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क्या नरेंद्र 'अटल' बनेंगे

सागरिका घोष Updated Wed, 24 Dec 2014 01:39 PM IST
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Will Narendra be 'Atal'
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जम्मू-कश्मीर में जैसा विखंडित जनादेश सामने आया है, वह एक साथ अफसोस और उम्मीद दोनों पैदा करता है। अफसोस इस बात का कि इन चुनावों में हिंदू और मुसलमान के बीच की दरार बिल्कुल साफ तौर पर देखने को मिली। और उम्मीद यह कि राज्य में एक नया गठजोड़ और एक नई तरह की राजनीति उभरेगी, जो सबको साथ लेकर चलेगी और राज्य के युवाओं के सपनों को तवज्जो देगी।
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दरअसल, हिंदू बाहुल्य जम्मू में भारतीय जनता पार्टी का प्रदर्शन बेहतर रहा, वहीं मुस्लिम बाहुल्य घाटी क्षेत्र में वह खाता भी नहीं खोल पाई। वोटिंग के इस पैटर्न को लेकर हिंदू और मुसलमान में यह भेद काफी चिंता की बात है। हालांकि अमित शाह सारे विकल्पों के खुले होने की बात कर रहे हैं, मगर जम्मू-कश्मीर के लिए सबसे बेहतर यही होगा कि भाजपा और पीडीपी साथ-साथ आएं और हिंदू और मुसलमान के बीच की दरार को पाटते हुए राज्य के विकास के लिए काम करें।


प्रधानमंत्री के सबका साथ, सबका विकास के नारे को अमली जामा पहनाने का भी यह स्थिति अवसर देती है। किसी भी स्तर पर धार्मिक विभाजन की आलोचना होनी चाहिए, और यह कैसे खत्म हो, जम्मू-कश्मीर का शासन संभालने वाले भावी गठजोड़ को इसी की कोशिश करनी चाहिए।

हालांकि एक बात तो तय है कि इन चुनावी नतीजों में नरेंद्र मोदी की गजब की भूमिका रही है। अगर उन्होंने अपने चुनावी अभियान न किए होते, झारखंड के चुनावी नतीजे वैसे न होते, जैसे दिख रहे हैं। मगर घाटी में भाजपा के खाता तक न खोल पाने की वजह यह है कि यहां के लोगों को उस पर बिल्कुल भरोसा नहीं है।

यहां जो कहा जाता है कि कमल का फूल घाटी में नहीं खिल सकता, या कमल का फूल पीरपंजाल पहाड़ को पार नहीं कर सकता, ताजा चुनाव में बिल्कुल सही साबित हुआ। भाजपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती इसी भरोसे को बहाल करने की है।

मगर सवाल यह है कि यह होगा कैसे? दरअसल, घाटी में इंसानियत और जम्मू में आत्म सम्मान, ये दो खंभे हैं, जिन्हें बरकरार रखना जम्मू-कश्मीर की सत्ता संभालने वाले हर गठजोड़ के लिए चुनौती है। राज्य में जो भी गठजोड़ बने, उसकी पहली प्राथमिकता लोगों में एकता और भरोसे का भाव करना होना चाहिए।

हालांकि भाजपा और पीडीपी में किसी तरह का गठजोड़ बनना आसान नहीं रहेगा। दोनों की विचारधाराओं में गंभीर अंतर है। इसके अलावा, पिछले कुछ समय से संघ परिवार जिस रवैये को अपनाए हुए है, गोडसे पर जो चर्चाएं हो रही हैं और कट्टर हिंदुत्व का माहौल बनाया जा रहा है, उसे देखते हुए तो दोनों पार्टियों का ऐसा गठजोड़ और भी मुश्किल है।

यह भी सच है कि अटल जी ने जिस तरह संघ से खुद को अलग रखते हुए अपना एक रास्ता निकाला था, नरेंद्र मोदी अब तक वैसा नहीं कर पाए हैं। फिर उनकी सरकार पर संघ का असर भी छिपा नहीं रह गया है। इसके अलावा धर्मांतरण के मुद्दे पर प्रधानमंत्री की चुप्पी से भी सवाल खड़े होते हैं।

ऐसे में, पीडीपी सोच सकती है कि यह गठजोड़ उसके वोटों को काटेगा। वैसे भी, उसे घाटी में उम्मीद से कम ही वोट मिले हैं। साफ है, कि ऐसे किसी भी गठजोड़ में जोखिम बहुत है। मगर मुफ्ती मोहम्मद सईद दिग्गज नेता हैं, और अटल बिहारी वाजपेयी से उनके गहरे रिश्ते रहे हैं। जब वाजपेयी ने घाटी में इंसानियत की बात की थी, तब पीडीपी ने उनकी बहुत कद्र की थी।

ऐसे में, उम्मीद बंधती है कि अटल के नेतृत्व वाले एनडीए में जब यह हो सकता है, तो मोदी के नेतृत्व वाले एनडीए में क्यों नहीं। फिर यह भी समझना होगा कि जम्मू-कश्मीर को केंद्र की आर्थिक मदद की बहुत जरूरत है। अगर कश्मीर में भाजपा विपक्ष में बैठती है, तो केंद्र के साथ उसके ताल्लुकात में कड़वाहट आएगी।

लोग भूले नहीं होंगे जब 1983 के चुनाव में नेशनल कांफ्रेस को 46 सीट मिली थीं, और कांग्रेस को विपक्ष में बैठना पड़ा था। तब एक हफ्ते के भीतर कांग्रेस ने राज्य की सरकार गिरा दी थी। साफ है कि राज्य की स्थिरता के लिए जरूरी है कि वह यह समझे कि दिल्ली के खिलाफ जाकर राज्य सरकार मजबूत नहीं बन सकती।

घाटी से इतर जम्मू में भाजपा ने बेहतर प्रदर्शन किया है, मगर जैसी हवा बांधी जा रही थी, वैसा कुछ नहीं हुआ। दरअसल, जम्मू में भाजपा की हालत न घर की, न घाट की वाली रही। आप घाटी में धारा 370 को हटाने की बात कर रहे थे, जबकि जम्मू में आपका सुर कुछ और ही था। निश्चित तौर पर यह जम्मू के मतदाताओं को अच्छा नहीं लगा होगा। इसका खामियाजा कुछ हद तक भाजपा को उठाना पड़ा। अगर उमर अब्दुल्ला की बात करें तो उनकी सरकार के खिलाफ एंटी इनकंबेंसी बहुत ज्यादा थी।

हालांकि इस चुनाव में नेशनल कांफ्रेंस का प्रदर्शन उतना बुरा नहीं रहा है। उमर अब्दुल्ला के साथ दिक्कत यह रही कि वह लोगों से न तो जुड़ पाए, और न ही उनका भरोसा जीत पाए। उनका ज्यादा वक्त दिल्ली में ही गुजरता था। फिर भी अगर रिकॉर्ड मतदान हुआ, तो इसका श्रेय उमर अब्दुल्ला सरकार को मिलने से इन्कार नहीं होना चाहिए।

मतदान में बढ़ोतरी का अब तक यह मतलब निकाला जाता था कि फौज ने जबर्दस्ती की होगी, मगर इस बार लोकतंत्र के प्रति लोगों का उत्साह देखते ही बनता है। मैं जब वहां गई थी, तो वहां के तमाम युवाओं ने मुझसे कहा कि वे बंदूक का रास्ता छोड़कर दिल्ली आना चाहते हैं। क्या छह-सात वर्ष पहले तक भाजपा के कार्यकर्ता इतनी स्वतंत्रता के साथ घाटी में प्रचार करने की सोच सकते थे। यह देखकर लगता है कि घाटी की हवा में बदलाव है।

खंडित जनादेश यह भी बताता है कि जम्मू-कश्मीर के लोगों में अवसरवादी राजनीति को लेकर नाराजगी है। कश्मीर का वोटर अब जागरूक हो गया है। हर पार्टी को समझना होगा कि अब घिसे-पिटे मुद्दों से काम नहीं चलेगा, उन्हें नए मुद्दे निकालने पड़ेंगे, और साथ ही, विकास, एकता और आगे बढ़ने वाली नीतियों की बात करनी होगी। इन नतीजों ने फिर से साफ किया है कि भाजपा अब देश की नंबर एक की पार्टी बन गई है।

अमित शाह ने कश्मीर से कन्याकुमारी तक छाने की जो बात की थी, वह साकार होती दिख रही है। कांग्रेस ध्वस्त हो चुकी है, और क्षेत्रीय दल पुराने ढर्रे की राजनीति में ही उलझे हुए हैं। नरेंद्र मोदी भाजपा और नई राजनीति का चेहरा बन कर उभरे हैं। हालांकि भाजपा झारखंड में भी क्लीन स्वीप की बात कर रही थी, जो नहीं हो पाया।

फिर भी वहां भाजपा का जो भी प्रदर्शन रहा, वह नरेंद्र मोदी का ही करिश्मा है। मजे की बात है कि मोदी जहां अभियान करते हैं, वहां छा जाते हैं, वहीं राहुल गांधी जहां नहीं जाते हैं, वहां कांग्रेस कुछ अच्छा करती दिखने लगती है। फिर भी घाटी में भाजपा के लिए जो नतीजे सामने आए हैं, वे नरेंद्र मोदी के लिए कई चुनौतियां खड़े करते हैं। उन्हें वाजपेयी की तरह संघ परिवार को काबू में रखना होगा। जब तक वह कट्टरवादी नीतियों से तौबा नहीं करते, तब तक घाटी जैसे झटके उनकी परेशानी का सबब बनते रहेंगे।

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