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क्या मोदी को रोक पाएंगे राहुल
सुरेंद्र कुमार
Updated Mon, 26 Mar 2018 05:50 PM IST
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मोदी के सामने राहुल
यह समझने के लिए रॉकेट विज्ञान की जरूरत नहीं है कि राहुल गांधी बदलाव से गुजर रहे हैं। जो लोग उन्हें 'पप्पू' कहकर उनका उपहास करते थे, वे अब ऐसा करने के बारे में सोचेंगे! हैरत की बात यह है कि यह सब तब है, जब हाल ही में हुए विधानसभा चुनावों में कांग्रेस त्रिपुरा और नगालैंड में खाता तक नहीं खोल सकी और मेघालय में गठबंधन बनाने में नाकाम रही। कांग्रेस का राजनीतिक आभामंडल सिकुड़ रहा है, आज देश के 22 राज्यों में या तो भाजपा या उसके गठबंधन की सरकारें हैं।
लेकिन राजनीति में एक महीना का वक्त भी काफी लंबा होता है। त्रिपुरा, मेघालय और नगालैंड में सरकारें बनाने और पूर्वोत्तर में कमल के खिलने के बाद उत्तर प्रदेश के गोरखपुर और फूलपुर के उपचुनावों में मिली हार भाजपा के लिए बड़ा झटका है। मध्य प्रदेश और राजस्थान के उपचुनावों में मिली हार को जोड़ दिया जाए तो 2014 के बाद भाजपा लोकसभा की छह सीटें गंवा चुकी है। क्या इसे मोदी-शाह के लिए खतरे की घंटी माना जाए? क्या वे अब भी अपराजेय हैं? क्या 2019 के आम चुनाव के लिए मैदान खुला हुआ है?
राहुल का राजनीतिक रूपांतरण एक क्रमिक प्रक्रिया है, लेकिन इसके मिश्रित नतीजे मिले हैं। एक दशक से वे अपने परदादा जवाहर लाल नेहरू की तरह भारत भ्रमण करते हुए लोगों से मिलकर उनकी समस्याओं को समझने की कोशिश कर रहे हैं।
जनवरी, 2014 में टाइम्स नाउ को दिए गए इंटरव्यू में जब अर्णब गोस्वामी ने उनसे तीखे सवाल किए तो उनका जवाब काफी फीका-सा था। यूपीए-दो के कार्यकाल के दौरान उन्होंने जब एक अध्यादेश फाड़ दिया था, वह भी तब जब तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह विदेश में थे, उनका व्यवहार न केवल गैरजिम्मेदाराना था, बल्कि इससे ऐसा लगा मानो कांग्रेस के प्रथम परिवार का यह सदस्य खुद को प्रधानमंत्री से भी ऊपर समझता है। उसके बाद मई, 2014 में हुए लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की बुरी तरह पराजय हुई और राहुल मोदी के सामने कहीं नजर नहीं आए।
ऊर्जा से भरपूर, वक्तृत्व कला में पारंगत, मोदी ने अनथक प्रचार किया और करोड़ों भारतीयों की आकांक्षाओं और उम्मीदों की लहर पर सवार होकर विजयी हुए। उन्होंने मतदाताओं से कहा, 'अबकी बार मोदी सरकार' और नौकरियों के साथ ही भ्रष्टाचार खत्म करने और आधारभूत ढांचे में क्रांतिकारी बदलाव के जरिये अच्छे दिन लाने का वायदा भी किया। भाजपा के अनेक नेता अब भी मानते हैं कि भविष्य में भी भाजपा के चुनाव जीतने के लिए राहुल ही सबसे बड़ा दांव हैं।
हालांकि राहुल ने 2015 में फरवरी से अप्रैल के दौरान थाईलैंड, कंबोडिया, म्यांमार और वियतनाम में छुट्टी बिताते हुए मठों में खासा वक्त गुजारा। कहा गया कि इससे उन्हें आंतरिक शक्ति को समझने में मदद मिली और मोदी से लड़ने की ताकत मिली जिसके जरिये वे लोगों को समझा रहे हैं कि 2019 में कांग्रेस सत्ता में फिर लौट सकती है। लेकिन यह सिर्फ समय ही बताएगा कि क्या वह दिन में सपना देख रहे हैं या फिर वाकई कुछ बदलाव लाते हैं।
गुजरात विधानसभा चुनाव में मोदी, अमित शाह और अनेक केंद्रीय मंत्रियों के धुआंधार प्रचार के बावजूद भाजपा बहुत मामूली बहुमत ही हासिल कर सकी, इससे भी राहुल को ताकत मिली है। राहुल ने हार्दिक पटेल, अल्पेश ठाकोर और जिग्नेश मेवाणी जैसे युवा नेताओं का रणनीतिक समर्थन हासिल कर मोदी-शाह को चुनौती दी। इससे दो संदेश गए।
पहला यह कि मोदी-शाह के किले में सेंध लगाई जा सकती है और यदि सोच समझकर विपक्ष एकजुट होकर चुनाव लड़े तो भाजपा विरोधी मतों का विभाजन रोका जा सकता है। यदि दूसरे राज्यों में वहां की परिस्थितियों को देखते हुए और क्षेत्रीय नेताओं को साधते हुए यही रणनीति अपनाई जाए तो उससे कांग्रेस की अगुआई वाले विपक्षी गठबंधन की संभावनाएं बढ़ सकती हैं।
राहुल गांधी के दूसरे संस्करण में वैश्विक मंचों पर भी बदलाव दिखा, जब वह सितंबर, 2017 में बर्कले और प्रिंसटन जैसे प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में बुद्धिजीवियों और मीडिया से रूबरू हुए। उनका प्रदर्शन अर्णब गोस्वामी के 2014 के उस इंटरव्यू के उलट था। वह शांत, आत्मविश्वास से भरे हुए और जानकारियों से लैस थे। अब कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में उनकी ताजपोशी के बाद कांग्रेस के दूसरे युवा नेता भी मोदी पर हमला करने का कोई मौका नहीं चूक रहे हैं। राजनीति में कई बार धारणा सच्चाई से अहम हो जाती है।
लिहाजा भाजपा के प्रवक्ता जहां राहुल और उनके साथियों के सरकार पर नोटबंदी के अब तक जारी प्रभाव, रक्षा बलों की बदहाली, रोजगार के मोर्चे पर नाकामी तथा याराना पूंजी को लेकर लगाए जा रहे आरोपों को खारिज करते हैं, लेकिन इसे नजरंदाज नहीं किया जा सकता कि ऐसे आरोपों का मतदाताओं पर भी असर होता है। मसलन नीरव मोदी और पंजाब नेशनल बैंक के घोटाले के बाद की स्थितियों में देखा जा सकता है।
एनडीए सरकार के प्रति निराशा और प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता में आई गिरावट के संकेतों के बावजूद यह हकीकत है कि अभी कोई वैसी मोदी विरोधी लहर नहीं है, जैसी कि 1977 में इंदिरा विरोधी लहर थी और जब सिर्फ एक नारे, इंदिरा हटाओ, ने विपक्षी दलों को एकजुट कर दिया था।
राहुल को अभी नया दूरदर्शी कथानक प्रस्तुत करना होगा, ताकि मतदाता कांग्रेस के प्रति आकर्षित हो सकें। सिर्फ मोदी पर आरोप और एनडीए की नाकामियां गिनाने से कुछ भी हासिल नहीं होगा। इसके अलावा मोदी के पक्ष में एक सकारात्मक चीज यह भी है कि भाजपा के भीतर उन्हें किसी तरह की चुनौती नहीं है। वहीं राहुल विपक्षी दलों का ऐसा चेहरा नहीं हैं, जिन्हें सबका समर्थन मिले। यानी राहुल अकेले 2019 में मोदी को नहीं रोक सकते, अलबत्ता गुजरात, गोरखपुर और फूलपुर में आजमाई गई रणनीति के जरिये वह उनके रथ की गति धीमी कर सकते हैं।
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लेकिन राजनीति में एक महीना का वक्त भी काफी लंबा होता है। त्रिपुरा, मेघालय और नगालैंड में सरकारें बनाने और पूर्वोत्तर में कमल के खिलने के बाद उत्तर प्रदेश के गोरखपुर और फूलपुर के उपचुनावों में मिली हार भाजपा के लिए बड़ा झटका है। मध्य प्रदेश और राजस्थान के उपचुनावों में मिली हार को जोड़ दिया जाए तो 2014 के बाद भाजपा लोकसभा की छह सीटें गंवा चुकी है। क्या इसे मोदी-शाह के लिए खतरे की घंटी माना जाए? क्या वे अब भी अपराजेय हैं? क्या 2019 के आम चुनाव के लिए मैदान खुला हुआ है?
राहुल का राजनीतिक रूपांतरण एक क्रमिक प्रक्रिया है, लेकिन इसके मिश्रित नतीजे मिले हैं। एक दशक से वे अपने परदादा जवाहर लाल नेहरू की तरह भारत भ्रमण करते हुए लोगों से मिलकर उनकी समस्याओं को समझने की कोशिश कर रहे हैं।
जनवरी, 2014 में टाइम्स नाउ को दिए गए इंटरव्यू में जब अर्णब गोस्वामी ने उनसे तीखे सवाल किए तो उनका जवाब काफी फीका-सा था। यूपीए-दो के कार्यकाल के दौरान उन्होंने जब एक अध्यादेश फाड़ दिया था, वह भी तब जब तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह विदेश में थे, उनका व्यवहार न केवल गैरजिम्मेदाराना था, बल्कि इससे ऐसा लगा मानो कांग्रेस के प्रथम परिवार का यह सदस्य खुद को प्रधानमंत्री से भी ऊपर समझता है। उसके बाद मई, 2014 में हुए लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की बुरी तरह पराजय हुई और राहुल मोदी के सामने कहीं नजर नहीं आए।
ऊर्जा से भरपूर, वक्तृत्व कला में पारंगत, मोदी ने अनथक प्रचार किया और करोड़ों भारतीयों की आकांक्षाओं और उम्मीदों की लहर पर सवार होकर विजयी हुए। उन्होंने मतदाताओं से कहा, 'अबकी बार मोदी सरकार' और नौकरियों के साथ ही भ्रष्टाचार खत्म करने और आधारभूत ढांचे में क्रांतिकारी बदलाव के जरिये अच्छे दिन लाने का वायदा भी किया। भाजपा के अनेक नेता अब भी मानते हैं कि भविष्य में भी भाजपा के चुनाव जीतने के लिए राहुल ही सबसे बड़ा दांव हैं।
हालांकि राहुल ने 2015 में फरवरी से अप्रैल के दौरान थाईलैंड, कंबोडिया, म्यांमार और वियतनाम में छुट्टी बिताते हुए मठों में खासा वक्त गुजारा। कहा गया कि इससे उन्हें आंतरिक शक्ति को समझने में मदद मिली और मोदी से लड़ने की ताकत मिली जिसके जरिये वे लोगों को समझा रहे हैं कि 2019 में कांग्रेस सत्ता में फिर लौट सकती है। लेकिन यह सिर्फ समय ही बताएगा कि क्या वह दिन में सपना देख रहे हैं या फिर वाकई कुछ बदलाव लाते हैं।
गुजरात विधानसभा चुनाव में मोदी, अमित शाह और अनेक केंद्रीय मंत्रियों के धुआंधार प्रचार के बावजूद भाजपा बहुत मामूली बहुमत ही हासिल कर सकी, इससे भी राहुल को ताकत मिली है। राहुल ने हार्दिक पटेल, अल्पेश ठाकोर और जिग्नेश मेवाणी जैसे युवा नेताओं का रणनीतिक समर्थन हासिल कर मोदी-शाह को चुनौती दी। इससे दो संदेश गए।
पहला यह कि मोदी-शाह के किले में सेंध लगाई जा सकती है और यदि सोच समझकर विपक्ष एकजुट होकर चुनाव लड़े तो भाजपा विरोधी मतों का विभाजन रोका जा सकता है। यदि दूसरे राज्यों में वहां की परिस्थितियों को देखते हुए और क्षेत्रीय नेताओं को साधते हुए यही रणनीति अपनाई जाए तो उससे कांग्रेस की अगुआई वाले विपक्षी गठबंधन की संभावनाएं बढ़ सकती हैं।
राहुल गांधी के दूसरे संस्करण में वैश्विक मंचों पर भी बदलाव दिखा, जब वह सितंबर, 2017 में बर्कले और प्रिंसटन जैसे प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में बुद्धिजीवियों और मीडिया से रूबरू हुए। उनका प्रदर्शन अर्णब गोस्वामी के 2014 के उस इंटरव्यू के उलट था। वह शांत, आत्मविश्वास से भरे हुए और जानकारियों से लैस थे। अब कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में उनकी ताजपोशी के बाद कांग्रेस के दूसरे युवा नेता भी मोदी पर हमला करने का कोई मौका नहीं चूक रहे हैं। राजनीति में कई बार धारणा सच्चाई से अहम हो जाती है।
लिहाजा भाजपा के प्रवक्ता जहां राहुल और उनके साथियों के सरकार पर नोटबंदी के अब तक जारी प्रभाव, रक्षा बलों की बदहाली, रोजगार के मोर्चे पर नाकामी तथा याराना पूंजी को लेकर लगाए जा रहे आरोपों को खारिज करते हैं, लेकिन इसे नजरंदाज नहीं किया जा सकता कि ऐसे आरोपों का मतदाताओं पर भी असर होता है। मसलन नीरव मोदी और पंजाब नेशनल बैंक के घोटाले के बाद की स्थितियों में देखा जा सकता है।
एनडीए सरकार के प्रति निराशा और प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता में आई गिरावट के संकेतों के बावजूद यह हकीकत है कि अभी कोई वैसी मोदी विरोधी लहर नहीं है, जैसी कि 1977 में इंदिरा विरोधी लहर थी और जब सिर्फ एक नारे, इंदिरा हटाओ, ने विपक्षी दलों को एकजुट कर दिया था।
राहुल को अभी नया दूरदर्शी कथानक प्रस्तुत करना होगा, ताकि मतदाता कांग्रेस के प्रति आकर्षित हो सकें। सिर्फ मोदी पर आरोप और एनडीए की नाकामियां गिनाने से कुछ भी हासिल नहीं होगा। इसके अलावा मोदी के पक्ष में एक सकारात्मक चीज यह भी है कि भाजपा के भीतर उन्हें किसी तरह की चुनौती नहीं है। वहीं राहुल विपक्षी दलों का ऐसा चेहरा नहीं हैं, जिन्हें सबका समर्थन मिले। यानी राहुल अकेले 2019 में मोदी को नहीं रोक सकते, अलबत्ता गुजरात, गोरखपुर और फूलपुर में आजमाई गई रणनीति के जरिये वह उनके रथ की गति धीमी कर सकते हैं।