहुल और जीत के बीच में नरेंद्र मोदी आ गए। 

कांग्रेस के भीतरी सूत्र हैरत जताते हैं कि कहीं ऐसा तो नहीं कि मोदी इसी रणनीति पर काम कर रहे थे कि राहुल को चुनाव प्रचार के दौरान शुरुआत में खुलकर खेलने दिया जाए और फिर अभियान के अंतिम दौर के आते-आते चुनावी सभाओं में उनकी इस छवि को ध्वस्त कर दिया जाए। आखिर मोदी ने अपनी तमाम सभाओं में पूरी आक्रामकता के साथ मतदाताओं को यह सोचने को मजबूर कर ही दिया कि वह राहुल को पसंद करेंगे या फिर उन्हें। इस संदर्भ में सोशल मीडिया में अचानक राहुल की लोकप्रियता में जो तेजी आई, उसे भी कसौटी में कसकर देखने की जरूरत है। कहीं यह सोची-समझी रणनीति के तहत तो नहीं हो रहा, ताकि चुनावी संघर्ष को मोदी बनाम राहुल बना दिया जाए? कांग्रेस अध्यक्ष होने के नाते राहुल और उनकी पार्टी के पास 'मोदी बनाम राहुल' के जाल में फंसने के अलावा कोई और विकल्प ही नहीं है। यही ऐसी चीज है, जहां कांग्रेस के पास कोई विकल्प नहीं है। वह इसकी काट नहीं ढूंढ पा रही है। 

दरअसल गठबंधन या तालमेल के रास्ते पर चलना कहने से अधिक कठिन है। कांग्रेस अपने 39 फीसदी वोट (इस चुनाव में उसे 38 फीसदी वोट मिले) को लेकर इतनी आश्वस्त थी कि उसने चुनाव से पहले जनता दल (एस) के साथ गठबंधन करने के विकल्प पर विचार करना भी जरूरी नहीं समझा था। हालांकि अनेक लोगों की राय यह भी है कि यदि कांग्रेस और जनता दल (एस) के बीच चुनाव से पहले गठबंधन हो गया होता, तो इससे वहां लड़ाई सीधी हो जाती और इससे भाजपा को फायदा होता और उसकी सीटें 104 से अधिक हो सकती थीं। 

बात सिर्फ कर्नाटक की नहीं है, पूरे देश में कांग्रेस की जो स्थिति है, उसमें उसके पास विकल्प सिमटते जा रहे हैं। मसलन, उत्तर प्रदेश को ही लीजिए, जहां से सर्वाधिक सांसद चुने जाते हैं, कांग्रेस वहां लंबे समय से तीसरे और चौथे नंबर की पार्टी बनकर रह गई है। वहां कांग्रेस के पास एकमात्र विकल्प यही है कि वह या तो सपा-बसपा गठबंधन में शामिल हो या फिर अकेले रहकर अलग-थलग पड़ी रहे। बहुत संभव है कि 2019 के लोकसभा चुनाव में जब सीटों के बंटवारे की बात आएगी तो सपा-बसपा गठबंधन कांग्रेस को अमेठी और रायबरेली के अलावा लखनऊ और गाजियाबाद जैसी सीटें देने की पेशकश करे, जहां 2014 के लोकसभा चुनाव में पार्टी दूसरे नंबर पर रही थी। मगर हकीकत यह है कि लखनऊ और गाजियाबाद में भाजपा की जीत का अंतर साढ़े तीन लाख वोटों से भी अधिक था!

गौर किया जाना चाहिए कि राहुल को कांग्रेस के भीतर कुछ बड़े फैसले टालने पड़े हैं। उन्होंने नई कांग्रेस कार्यसमिति के गठन का फैसला इस उम्मीद से टाल दिया कि कर्नाटक में पार्टी जीत जाती है, तो उन्हें अपनी पसंद की कांग्रेस कार्यसमिति के गठन का नैतिक और राजनीतिक अधिकार मिल जाएगा। इस तरह वह साठ साल से अस्सी साल तक के कुछ ऐसे नेताओं को बाहर कर सकते थे, जोकि राजीव गांधी के समय से पार्टी की निर्णय लेने वाली इस सर्वोच्च संस्था का हिस्सा रहे हैं। लेकिन कर्नाटक के जनादेश ने उन्हें ऐसे जनाधारविहीन नेताओं पर और निर्भर बना दिया है, जिन्होंने एक तरह से केंद्रीय नेतृत्व के इर्द गिर्द घेरा बना रखा है और संगठन पर पकड़ बना रखी है। 

कर्नाटक के राज्यपाल की भूमिका और अतीत में कांग्रेस द्वारा राज्य सरकारों को गिराने या दलों को तोड़ने के कृत्यों के बारे में काफी कुछ कहा जा रहा है। संसदीय लोकतंत्र की वेस्टमिंस्टर प्रणाली में साधारण बहुमत का कोई विकल्प नहीं है। ऐसा लगता है कि भारतीय मतदाता इस अनैतिक जोड़तोड़ और पिछले दरवाजे से बहुमत हासिल करने के कृत्यों के प्रति तटस्थ है। हाल के दिनों में जिस पार्टी ने गोवा, मणिपुर और मेघालय में सरकार बनाई है, उसने त्रिपुरा में भी चुनाव जीता है और कर्नाटक में भी उसे सरकार बनाने का मौका मिल गया है।

इससे यही पता चलता है कि राजभवनों या विधानसभाओं के बाहर धरने पर बैठने या राष्ट्रपति भवन तक मार्च करने का आम लोगों पर बहुत असर नहीं पड़ता है। हैरानी की बात यह भी है कि बंगलूरू में जब कांग्रेसी 'लोकतंत्र की हत्या' के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे थे, तब परिदृश्य में राहुल कहीं नजर नहीं आए। उस समय कांग्रेस अध्यक्ष छत्तीसगढ़ में जन स्वराज सम्मेलन को संबोधित कर रहे थे और भारतीय लोकतंत्र की तुलना पाकिस्तान से कर रहे थे। वहां उन्होंने कहा, 'आरएसएस देश की सभी संस्थाओं पर कब्जा कर रहा है। ऐसा पाकिस्तान या तानाशाही में होता है।' उनकी इस टिप्पणी का मध्य वर्ग पर प्रतिकूल असर पड़ा, जोकि पाकिस्तान से किसी भी तरह की तुलना को नापंसद करता है। 

नई दिल्ली के 24, अकबर रोड स्थित कांग्रेस मुख्यालय में अनेक लोग मानते हैं कि इसके बजाय राहुल को एच डी देवगौड़ा से मिलकर उन्हें उनके 85वें जन्मदिन की बधाई देनी चाहिए थी और 21 साल पहले सीताराम केसरी ने उन्हें जिस तरह से प्रधानमंत्री पद से बेदखल किया था, उस पर माफी मांगनी चाहिए थी। उनका मानना है कि इससे कांग्रेस-जनता दल (यू) गठबंधन को आज विधानसभा में होने वाले शक्ति परीक्षण के लिए नई ताकत मिलती। 

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